ओसीडी: अब सर्जरी से कराएं इलाज!

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डीबीएस प्रॉसीजर ने जगाई नई उम्मीद

ओसीडी ब्रेन में केमिकल असंतुलन का परिणाम होता है। इलाज के लिए अब 20-30 साल पहले के मुकाबले बेहतर दवाएं आ गई हैं, मगर कुछ मामलों में ये भी निष्प्रभावी हो जाती हैं, ऐसे में डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन  यानी डीबीएस सर्जिकल प्रॉसीजर ने एक नई उम्मीद जगाई है।

इसे दो-तीन साल पहले ही एफडीए अप्रूवल मिला है और इंडिया में अब तक 3-4 मामले ही किए गए हैं, यही वजह है कि इसके 100 पर्सेंट सफल होने की गारंटी अब तक नहीं ली जाती है। डीबीएस का पार्किंसन में बहुत फायदा देखा गया है। ऐसे में जिनमें पार्किंसन के साथ ओसीडी भी होता है, उनमें डीबीएस से ओसीडी पूरी तरह ठीक हो जाता है।

हालांकि प्योर ओसीडी में इसके परिणाम खास अच्छे नहीं हैं। दिल की बीमारियों के इलाज के लिए जैसे पेसमेकर लगाते हैं, वैसे ही इसमें भी चेस्ट में एक पेसमेकर लगाते हैं, जिसके इलेक्ट्रोड ब्रेन में लगते हैं। इसके अंदर प्रोग्रामिंग की जरूरत पड़ती है। इसके लिए 5 दिन हॉस्पिटल में रहना होता है। डिवाइस बैटरी से चलती है। इसमें दो तरह की बैटरी, रीचार्जेबल व नॉन रीचार्जेबल का इस्तेमाल होता है। रीचार्जेबल बैटरी वाली प्रक्रिया में 12-13 लाख रूपये का खर्च आता है। नॉन रीचार्जेबल में कम खर्च आता है, मगर बार-बार सर्जरी की जरूरत होती है। क्योंकि इसमें करंट की जरूरत ज्यादा होती है और बैटरी 2-3 साल ही चलती है। पहली बार नॉन रीचार्जेबल प्रॉसीजर में 9-10 लाख का खर्च आता है।

क्या है ओसीडी
कुछ लोगों को किसी काम या आदत की धुन इस कदर सवार होती है कि वह सनक बन जाती है और बीमारी का रूप ले लेती है। इससे उनकी लाइफ पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे लोग ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसोर्डर;ओसीडीद्ध से पीड़ित होते हैं। दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोग यह मानने को तैयार नहीं होते कि उन्हें ऐसी कोई समस्या है। हालांकि अगर वे वास्तविकता को स्वीकार कर लें तो इलाज काफी आसान हो जाता है।

ओसीडी के इलाज के लिए थेरपी
ओसीडी के इलाज में जो सबसे प्रभावी थेरपी है वह है संज्ञानात्मव्यावहारिक थेरपी यानी Cognitive Behavioral Therapy । कर्इ बार थेरपी के साथ इसमें डिप्रेशन की दवाएं भी दी जाती हैं, हालांकि ओसीडी के इलाज में अकेले दवा कारगर नहीं होती।

इस थेरपी के दो हिस्से होते हैं
-पहला: एक्सपोजर एंड रेस्पॉन्सिव प्रिवेंशन: इसमें पीड़ित को बार-बार ऑब्सेशन के सोर्स के संपर्क में लाया जाता है। इसके बाद आपको उस कंपल्सिव बिहेवियर से परहेज करने के लिए कहा जाता है] जिसे आप बार-बार करते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आप एक कंपलसिव हैंडवॉशर हैं यानी आपको बार-बार हाथ धोते रहने की समस्या है तो आपको पब्लिक टॉयलेट के दरवाजों के हैंडल छूने के लिए कहा जा सकता है और इसके बाद आपको हाथ धोने से रोका जाता है। हालांकि इसके बाद आप चिंता के साथ बैठेंगे, मगर ऐसा करने से बार-बार धोने से जुड़ी आपकी घबराहट धीरे-धीरे अपने आप कम होने लगेगी। ऐसे में आप समझ जाएंगे कि आपको अपनी चिंता दूर करने के लिए बार-बार हाथ धोने की जरूरत नहीं है। इस लेवल पर पहुंचने के बाद आप खुद अपने ऑब्सेसिव ख्याल और कंपलसिव बिहेवियर पर कंट्रोल पा लेंगे।

