आपका बच्चा भी ‘ipody’ है क्या?

Share:

is your child an ipody babyमेरे 10 महीने के बच्चे को सॉफ्ट ट्वायज, पजल्स, ब्लॉक्स, और यहाँ तक की म्यूजिकल खिलौने भी 5 मिनट से ज्यादा देर तक उलझाकर नहीं रख पाते, लेकिन मोबाइल, लैपटाप और आईपैड के साथ वह आधा-आधा घंटा खेल सकता है। मेरा लैपटॉप ऑन होते ही उसकी आँखों मे अलग चमक आ जाती है। सबकुछ छोड़कर लैपटॉप के लिए भागता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मुझसे ज्यादा अहमियत वह गैजेट्स को देता है। यह बात सिर्फ मेरे बच्चे पर लागू नहीं होती, बल्कि आजकल के अधिकतर बच्चों मे ऐसी ही आदत देखने को मितली है। ऐसे बच्चों के लिए आजकल एक शब्द ‘ipody baby’ काफी प्रचलित हो रहा है।

क्या क़हती है रिसर्च

माइकल कोहेन ग्रुप के चाइल्ड रिसर्च विशेषज्ञों द्वारा की गई एक स्टडी मे पाया गया कि आजकल के बच्चों के लिए टच स्क्रीन ने सभी तरह के खिलौनों को पीछे छोड़ दिया है। स्टडी मे ऐसे 60% पैरेंट्स जिनके बच्चे 12 साल से कम उम्र के हैं, ने माना कि उनके बच्चे पोर्टेबल टच स्क्रीन के साथ अक्सर खेलते हैं वहीं 38% ने माना कि उनके बच्चे कभी-कभी इसके साथ खेलते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इनमे से 36% बच्चों के पास अपना टच स्क्रीन डिवाइस भी है।

समस्या है गंभीर

आपको पता है यूएस के हर 3 मे से 1 ऐसे बच्चे को मोबाइल या  टैबलेट इस्तेमाल करना आता है जो अभी बोल भी नहीं सकते हैं। 2013 मे डेलीमेल की रिपोर्ट मे लिखा गया था कि 29% बच्चे एक साल से भी कम उम्र मे गैजेट्स के साथ खेलने लग जाते हैं और प्राइमरी स्कूल की उम्र कंप्लीट करते-करते वे इनके इस्तेमाल मे मास्टर हो जाते हैं। यह बात चौंकाने वाली जरूर मगर सच है।

क्या कहती है माएँ

अब सवाल यह उठता है कि बढ़ती उम्र के बच्चों तक टच स्क्रीन डिवाइस की आसान पहुँच क्या सही है? इसी सवाल का जवाब ढूँढने के लिए हमने कुछ मम्मी ब्लॉगर्स से बात की। बातचीत से पता लगा कि 5 से 12 साल की उम्र के बच्चों को उनके बर्थडे पर दिये जाने वाले गिफ्ट्स मे टेक्नॉलॉजी गैजेट्स पहली पसंद होते हैं, क्योंकि बच्चों की रुचि इन्हीं चीजों मे सबसे अधिक होती है। नई पीढ़ी को ट्रडीशनल खिलौने अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते।

क्या है वजह

चाइल्ड सायकायट्रिस्ट डॉ. दीपक गुप्ता कहते हैं, आजकल किसी भी एवरेज एडल्ट के लिए टीवी, स्मार्टफोन, टैबलेट जैसी चीजों से दूर रह पाना तकरीबन असंभव है। बच्चा अपने आस-पास जिन चीजों को ज्यादा देखता है उन्हीं की तरफ अट्रैक्ट होता है। बच्चों को इन चीजों से पूरी तरह दूर रख पाना उस जमाने मे संभव था जब इनकी उपलब्धता सीमित थी। लेकिन इनके इस्तेमाल की सीमा तो निर्धारित होनी ही चाहिए। क्योंकि बच्चों की सेहत पर इनका बहुत बुरा असर पड़ता है।

गैजेट्स, ओबेसिटी और एडीएचडी

अधिकतर पैरेंट्स को यह तो पता है कि गैजेट्स और टीवी का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों की आँखों के लिए ठीक नहीं है, लेकिन इसके अन्य गंभीर परिणामों के बारे मे शायद ही कोई जानता है।

