सर्जिकल वेट लॉस के फायदे

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• हाई ब्लड प्रेशर: कम से कम 70% मरीज जो कि ब्लड प्रेशर को नियंत्रण मे रखने के लिए दवाएं लेते हैं, उन्हें सर्जरी के बाद दो-तीन महीने के भीतर ही ब्लड प्रेशर की दावा लेने की जरूरत खत्म हो जाती है। अगर दावा लेने की जरूरत होती भी है तो उसके डोज़ मे निश्चित तौर पर गिरावट आती हाई, जिससे दावा के साइड इफेक्ट का खतरा काफी कम हो जाता है।

• हाई कोलेस्ट्रॉल: 80% से भी ज्यादा मरीजों मे ऑपरेशन के दो से तीन महीनों भीतर कोलेस्ट्रॉल सामान्य स्तर पर आ जाता है।

• दिल की बीमारियाँ: हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि इससे दिल की बीमारी मे सुधार आएगा, मगर हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और डायबीटीज़ जैसी समस्याओं मे सुधार से यह जरूर पक्का हो जाता हाई कि खतरे मे काफी हद तक गिरावट जरूर आएगी। एक हालिया अध्ययन मे कहा गया हाई कि, कार्डियोवस्कुलर बीमारियों से मौत के खतरे को डायबीटीज़ की स्थिति मे सुधार से काफी हद तक कम किया जा सका है। हालांकि, यह तथ्य कई साल पहले का हो सकता है, जब दिल की बीमारियों का पता लगाने के लिए आसान और सुरक्षित तरीके उपलब्ध नहीं थे।

• डायबीटीज़: टाइप-2 डायबीटीज़ के 90% से भी अधिक मामलों मे आमतौर पर सर्जरी के पहले कुछ हफ्तों के भीतर ही बेहतरीन परिणाम देखने को मिलते हैं: सामान्य ब्लड शुगर स्तर, सामान्य हीमोग्लोबिन (एचबीए1सी) वैल्यू और इंसुलिन के इंजेक्शन सहित इनकी सभी दवाओं से मुक्ति। डाइबीटीज और इससे इसकी जटिलताओं के नियंत्रण पर आधारित तमाम अध्ययनो मे यह पाया गया कि जब ब्लड शुगर को सामान्य स्तर पर मेंटेन रखा गया तब डायबीटीज़ संबंधी जटिलताओं मे भी कमी आई। चिकित्सा के क्षेत्र मे ऐसा कोई इलाज नहीं है जिससे डायबीटीज़ मे उतना फायदा हो सके जितना कि सर्जरी से हो रहा है-यही वजह है कि तमाम फिजीशियन्स की यह सलाह है कि गंभीर रूप से मोटे मरीजों मे सर्जरी डायबीटीज़ का बेहतरीन इलाज है। असामान्य ग्लूकोज सहनशीलता अथवा ‘बॉर्डरलाइन डायबीटीज़’ को गैस्ट्रिक बाइपास के जरिये ज्यादा आसानी से ठीक किया जा सकता है। चूंकि यह स्थिति अधिकतर मामलों मे जल्द ही डायबीटीज़ मे बदल जाती है, ऐसे मे ऑपरेशन स्थिति को तुरंत नियंत्रित कर डायबीटीज़ से बचा सकता है।

• अस्थमा: अधिकतर अस्थमेटिक मरीजों को गंभीर अस्थमा अटैक मे कमी अथवा कई बार बिलकुल छुटकारा मिल जाता है। खासतौर से जब अस्थमा गैस्ट्रोइसोफ़ेगल रिफ्लक्स डीजीज से संबन्धित हो, तब गैस्ट्रिक बाइपास से जरूर फाइदा होता है।

• रेसपिरेटरी इंसफ़िसिएन्सी: सर्जरी के पहले कुछ हफ्ते मे व्यायाम सहनशक्ति और सांस लेने की क्षमता मे सुधार दिखता है। ऐसा देखा जाता है की जो मरीज़ मुश्किल से टहल सकते थे, उनके लिए भी पारिवारिक क्रियाकलापों मे शामिल होना और यहाँ तक की खेलना भी संभव हो गया।

• स्लीप एप्निया सिंड्रोम: हमारे मरीजों को वजन कम होते ही स्लीप एप्निया मे जादुई सुधार आता है। ज़्यादातर मरीजों की रिपोर्ट होती है कि सर्जरी के एक साल के भीतर उनके लक्षण पूरी तरह चले गए, और यहाँ तक कि उनके खर्राटे भी बंद हो गए, और इस बात से उनके जीवनसाथी भी सहमत थे। ऐसे मरीज जिन्हें स्लीप एप्निया के इलाज के लिए एसेसरी की जरूरत पड़ती थी, उन्हें वेट लॉस सर्जरी के बाद इसकी जरूरत नहीं पड़ती।

• गैस्ट्रो ईसोफ़ेगल रिफ्लक्स डीजीज: तकरीबन सभी मरीजों मे आमतौर पर सर्जरी के कुछ ही दिनों के भीतर रिफ्लक्स के लक्षण दिखने बंद हो जाते हैं। अब हम एक अध्ययन की शुरुआत कर रहे हैं यह पता लगाने के लिए कि ईसोफ़ेजियल लाइनिंग मेंबरेंस, जिसे बैरेट्स ईसोफ़ेगस कहते हैं, मे कोई बदलाव आता है या नहीं, अगर ऐसा है रो सर्जरी से ईसोफ़ेगस कैंसर के खतरे को भी कम किया जा सकता है।

• गालब्लेडर डीजीज: अगर सर्जरी के समय गालब्लेडर डीजीज मौजूद होती है, तो ऑपरेशन के समय गालब्लेडर निकालकर इसका इलाज किया जा सकता है। अगर गालब्लेडर सही स्थिति मे न हो तो इसे वैसे बाद मे निकालना जरूरी होता है।

• स्ट्रेस यूरिनरी इनकोंटीनेंस: इस स्थिति मे वजन घटाने वाली सर्जरी का काफी ज्यादा असर पड़ता है, और आमतौर पर यह पूरी तरह से नियंत्रित हो जाता है। एक व्यक्ति इसके बाद भी इनकोंटीनेंस से परेशान है, वह बाद मे इसके लिए खास करेक्टिव सर्जरी करा सकता है। शरीर का वजन कम होने के बाद इसके सफल होने का चान्स ज्यादा बढ़ जाता है।

• लो बेक पेन, डीजनरेटिव डिस्क डीजीज और डीजनरेटिव जाइंट डीजीज: मरीजों को वजन घटने के बाद दर्द से राहत और डीजनरेटिव अर्थराइटिस, डिस्क संबंधी बीमारी और वजन उठाने वाले जोड़ों के खराब होने के खरते से भी स्वत: ही छुटकारा मिल जाता है। ऐसा बेहद शुरुआती दिनों मे ही महसूस होने लगता है, पहले 15 से 20 किलो वजन की गिरावट के बाद से ही। हालांकि, अगर नर्व इरिटेशन या स्ट्रक्चरल डैमेज पहले से हो चुका है तो वजन घटाने कि सर्जरी से इसपर कोई फायदा नहीं होता, ऐसे मे सर्जरी के बाद भी दर्द रह सकता है।

Dr Atul N C Peters
Director –Bariatric & Metabolic Surgery
Fortis Hospital, Shalimar Bagh

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