इस दर्द की वजह पीसीओडी तो नहीं!

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जीवनशैली में बदलाव के साथ-साथ मोटापा महिलाओं को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है और इसके साथ सामने आ रही हैं तामाम तरह की अन्य बीमारियां जिनमें पीसीओडी  (polycystic ovarian syndrome) भी खास है।

मोटापे की शिकार महिलाओं में से 90 पर्सेंट से भी अधिक को पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (polycystic ovarian syndrome) यानी पीसीओएस अथवा पीसीओडी होने का खतरा है। पीसीओएस इंफर्टिलिटी (infertility) के मुख्य कारणों में से एक है।

कई स्टडीज़ के मुताबिक मौजूदा समय में गर्भधारण के एजग्रुप वाली तकरीबन 35 पर्सेंट महिलाएं इससे पीड़ित हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसकी वजहों में जीवनशैली में तेजी से आ रहा बदलाव, खानपान की आदतों और एक्सरसाइज के तरीकों में बदलाव आदि भी शामिल हैं। हालांकि अब भी इस बीमारी के प्राथमिक कारण का पता नहीं लग सका है। इतना ही नहीं, इस बीमारी को अब तक गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इस बारे में हमने बात की एम्स की पूर्व एचओडी डॉ. सुनीता मित्तल और नोवा स्पेशियलिटीहॉस्पिटल की डॉ. शीतल अग्रवाल से।

बीमारी के लक्षण

ऐसी युवा महिलाएं जिनमें पीसीओएस या पीसीओडी का पता लगता है, उनमें आमतौर पर अनियमित माहवारी, मोटापा, बांझपन, मुहासे, शरीर के बालों की अनियमित ग्रोथ और सिर के बालों के कम होने जैसे लक्षण दिखते हैं। इसके साथ ही पेट के आस-पास अत्यधिक मात्रा में फैट जमा होने की समस्या भी दिखती है। अधिकतर महिलाओं की बीमारी का पता इन लक्षणों के इलाज के दौरान पता चल पाता है। कुछ मामलों में ये लक्षण टीनएज की शुरूआत और माहवारी के शुरू होने के समय से दिखने लगते हैं तो कई मामलों में 25-26 साल की उम्र के बाद ये लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं। अलग-अलग क्लाइमेट में रहने वालों में इसके अलग-अलग लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

इंसुलिन रेजिस्टेंस भी हो सकता है

पिछले एक दशक में ऐसा देखा गया है कि पीसीओएस इंसुलिन रेजिस्टेंस की एक स्थिति है। इसका मतलब है कि इससे पीड़ित लोगों में इंसुलिन की मात्रा काफी ज्यादा होती है जिसके चलते गर्भाशय से टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन (testosterone hormone) काफी अधिक मात्रा में बनता है। अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरॉन बनने से एग्स नहीं बनते, इस स्थिति को अनओवुलेशन (anovulation) कहते हैं, अमेनोरिया हो जाता है जिसमें माहवारी नियमित रूप से नहीं आती और इंफर्टिलिटी की समस्या हो जाती है। ऐसे मामलों में माहवारी के अनियमित पीरियड, देरी से इसका आना और ज्यादा ब्लीडिंग होने जैसे लक्षण दिखते हैं। कई महिलाओं को तो महीनों तक या फिर सालों तक पीरियड नहीं होता है।

मेटाबोलिक डिसोर्डर से भी है लिंक

पीसीओएस का संबंध कई तरह की मेटाबोलिक समस्याओं (metabolic disorders) से है। मसलन, कोलेस्ट्रॉल का लेवल काफी ज्यादा होना, हाई ब्लड प्रेशर और पेट का मोटापा। इससे टाइप-2 डायबीटीज होने, दिल की बीमारियों, एंडोमेट्रियोसिस और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। पेट के मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में अनीमिया की समस्या भी हो सकती है।

लाइफस्टाइल मैनेजमेंट

बिना दवा लिए या दवा लेकर पीसीओएस की समस्या दूर करने के लिए महिलाओं को लाइफस्टाइल में बदलाव करना बेहद जरूरी होता है। बैलेंस्ड डाइट और एक्सरसाइज इस बीमारी से निजात दिलाने में सबसे बड़ा सहायक हो सकता है।

वजन घटाएँ (lose weight)

पीसीओएस से पीड़ित मोटी महिलाओं को सबसे पहले अपना वजन घटाना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि पीसीओएस से पीड़ित मोटी महिलाओं में 10-15% वजन घटाने से इंफर्टिलिटी की समस्या से 75 पर्सेंट तक छुटकारा मिलता है।पीसीओस में नियमित एरोबिक एक्सरसाइज काफी फायदेमंद साबित हो सकती हैं, क्योंकि इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस में सुधार होता है।

अल्कोहल से बचें

अल्कोहल इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या को बेहद गंभीर बना सकता है, ऐसे में पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को इससे पूरी तरह परहेज करना चाहिए। अगर कोई इससे पूरी तरह परहेज नहीं कर सकता है तो उसे 24 घंटे में एक पेग से ज्यादा नहीं लेना चाहिए। इसके साथ ही कॉकटेल से बचें।

जानलेवा हो सकती है सिगरेट

पीसीओएस पीड़ित महिलाओं के लिए सिगरेट पीना जानलेवा हो सकता है क्योंकि इससे दिल की बीमारियों और डायबीटीज का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है।

कैसा हो खान-पान

एक  बैलेंस्ड डाइट, जिसमे कार्बोहाइड्रेट कम हो,  गुड फैट हो और ज्यादा प्रोटीन हो, इसमें मददगार साबित हो सकता है। लो ग्लाइसेमिक  इंडेक्स (low glycemic index foods) वाला कार्बोहाइड्रेट लिया जा सकता है, यानी जिसमें शुगर की मात्रा कम हो। लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली चीजें धीरे-धीरे पचती हैं जिससे लिवर से कम मात्रा में इंसुलिन निकलता है। दलिया, जई, ओट, साबुत बीज और राजमा जैसी चीजें शरीर में अच्छे कोलेस्टृॉल की मात्रा बढाती हैं। इनसे वजन घटाने, इंसुलिन सेंसिटिविटी और पीसीओएस को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है। बहुत ज्यादा मीठे फल और इनका जूस, स्टार्च वाली सब्जियां जैसे आलू  से परहेज करें। पॉलिश किए हुए चावल, पास्ता, नूडल्स, ब्रेड, इडली और डोसा आदि से बचें। मीठे पेय पदार्थ और कैंडी खाने से भी परहेज करें। दुर्भाग्यवश पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों सामान्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा अच्छी लगती हैं। इससे वजन तेजी से बढ़ता है। इस स्थिति से निबटने के लिए पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को थोड़ा-थोड़ा और बार-बार खाना चाहिए।

बीज और नट्स हैं बेस्ट -पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं के लिए बीज और नट्स से मिलने वाला प्रोटीन बेस्ट होता है। ऐसा माना जाता है कि मोनोसैचुरेटेड फैट (monounsaturated fats) कोलेस्टृॉल (cholesterol) और इंसुलिन (insulin) को कंट्रोल करने में मददगार साबित होता है। – अच्छा फैट जिसमें ओमेगा-3 होता है,उसके स्रोत हैं मछली व अखरोट आदि। मोनोअनसैचुरेटेड फैट के स्रोतों में सरसों का तेल, ऑलिव आयल, कैनोला आयल, मूंगफली और बादाम है। मेथी के दाने, दालचीनी, करेला और जामुन भी फायदेमंद होता है।

 

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