2014 मे ब्रिटेन मे एसोसिएशन ऑफ टीचर्स ने एक रिपोर्ट दी थी जिसमे यह कहा गया था कि बच्चों मे ऐसे मोटर स्किल्स मे कमी की समस्या बढ़ रही है जिसकी जरूरत ब्लॉक्स बिल्डिंग और उससे खेलने के लिए होती है। ऐसे मे बच्चा आसानी से स्क्रीन की तरफ बढ़ जाता है। इस सबके लिए टैबलेट और स्मार्टफोन का एडिक्शन जिम्मेदार होता है।

ऐसे बच्चे जिन्हें शुरू से ही गैजेट्स के साथ खेलने की आदत लग जाती है उनकी फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है। वे पार्क मे जाकर खेलने के बजाय मोबाइल या टैबलेट के साथ खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। इस निष्क्रिय जीवनशैली के चलते एक अन्य गंभीर समस्या-‘बचपन का मोटापा’ बेहद आम हो रहा है। अक्सर देखा जाता है कि लोग बच्चों को खाना खिलाने के लिए टीवी के सामने बैठ जाते हैं। उन्हें लगता है कि इससे बच्चे का ध्यान बंटेगा और वह आसानी से खा लेगा। वक्त के साथ यह उनकी आदत का हिस्सा बन जाता है। खाने पर उनका नियंत्रण नहीं रहता और वे जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। गैजेट्स की लत बच्चे की नींद को भी प्रभावित करती है। बहुत सारे पैरेंट्स यह शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे टैबलेट या मोबाइल पर गेम खेलने के चक्कर मे टाइम पर सोते नहीं हैं।

गैजेट्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कई मानसिक समस्याओं की वजह भी बनता है। यह बच्चों मे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, ऑटिज्म जैसी दिक्कतों के लिए जिम्मेदार होता है। यूएस के सेंटर फॉर डीजीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, 4 से 17 साल की उम्र के 6 मिलियन से भी ज्यादा बच्चों मे एडीएचडी यानि अटेन्शन डेफ़िसिट हाइपरएक्टिविटी डिसॉर्डर है। पिछले दो दशकों मे यह संख्या तकरीबन दोगुनी हो चुकी है क्योंकी इस दौरान मोबाइल डिवाइस का इस्तेमाल बेहद तेजी से बढ़ा है।

ये समस्याएँ हैं आम

-ब्रेन के लिए अच्छा नहीं

-बच्चों मे भाषा के विकास मे देरी

-शारीरिक विकास मे देरी

-नींद पर असर

-बच्चों मे उत्तेजना, गुस्सा बढ़ना आदि।

क्या है रेकमेंडेशन

जहां तक बच्चों के लिए इन चीजों के इस्तेमाल के टाइम संबंधी रेकमेंडेशन की बात है तो अमेरिकन अकैडेमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के मुताबिक 2 साल से कम उम्र के बच्चों को एक मिनट के लिए भी टीवी तक नहीं दिखाना चाहिए। लेकिन यह रेकमेंडेशन 1999 की है जब स्मार्टफोन, टैबलेट और गेमिंग कंसोल्स आए भी नहीं थे।

-2 साल से कम उम्र के बच्चों को टीवी, मोबाइल और टैबलेट या लैपटॉप आदि से दूर रखेँ।

-3-5 साल के बच्चे को सिर्फ दिन मे एक घंटा टीवी दिखा सकते हैं।

-6-12 साल के बच्चे को दिन मे दो घंटे टीवी देखने दे सकते हैं।

-13 से 18 साल के  बच्चों को दो घंटे टीवी देखने दे सकते हैं। पोर्टेबल डिवाइस दे सकते हैं, जैसे कि मोबाइल। लेकिन वीडियो गेम खेलने की लिमिट सिर्फ 30 मिनट होनी चाहिए।

-बच्चों के बेडरूम मे टीवी या इन्टरनेट से कनेक्टेड कोई डिवाइस न रखें।

-कभी भी बच्चों को खुश करने के लिए गैजेट्स न दिलाएँ।

-बच्चों को हमेशा  अपने साथ बैठाकर टीवी, मूवी या वीडियो दिखाएँ। साथ ही उन्हें फैमिली वैल्यूज भी सिखाएँ।

-कोई भी मीडिया इस्तेमाल करने के लिए फैमिली प्लान लें और खाने व सोने के टाइम मे  टेक्निकल डिवाइस के लिए कर्फ़्यू लगा दें।

-यह भी ध्यान दें कि आपका बच्चा कौन सी वेबसाइट या टीवी प्रोग्राम देख रहा है। उन्हें वायलेंट गेम्स यय प्रोग्राम्स से दूर रखें।

 

Share:

Leave a reply