स्कूली बच्चों की बड़ी मुसीबत बनी बुलीइंग

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bullying in schools

स्कूली बच्चों के  बुलीइंग (bullying ) एक बड़ी समस्या है। हालांकि आमतौर पर टीचर्स और पैरेंट्स बच्चों की सामान्य शरारत मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। मगर दिल्ली-एनसीआर के 300 स्कूलों मे किए गए एक सर्वे मे 96% लोगों ने माना है कि बुलीइंग का बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत गहरा असर पड़ता है। इससे न सिर्फ पढ़ाई से उनका मन उचट जाता है बल्कि उनके पूरे व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे बच्चों मे बड़े होने के बाद भी आत्मविश्वास की कमी रहती है।

फोर्टिस हेल्थकेयर के मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंस डिपार्टमेन्ट के डाइरेक्टर डॉ. समीर परिख कहते हैं कि, अक्सर बुलीइंग के बारे मे सोचने पर हमारे दिमाग मे बड़े बच्चों का ख्याल आता है, जो अक्सर आपस मे कहा-सुनी या हाथापाई करते रहते हैं, मगर सर्वे मे  57% लोगों ने माना है कि बुलीइंग 13 से 17 साल के बच्चों के बीच ज्यादा होती है और दिनों-दिन चाइल्ड बुलीइंग का दायरा बढ़ता जा रहा है।

क्या है चाइल्ड बुलीइंग

बार- बार बच्चों का नाम पुकारना,  उन्हें चिढ़ाना,  डराना,  सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बच्चों के साथ भद्दे मजाक करना आदि चाइल्ड बुलीइंग का पार्ट है। बुलीइंग की घटनाएं बच्चों के मन व मस्तिष्क पर बहुत गहरा खतरनाक प्रभाव डालती है।

सामने आती हैं ये दिक्कतें

बुलीइंग के शिकार बच्चों को जिंदगी में तमाम तरह की परेशानियों  जैसे इमोशनल ब्रेक डाउन, लर्निंग मे परेशानियाँ और कई बार सामाजिक स्तर पर भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बुलीइंग के चलते  बच्चे स्कूल जाने में आना कानी करने लगते हैं। ऐसे बच्चे धीरे-धीर खुद को सामाजिक जगहों,  फैमिली और दोस्तों को खुद से दूर रखना चाहते हैं। साथ ही उनके रिजल्ट और ग्रेड में भी गिरावट नजर आने लगती है। ऐसे बच्चों को सिर दर्द, पेट मे दर्द,  नींद आने मे दिक्कत, बुरे सपने आना और भूख न लगने जैसी दिक्कतें भी होती हैं।

क्या कहते हैं टीचर्स 

55% स्कूल टीचर्स  का मानना है कि बुलीइंग के कारण छोटे बच्चे स्कूल में बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं। 61%  का कहना है कि बुलीइंग क्लास रूम में होती है और 75% का  मानना है कि सबसे अधिक बुलीइंग स्कूल कॉरिडोर में होती है।

बचपन तक सीमित नहीं रहता असर

डॉ. परिख कहते हैं कि, बुलीइंग एक ऐसी समस्या है जिसमें कभी-कभी पीड़ित खुद भी दूसरों  को इसका शिकार बनाने लगता है। जब उसको घुटन और बहुत मानसिक दबाव होने लगता है तो वह उसे रिलीज करने के लिए दूसरे के साथ भी ऐसा करने लगता है। आमतौर पर बुलीइंग बच्चों में आत्मविश्वास की भावना को कम कर देती है। परिणामस्वरुप वह खुद को  अकेला और असहाय महसूस करने लगता है।  ऐसे में बच्चे आगे चलकर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। बुलीइंग के शिकार बच्चों पर इसका प्रभाव बचपन मात्र तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि बड़े होने पर भी ये घटनाएं उनके मन से बाहर नहीं निकल पाती।  यही चीजे आगे चलकर उनके करियर, सम्बन्ध बनाने की क्षमता, संवेदनशीलता और आत्मसम्मान को प्रभावित करती  हैं।

रहें अलर्ट

बुलीइंग से ना निपट पाने का सबसे बड़ा कारण है इसके गंभीर प्रभाव की जानकारी न होना। इस प्रकार की घटनाओं के बारे में आमतौर पर सबको पता नहीं चल पता सिवाय पीड़ित के। ऐसे मे पैरेंट्स और टीचर्स को बच्चों की एक्टिविटीपर नजर रखनी चाहिए और अगर कोई बच्चा बुलीइंग का शिकार  पाया जाए तो जल्द किसी चाइल्ड सायकायट्रिस्ट की हेल्प लेनी चाहिए। ऐसी घटनाएँ रोकने के लिए बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे वे एक दूसरे के प्रति अच्छा व्यवहार रखे और दूसरे बच्चों के साथ आक्रामक घटनाएं करने से बचे।

 

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