ऐसे बचिए भूलने की बीमारी से

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dementia-prevention-is-the-only-optionडिमेंशिया दिमागी क्षमता में धीरे-धीरे कमी की एक स्थिति है। इसके सबसे आम प्रकार हैं अल्जाइमर्स डिजीज और वस्क्युलर डिमेंशिया। ये बीमारियां दिमागी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं और इनके सामान्य क्रियाकलाप को बाधित करती हैं। इससे याददाश्त, संचार और सोचने की क्षमता कम होती है। कई बार अल्जाइमर्स से पीड़ित लोगों के लिए अपने पैसे संभालना अथवा कपड़े पहनना तक मुश्किल हो जाता है।

बेहद परेशानी वाली स्थिति है डिमेन्शिया
किसी के लिए भी डिमेंशिया बेहद परेशानी वाली स्थिति होती है। धीरे-धीरे यह व्यक्ति के रोजमर्रा के क्रियाकलापों को भी कठिन बना देती है। उन्हें इतना अपंग बना देती है कि वो अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले ले पाने में भी अक्षम हो जाते हैं। वे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसे में परिवार को बहुत ज्यादा सहयोग और देखभाल उपलब्ध कराना पड़ता है। डिमेंशिया का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है।

2030 तक डबल होगी पीड़ितों की आबादी
डिमेंशिया भारत में एक अहम जनस्वास्थ्य का मुद्दा भी है, जो कि दिल की बीमारी, स्ट्रोक और कैंसर के बाद चौथी सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी है। बुजुर्गों में यह बहुत ही आम समस्या है और जैसे-जैसे लाइफ एक्सपेक्टेंसी बढ़़ रही है, बुजुर्ग लोगों की संख्या भी बढ़ेगी और इसके साथ ही डिमेंशिया के मरीजों की आबादी में बढ़ोत्तरी होगी। वर्ष 2030 तक, भारत में डिमेंशिया से पीड़ित लोगों की संख्या आज के 4 मिलियन के मुकाबले 8 मिलियन हो जाएगी।

इलाज नहीं, पर बचाव है संभव
अल्जाइमर्स एंड रिलेटेड डिसॉर्डर्स सोसायटी ऑफ इंडिया (एआरडीएसआई), दिल्ली चैप्टर की अध्यक्ष डॉ. मंजरी त्रिपाठी कहती हैं, रिसर्च बताते हैं कि डिमेंशिया होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार होते हैं। इनमें से एक बढ़ती उम्र है, जिसके लिए कोई कुछ नहीं कर सकता है। लेकिन ऐसे बहुत सारे खतरे हैं जिन्हें कम किया जा सकता है। हालांकि इस बीमारी का इलाज अब भी संभव नहीं हुआ है, लेकिन कुछ क्रियाकलापों और जीवनशैली में तब्दीली लाकर न सिर्फ इस बीमारी के होने वाले खतरे को कम किया जा सकता है, बल्कि हो जाने के बाद इसके बढ़ने की गति को धीमा भी किया जा सकता हैं।

शुरू से रहें अलर्ट
डिमेंशिया एक ऐसी चीज है जिसके बारे में कोई भी अपनी उम्र के 40वें या 50वें साल में सोचता भी नहीं है, बशर्ते कोई अपने करीबी को गंभीर रूप से प्रभावित होते हुए न देख चुका हो, जबकि सच यह है कि डिमेंशिया के बीज इसके लक्षण सामने आने के 30-40 साल पहले ही बोए जा चुके होते हैं।

इन उपायों को अपनाकर कम कर सकते हैं खतरा

नियमित जांचः दिल संबंधी खतरों जैसे कि हाइपरटेंषन और डायबीटीज से पीड़ित लोगों को अल्जाइमर्स का खतरा भी अधिक रहता है। ऐसे में अपने दिल की सेहत का ख्याल रखना दिमागी स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है। ऐसे में ब्लड प्रेषर और कोलेस्टृॉल की जांच समय-समय पर नियमित रूप से कराने की सलाह दी जाती है।

स्मोकिंग और ज्यादा अल्कोहल : स्मोकिंग से व्यक्ति के दिमाग की संज्ञानात्मक क्षमता प्रभावित होती है और अल्जाइमर्स डिजीज का खतरा बढ़ता है। हालांकि मामूली मात्रा में अल्कोहल का इस्तेमाल बीमारी के खतरे को कम कर सकता है, लेकिन बहुत ज्यादा मात्रा में लेने से अल्कोहल-संबंधी डिमेंशिया हो सकता है।

शारीरिक व दिमागी रूप से सक्रिय रहें: ऐसे लोग जो हमेशा सक्रिय रहते हैं उन्हें अन्य लोगों की तुलना में बीमारी होने का खतरा काफी कम रहता है। फैसले लेने में उन्हें आसानी होती है, कार्य संपादन, सतर्कता, योजना और कार्यों के संचालन की गति के मामले में भी ये लोग बेहतर होते हैं। तेज कदमों से टहलना, दौड़ना, तैराकी और योग से दिमाग को सक्रिय रखने में मदद मिलती है।

स्वस्थ खाएं: आप जो खाते हैं, उसको लेकर भी सतर्क रहें। अगर आप अपने दिमाग के लिए स्वस्थ आहार लेंगे तो आपका दिल भी दुरूस्त रहेगा और डायबीटीज नियंत्रण में रहेगी। कुछ अध्ययनों के मुताबिक, मछली का तेल और फोलिक एसिसड लेने से डिमेंषिया का खतरा कम होता है। ऐसे में खाने में ज्यादा फल, सब्जियां, अनाज, संतरे का जूस और मछली शामिल करने की सलाह दी जाती है। खाने में नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट की मात्रा कम करें।

सामाजिक दायरा बढ़ाएँ: दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ घुल-मिलकर रहने और सामाजिक दायरा बड़ा होने से आपकी भावनात्मकता बढ़ती है। दोस्त और परिवार के सदस्य एक सपोर्ट सिस्टम की तरह होते हैं और किसी भी तरह की खराब स्थिति से निबटने में आपकी सहायता करते हैं। तनाव दिमाग को कुंद कर देता है और अप्रत्यक्ष रूप से इसे निष्क्रिय कर देता है।

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