डॉक्टर्स को सताते हैं मेंटल हेल्थ के ये सवाल

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I want to be a mental care provider but…मैं देश के 3 लाख से भी ज्यादा डॉक्टर्स का प्रतिनिधित्व करता हूँ। जब मैंने एमबीबीएस किया था तब मुझे मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधी कोई विषय नहीं पढाया गया। सिर्फ कुछ लेक्चर में सायकायट्री यानि मनोचिकित्सा के बारे में बताया गया। इंटर्नशिप के दौरान बमुश्किल 1 सप्ताह के लिए सायकायट्री विभाग में ड्युटी लगी थी लेकिन उस दौरान वहाँ सायकायट्री के कोई फैकल्टी नहीं होते थे। एमडी मेडिसिन की पढाई के दौरान यह एक विषय जरुर था लेकिन सिर्फ नाम का।

बावजूद इसके मुझे यह भी पढाया गया कि स्वस्थ होने का मतलब सिर्फ बीमारियो से मुक्त होना नहीं बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसमें सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य शामिल है।

डब्ल्युएचओ के अनुसार हर चौथा व्यक्ति अपने जीवन मे कभी न कभी किसी प्रकार की मानसिक समस्या की चपेट मे आता है और हममे से 10% लोग जीवन के किसी पडाव पर मानसिक बीमारी से प्रभावित होते हैं। दुनिया में आत्महत्या के चलते हर 40 सेकंड मे एक जान चली जाती है। भारत में आत्महत्या की दर प्रति एक लाख व्यक्तियो पर 11.5% है और यहाँ हर तीसरे सेकंड एक व्यक्ती अपनी जान लेने का प्रयास करता है।
14 से 35 साल के आयुवर्ग में मृत्यु का तीसरा सबसे बडा कारण आत्महत्या है। इनमे से बडी संख्या में लोग अपने दोस्तो या डॉक्टर्स से सहायता लेने की कोशिश करते हैं।

