प्रेग्नेंसी में जरुरी है जेस्टेशनल डायबीटीज़ की जांच

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क्यों होती है जेस्टेशनल डायबीटीज़ ( gestational diabetes )
जेस्टेशनल डायबीटीज ( gestational diabetes ) इस बात पर निर्भर करती है कि आपका शरीर गर्भावस्था के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलावों जैसे कि प्लेसेंटृल लैक्टोजेन, कॉर्टिजोल के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देता है। यह बदलाव रक्त में शुगर की मात्रा जिसे ब्लड ग्लूकोज भी कहते हैं, के बढ़ जाने से होता है। जेपी अस्पताल नोयडा के एक्जेकेटिव कंसल्टेंट, ऑब्स्टेटिक्स एवं गायनी डॉ. संदीप चड्ढा कहते हैं, तकरीबन 15 प्रतिशत महिलाएं गर्भावस्था में जेस्टेशनल डायबीटीज की शिकार होती हैं।

अतिरिक्त वजन भी है जिम्मेदार
डॉ. चड्ढा कहती हैं, ‘हालांकि जेस्टेशनल डायबीटीज (gestational diabetes) के मूल कारणों का अब तक पता नहीं लग सका है, लेकिन यह स्थिति क्यों आती है, इस संबंध में कई सिद्धांत हैं। जेस्टेशनल डायबीटीज (gestational diabetes) की चपेट में आने वाली बहुत सी महिलाएं गर्भाधान से पहले सामान्य से अधिक वजन या मोटापे की चपेट में होती हैं। जेस्टेशनल डायबीटीज के अन्य कारणों में डायबीटीज का पारिवारिक इतिहास, जुड़वां बच्चे, महिलाएं जिनका पहले गर्भपात हुआ हो, पोलीसिस्टिक ओवरी हो, पहले गर्भाधान के समय जेस्टेशनल डायबीटीज हुआ हो या महिला की उम्र 25 साल से अधिक हो।’’

गर्भस्थ शिशु को भी रहता है खतरा
अगर एक महिला को गर्भावस्था के दौरान डायबीटीज है, तो इसका मतलब है कि उसका ब्लड शुगर स्तर सामान्य से अधिक रहता है, ऐसे में उसके बच्चे के लिए भी खतरे बढ़ जाते हैं। गर्भावस्था में अगर जेस्टेशनल डायबीटीज (gestational diabetes) हो और ब्लड शुगर स्तर का प्रबंधन ठीक ढंग से नहीं किया गया तो आपके बच्चे को समस्या हो सकती है। जेस्टेशनल डायबीटीज की वजह से महिला और उसके गर्भस्थ शिशु को कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि बच्चे का आकार बहुत बड़ा होने की वजह से जन्म के समय उसे चोट लगना, जन्म के बाद उसका ब्लड शुगर स्तर कम होना, नियोनेटल हाइपोग्लाइसीमिया, जन्म के तुरंत बाद पीलिया होने की वजह से बाद में उसे डायबीटीज होने का खतरा बढ़ जाता है, मृत पैदा होना अथवा बच्चे के दिल, किडनी और आंतों में विकृति होना आदि।
यह महिला के लिए भी गंभीर जटिलताएं उत्पन्न कर सकता है, जैसे कि बच्चे का वजन बहुत ज्यादा होना जिसमें डिलीवरी में तकलीफ ज्यादा होती है, सिजेरियन डिलीवरी, समय से पहले बच्चे का जन्म, मृत बच्चे का जन्म और बाद में डायबीटीज होने का खतरा बढ़ना। गर्भाधान से पहले और इसके बाद अपना ब्लड शुगर नियंत्रण में रखकर समस्या से बचा जा सकता है।’’

एशियन महिलाओं मे ज्यादा रहता है खतरा
एशियाई महिलाओं में अफ्रीकन अमेरिकन और ह्वाइट महिलाओं के मुकाबले गर्भावस्था में डायबीटीज होने का खतरा कहीं ज्यादा होता है। सभी गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था में होने वाली इस समस्या के बारे में जागरूक करना-इस स्थिति से बढ़ने वाले खतरों को बारे में बताना-जिसमें डिलीवरी के दौरान परेशानी ज्यादा होना और बच्चे को आने वाले जीवन में डायबीटीज के खतरे के बारे में जागरूक करना महत्वपूर्ण होता है।

सही प्रबंधन है जरूरी
जेस्टेशनल डायबीटीज (gestational diabetes) प्रबंधन में इसकी सही जांच भी महत्वपूर्ण भमिका निभाती है। बचाव के उपायों में सही वनज के विकास, व्यायाम, आहार और दवाओं से इलाज आदि के बारे में सही जानकारी होना जरूरी है। कई खुराकों में बांटकर इंसुलिन थेरेपी देने अथवा लंबे समय तक असर दिखाने वाली इंसुलिन या कम समय के लिए असरदार इंसुलिन के इस्तेमाल जैसी थेरेपी जेस्टेशनल डायबीटीज प्रबंधन का एक मानक फार्माकोलॉजी इलाज है। हाल में, ओरल हाइपोग्लाइसेमिक तत्वों का भी इस्तेमाल होने लगा है। इंसुलिन और ओरल हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट जेस्टेशनल डायबीटीज के इलाज में ज्यादा प्रभावी रहे हैं, रोज कई बार खाने के अपना ब्लड शुगर स्तर जांचते रहें, और मौजूदा स्थिति के अनुसार दवाओं और इनकी डोज आदि में बदलाव होते रहना चाहिए।

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