अस्थमा मीटर बनी देश की राजधानी दिल्ली

Share:

how-to-manage-asthma-in-winterअच्छी आबोहवा वाले क्षेत्र से दिल्ली पढ़ने या रोजी रोटी कमाने आए हैं तो अपनी सांसों की हरकतों पर जरूर ध्यान रखें। अगर राजधानी में आते कुछ दिनों के अंदर ही सांस लेने के क्रम में घरघराहट सुनाई देने लगे, छींकें आने लगे, सांस लेने में कुछ कष्ट का अनुभव हो, लगे कि सांस की गति थोड़ी बढ़ गई है तो सांस के इन नए लक्षणों को हल्के में कतई न लें। हो सकता है आपके अंदर शांत बैठा दमा (Asthma) दिल्ली आने पर का रोग करवटें लेने लगा हो।

विश्व अस्थमा दिवस( 3 मई) के मौके पर दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के सीनियर चेस्ट फिजीशियन एवं दमा रोग के जाने माने विशेषज्ञ डॉ. एम. के. सेन ने हेल्दीजिंदगी से खास बातचीत में कहा कि दमा एक खामोश रोग भी है। अगर अच्छी आबोहवा वाले क्षेत्र में रह रहे हैं तो संभव है आप लंबे समय तक इस बात से अंजान रह जाएं कि आप दमा के मरीज हैं। कभी दिल्ली की आबोहवा इतनी अच्छी हुआ करती थी कि कभी देश के किसी भी हिस्से में कोई बीमार पड़ता था तो डॉक्टर उन्हें एक सलाह यह भी देते थे कि कुछ महीने दिल्ली में रह आओ। लेकिन अब साफ उल्टा है। प्रदूषण की वजह से दिल्ली एक ऐसा गैस चैम्बर बन गया है कि यहां आना स्वास्थ्य के लिहाज से जोखिम भरा है।

डॉ. एम. के. सेन ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय, एम्स या सफदरजंग मेडिकल कालेज में बाहर से पढ़ने आने वाले कई छात्रों को दिल्ली आने पर पता चलता है कि वे तो दमा के रोगी हैं। ऐसा ही यहां रोजी रोटी कमाने के लिए आने वाले कई लोगों को पता चलता है। इसलिए दिल्ली आने के कुछ दिनों बाद सांस से जुड़ी गतिविधियों में खास बदलाव दिखे तो डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।

डॉ. सेन आगे कहते हैं- मेरे कहने का गलत अर्थ न लगा ले कोई इसलिए यहां साफ कर देना चाहता हूं कि मैं यह नहीं कह रहा कि दिल्ली के प्रदूषण से दमा हो जाता है। अभी तक इसका कोई प्रमाण नहीं मिला कि प्रदूषण से दमा होता है। दिल्ली की हवा तो सिर्फ ट्रिगर का काम करती है यानी आपके अंदर दमा खामोश बैठा है तो उसे उकसा देता है भड़का देता है। दिल्ली में दमा छुपा हुआ रह ही नहीं सकता। इसलिए दमा की जांच के लिए दिल्ली एक डायग्नॉस्टिक किट जैसा हो गया है। अगर आपको दमा नहीं है तो दिल्ली आ जाने से हो जाएगा ऐसा कतई नहीं। इस बारीकी को समझना पड़ेगा.

 

Share:

Leave a reply