मगर एक डॉक्टर के तौर पर मैं असहाय महसूस करता हूँ। मेरे मन में तमाम सवाल उठते हैं:
1. मुझे यह बताया गया है कि डिप्रेशन अब कोइ सामाजिक स्टिग्मा (कलंक) नहीं है। डिप्रेशन को मैंनेज करना और इसका इलाज करना सम्भव है। इसके लिये समय अर जांच जरूरी है। फिर इसे इंश्योरेंस कवर के तहत क्यू नही लाया जाता।
2. हमारे मरीज अस्पताल में भर्ती होते हैं तो डिप्रेशन के बारे में जानकारी नहीं देते, क्योंकि उन्हे अपना इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने का डर रहता है। सामजिक सोच के चलते हम लोग मेडिक्लेम फॉर्म भरते समय डिप्रेशन के इतिहास के बारे में नहीं लिखते जबकि हम सब जानते हैं कि यह न सिर्फ अनएथिकल है बल्कि इंडियन पीनल कोड 191 और 193 के तहत ऐसा कर्ने के लिए हमारे खिलाफ कानूनी कार्यवाई हो सकती है और एमसीआई के नियमो के अनुसार हमारा लाइसेंस कैंसल हो सकता है।
3. जब भी हम ऐसे मरीज को अस्पताल में भर्ती करते हैं तब हम उनकी फाइल पर एंटी डिप्रेशन दवा नहीं लिख सकते हैं, क्योकि इससे उनका इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने का डर रहता है। यहाँ तक कि हम उनके लिए किसी मनोचिकित्सक या काउंसिलर को भी नहीं बुला सकते हैं क्योंकि उनके बिल में इसकी जानकारी लिख दी जायेगी।
4. हम सब यह जानते हैं आमहत्या का ख्याल आना एक मेडिकल इमर्जेंसी है और ऐसे में मरीज को तुरंत भर्ती किया जाना चाहिए लेकिन अधिकतर मामलो में हम ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि यहाँ भी इंश्योरेंस रिजेक्शन का डर रहता है।
5. सरकार नशा, धुम्रपान जैसी आदतो के बारे सामाजिक जागरुकता कार्यक्रम चलाती है, बहुत सारे क्लीनिक्स चलाए जाते हैं लेकिन ऐसे मरीजो का इलाज इंश्योरेंस कवर के तहत क्यो नहीं किया जा सकता। जो लोग धूम्रपान करते हैं, शराब या ड्रग्स का सेवन करते हैं उनसे सरकार अतिरिक्त प्रीमियम चार्ज कर सकती है।
6. धूम्रपान मुक्ति, मोटापे का इलाज, नशामुक्ति, ड्रग्स की लत से छुटकारा जैसे हर इलाज को इंश्योरेंस कवर के तहत लाया जाना चाहिए।
7. नए प्रस्तावित मेंटल केयर हेल्थ बिल के क्लॉज 4 में कुछ सवालो के जवाब मिल सकते हैं। इसके हिसाब से इंश्योरेंस लेने वाला व्यक्ति अपनी पॉलिसी में ठीक उसी तरह मानसिक बीमरियो के इलाज हेतु प्रोविजन करा सकता है, जिस तरह शारिरिक बीमारियो के लिए। इस बिल के तहत आत्महत्या को गम्भीर तनाव की तरह ट्रीट किया जयेगा और इसे आइपीसी की धारा 309 के तहत दंडनीय भी नहीं माना जायेगा।
8. कुछ इसी तरह की समस्या नशीली चीजो का दुरुपयोग करने वालो के इलाज के दौरान भी सामने आती है। नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टेंसेज एक्ट 1985 के सेक्शन 27 के तहत इन चीजो के अनाधिकारिक इस्तेमाल पर सजा का प्रावधान है। ऐसे मे यह सवाल उठता है कि जब भी हमारे पास नशीले तत्वो का दुरुपयोग करने वाला व्यक्ति काउंसलिंग के लिये आता है, तब क्या हमें पुलिस को बुलाना होगा।
9. मौजूदा समय में देश भर में 150 मिलियन से भी अधिक लोग मानसिक समस्या से ग्रस्त हैं जबकि उनके इलाज के लिए यहाँ 6500 से भी कम सायकायट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) हैं। हालात यह हैं कि सायकायट्रिस्ट द्वारा दिया गया बिल किसी भी क्लेम के तहत रीएम्बर्स नहीं होता है।
10. सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि प्रफेश्नल्स द्वारा आत्महत्या के मामलो में डॉक्टर सबसे आगे हैं। आंकणो के मुताबिक एक लाख से भी अधिक डॉक्टरो को काउंसलिंग की जरुरत है। हालत यह है कि सिर्फ डॉक्टरो की समस्या के समाधान हेतु भी पर्याप्त सायकायट्रिस्ट नहीं हैं।
11. हमें हर मरीज के मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधी इतिहास के बारे मे जानना होता है, मगर वित्त मंत्रालय के एक दस्तावेज के मुताबिक एक डॉक्टर को एक मरीज के साथ औसतन 4 मिनट क समय मिलता है। इसी 4 मिनट में डॉक्टर को 2 बार हाथ धोने होते हैं, मरीज का स्वागत और उसका परिचय भी लेना होता है, अपने बारे में बताना होता है,गोपनीयता का ध्यान रखते हुए स्वास्थ्य स्थिति के बारे में जानना होता है जिसमे मानसिक स्वास्थ्य भी शामिल है, मरीज के सभी दस्तावेज पढ्ने होते हैं, अपना माइंड मेकअप करना होता है और मरीज को उसकी जांच व इलाज एवम् प्रबंधन के बारे में बताना होता है। आज के समय में 4 मिनट के अंदर इतना सब कर पाना असम्भव है।
12. भगवत गीता के पहले चैप्टर में जब अर्जुन डिप्रेशन में थे तब कृश्ण सिर्फ अर्जुन को सुनते रहे। क्या हमारे पास मरीज की बात सुनने के लिये इतना समय है? अथवा क्या हमारे मरीज हमारे साथ अधिक समय गुजारने के लिये हमें अधिक भुगतान कर सकते हैं। इसके लिये हो सकता है कि हमें अपनी प्रैक्टिस के लिए मेंटल हेल्थ काउंसलर, डाइटीशियन और फार्मासिस्ट को भी अपने एम्प्लॉई के तौर पर रखना पडेगा।
13. समय की कमी के चलते मरीज को तुरंत आराम पहुंचाने के लिए उन्हे क्षणिक राहत देने वाली दवा बेंजोडायजेपाइन देना पड्ता है जिसकी लत लग जाती है।
14. क्या हमें डिप्रेशन को डिप्रेशन कहना चाहिए? हमने हर उस बीमारी या समस्या का नाम बदल दिया जिसको लेकर समाज में स्टिग्मा है, तो डिप्रेशन का नाम क्यो न बदल दिया जाए।

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