-दूसरा: संज्ञानात्मक थेरपी: (Cognitive therapy)  इसके तहत आपके दिमाग में आने वाले बुरे-बुरे खयालों को कम करने और अपनी जिम्मेदारियों को बढ़ा-चढ़ाकर समझने के एहसास को काबू में करने की कोशिश की जाती है। ओसीडी में कॉग्निटिव थेरपी की सबसे ज्यादा भूमिका यह सिखाने की होती है कि आप बिना कंपल्सिव बिहेवियर के अपने ऑब्सेसिव ख्यालों पर किस तरह से स्वस्थ और प्रभावकारी रिएक्शन दें।

ऐसे होता है इलाज
स्टेज 1
रीलेबल: यह स्वीकार करना कि आपके रुटीन और संबंधों में दखल दे रहे ऑब्सेसिव विचार और काम ओसीडी का नतीजा हैं। उदाहरण के लिए, अपने आपको यह कहना सिखाएं कि मुझे नहीं लगता कि मेरे हाथ गंदे हैं। मुझे अपने हाथ गंदे होने का ऑब्सेशन है।

स्टेज 2
उत्तरदायी ठहराना: खुद को यह अहसास कराना कि आपकी परेशानियों की वजह ओसीडी है, जिसके लिए शायद आपके दिमाग में बायोकेमिकल इम्बैलेंस जिम्मेदार है। खुद से कहें, यह आप नहीं कर रहे बल्कि आपका ओसीडी आपसे करवा रहा है। खुद को बार-बार यह याद दिलाएं कि ओसीडी की वजह से आपको आने वाले ख्याल बेमतलब हैं। दिमाग झूठे मेसेज भेज रहा है।

स्टेज 3
ध्यान केंद्रित करना:  अपना ध्यान कहीं और लगाकर ओसीडी के ख्यालों को नजरअंदाज करने की कोशिश करें। ऐसा रोजाना कम-सेकम कुछ देर के लिए जरूर करें। खुद से कहें, मैं ओसीडी के लक्षणों से गुजर रहा हूं, इसलिए मुझे किसी दूसरे काम पर ध्यान देने की जरूरत है।

स्टेज 4
फिर से मूल्यांकन करना: ओसीडी के ख्यालों को अहमियत न दें। ये महत्वपूर्ण नहीं होते। खुद से कहें, यह सिर्फ मेरा बेवकूफाना ऑब्सेशन हैं। इसका कोर्इ मतलब नहीं। इस पर ध्यान देने की कोर्इ जरूरत नहीं। याद रखें, आप इन ख्यालों को आने से नहीं रोक सकते लेकिन आपको इस पर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं होती। आप अगले बिहेवियर की तरफ बढ़ना सीख सकते हैं।

फैमिली सपोर्ट जरूरी
चूंकि ओसीडी की वजह से अक्सर फैमिली लाइफ और सोशल जिम्मेदारी निभाने में समस्या आती है। ऐसे में इससे निजात पाने में फैमिली थेरपी फायदेमंद साबित हो सकती है। फैमिली थेरपी डिसॉर्डर को समझने के लिए पीड़ित को प्रेरित कर सकती है और परिवार के सदस्यों के बीच होने वाले विवादों को खत्म कर सकती है। यह परिवार के सदस्यों को प्रेरित कर सकती है और सिखा सकती है कि वे ओसीडी से पीड़ित अपने करीबी की किस तरह मदद करें।

फैमिली थेरपी क्या
-पीड़ित को लेकर नेगेटिव बातें ना करें और ना ही आलोचना करें। इससे उसकी समस्या और गंभीर हो सकती है।
-उसका मजाक न बनाएं और न ही उसे जबरन कंपल्सिव बिहेवियर करने से रोकें।
-परिवार और घर का माहौल अच्छा बनाए रखने की कोशिश करें। मरीज को किसी दूसरे काम में बिजी रखें ताकि वह कंपल्सिव बिहेवियर से बचे।
-पीड़ित को खुश रखने की कोशिश करें।

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