मेल इंफर्टिलिटी: हर बीमारी का है इलाज

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महिलाओं में जहां पोलीसिस्टिक ओवेरियन डीजीज़  (polycystic ovarian disease) प्रेग्नेंसी से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या है,वहीं पुरूषों में खराब स्पर्म काउंट (sperm count) की वजह से दिक्कत आती है।

बोर्न हॉल क्लीनिक गुड़गांव के आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. संदीप तलवार कहते हैं, ‘इनफर्टिलिटी (infertility) उस स्थिति को कहते हैं जब बिना गर्भनिरोधक  (contraceptive) के इस्तेमाल के एक साल तक संबंध बनाने के बावजूद कोई कपल फैमिली प्लानिंग में असफल रहता है। आमतौर पर 12 महीनों में गर्भधारण हो जाता है।

लोगों में एक आम धारणा है कि गर्भधारण न हो पाने के लिए महिलाओं की समस्या ही जिम्मेदार होती है। जबकि सच यह है कि,इनफर्टिलिटी के तकरीबन 30% मामलों में समस्या पुरूषों की तरफ से होती है। इसके अलावा, 30 पर्सेंट मामले ऐसे होते हैंजिनमें दोनों तरफ से समस्या जिम्मेदार होती है। पुरूषों की समस्या की पहचान का जो सामान्य तरीका है, वह है सीमेन एनालिसिस (semen analysis)।

क्या है समस्या की  वजह

पुरूषों में इनफर्टिलिटी के लिए कई कारण जिम्मेदार होते हैं,जिनमें बचपन में हुआ कोई इन्फेक्शन,हार्मोनल डिसॉर्डर,जेनेटिक कारण और शारीरिक अक्षमता आदि शामिल है। जो पुरूष स्मोक करते हैं और अल्कोहल लेते हैं उनमें स्पर्म काउंट अन्य पुरूषों के मुकाबले 13-17% तक कम होता है। आजकल,स्ट्रेस और लाइफस्टाइल संबंधी बीमारियां इनफर्टिलिटी की समस्या को और बढ़ा रही हैं। डॉ. तलवार कहते हैं,सिर्फ डीटेल्ड जांच के बाद ही कोई डाइग्नोसिस बनाया जा सकता है।

पुरुषों की इंफर्टिलिटी के कुछ अन्य कारणों में सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियां (sexualy transmitted disease) जैसे कि गोनोरिया (gonorrhea) या क्लेमीडिया (chlamydia) भी जिम्मेदार होती हैं,जिसके चलते स्पर्म को  बाहर पहुंचाने वाले ट्यूब बंद हो जाते हैं। बचपन में हुआ गलकंठ रोग भी कई बार टेस्टिक्युलर डैमेज अथवा फेलियर और स्पर्म की अनुपस्थिति के लिए जिम्मेदार हो सकता है। आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. श्वेता गोस्वामी कहती हैं,स्पर्मबैंक के आस-पास की नसों में सूजन भी पुरुषों की इंफर्टिलिटी के लिए जिम्मेदार हो सकती है।

हर दिक्कत का है इलाज

आईयूआईः नई टेक्नॉलॉजी की मदद से वे पुरूष भी पिता बनने में सफल हो सके हैं,जिनका स्पर्म काउंट बेहद कम था। अगर स्पर्म काउंट कम से कम 10 मिलियन होता है,तब इंट्रायूटरेन इनसेमिनेशन (intrauterine insemination) यानी आईयूआई का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तकनीक में सीमेन को लैब में खास तरीके से साफ किया जाता है और ट्यूब के इस्तेमाल से,महिला की कोख में बेहद कम मात्रा में स्पर्म रखा जाता है। डॉ. गोस्वामी के मुताबिक,यह बेहद सामान्य और कम खर्चीली प्रक्रिया है।

आईसीएसआईः अगर काउंट बहुत कम है तो इंट्रासिटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (intracytoplasmic sperm injection) यानी आईसीएसआई का विकल्प अपनाते हैं।यह टेस्ट ट्यूब बेबी की प्रक्रिया जैसा है। इसमें सोनोग्राफी कंट्रोल के तहत महिला के एग्स को नीडल से निकाला जाता है और इसे माइक्रोस्कोप में रखा जाता है। इसके बाद प्रत्येक स्पर्म को नीडल से निकालकर इसे माइक्रोमैनिपुलेटर के साथ सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है। इससे एग फर्टाइल होकर डिवाइड हो जाता है और दो-तीन दिन बाद एंब्रायो को कोख में इंप्लांट कर दिया जाता है।

टीईएसएः ऐसे मामलों में,जिनमें सीमेन में स्पर्म होते ही नहीं हैं,लेकिन हार्मोन टेस्ट नॉर्मल होता है, स्पर्म को छोटी नीडल के जरिए सीधे पुरुष के स्पर्म बैंक (वीर्यकोष) से निकाला जाता है। इस तकनीक को टीईएसए कहते हैं।इसमें किसी तरह के कट या बड़ी सर्जरी की जरूरत नहीं होती है। इसके बाद आईसीएसआई प्रक्रिया अपनाते हुए लिया गया स्पर्म एग में  इंजेक्ट कर दिया जाता है।

डोनर स्पर्मः कुछ मामलों मेंकंप्लीट टेस्टिक्युलर फेलियर हो जाता है और हार्मोनल समस्या के साथ स्पर्म की अनुपस्थिति होती है। ऐसे मामलों मेंसिर्फ एक विकल्प बचता है, और वह है डोनर स्पर्म (donor sperm)। ये सीमेन बैंक से लिए जाते हैं, जिन्हें एचआईवी, हेपेटाइटिस की सैंपल टेस्टिंग के बाद स्टोर किया गया होता है। ये सीमेन महिलाओं में इंजेक्ट किए जाते हैं। डॉ. श्वेता कहती हैं,इस सामान्य और कम खर्चीली तकनीक से गर्भधारण की संभावना बहुत ही ज्यादा होती है।

 

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