23 वर्षीय युवती का सफल हार्ट ट्रांसप्लांट

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successful heart transplant in delhi
हृदय रोग के आखिरी चरण में पहुंच चुकी 23 साल की ओशिन गोयल ने सफल हार्ट ट्रांसप्लांट कराने के बाद एक नई जिंदगी हासिल कर की है। दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट में कार्डियोवैस्क्यूलर सर्जरी विभाग के निदेशक एवं कोर्डिनेटर डाॅ. जे. एस.मेहरवाल ने इसप्रत्यारोपण को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।

हृदय दान करने वाले 58 वर्षीय व्यक्ति को ब्रेन हेमरिज हो गया था और उसे तुरंत एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल के आसपास के डाॅक्टर भीजब उसकी जिंदगी लौटाने में विफल रहे तो मरीज को फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफएमआरआई) रेफर कर दिया गया। उनका हृदय निकालने में महज 27 मिनट 56 सेकंड लगे और प्रत्यारोपण के लिए संपूर्ण सर्जिकल प्रक्रिया चार घंटे में पूरी हो गई।

ओशिन गोयल पिछले नौ साल से रेस्ट्रिक्टिव कार्डियो मायोपैथी से जूझ रही थी। शुरू-शुरू में उसके पैरों और टांगों में सूजन से यह तकलीफ शुरू हुई और धीरे-धीरे समस्या बढ़ते हुए सांस लेने की तकलीफतक फैल गई। पेट औए चेहरे पर भी इसका असर पड़ा। जांच करने पर उसे एक दुर्लभ कार्डियक बीमारी, ‘रेस्ट्रिक्टिव कार्डियो मायोपैथी’ ‘ होने का पता चला। इसके बाद उसका इलाज फोर्टिस एस्कॉर्ट्स के हार्ट फेल्योर सेंटर में शुरू किया गया।

कार्डियोमायोपैथी का ही सबसे दुर्लभ स्वरूप माने जाने वाली रेस्ट्रिक्टिव कार्डियो मायोपैथी एक ऐसी स्थिति है जिसमें वेंट्रिकल्सके निचले चैंबर्स की दीवारें असामान्य रूप से सख्त हो जाती हैं और फैलने-सिकुड़ने की लचक खत्म हो जाती है क्योंकि वेंट्रिकल्स में रक्त भरा होता है। लिहाजा उचित तरीके से हृदय का फैलाव और इसमें नए रक्त की भरपाई बाधित हो जाती है और अंततः यह स्थिति हार्ट फेल्योर का कारण बन जाती है।हृदय की कमजोर पंपिंग के परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न हिस्सों तक आॅक्सीजन की पर्याप्त मात्रा नहीं पहुंच पाती है और शरीर में जल की अत्यधिक मात्रा एकत्रित होने लगती है। फेफड़े, पेट और नसों जैसे अंग पानी से भर जाते हैं जिससे शरीर में सूजन हो जाती है। ऐसी कोई दवा नहीं बनी है कि इस स्थिति से उबरा जा सके या इस पर काबू पाया जा सके। रेस्ट्रिक्टिव कार्डियोमायोपैथी की स्थिति के लिए अस्थायी उपकरण भी उपलब्ध नहीं हैं। इस मरीज को ट्रांसप्लांट जरूरतमंदों की सूची में रखा गया।

डाॅ. मेहरावल ने बताया कि यह केस हमारे लिए एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि ओशिन पिछले चार महीनों से बिस्तर पर ही लेटी थी और उसका हृदय अत्यंत कमजोर होने के बावजूद हमें उसकी जिंदगी बचाने के लिए दृढ़निश्चयी बनना था। वह मौत के मुहाने पर खड़ी थी और हमारे हाथ में उसे मौत के मुंह से खींच लाने की एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अब वह अच्छी तरह रिकवर कर चुकी है और स्वास्थ्यलाभ कर रही है। उसे अपने पैरों पर खड़ा देखकर और दोबारा जिंदगी का आनंद उठाते देखकर हमें वाकई बहुत खुशी हो रही है।उन्होंने कहा कि हम ज्यादा से ज्यादा ऐसे मरीजों की मदद के लिए तैयार हैं जो अंतिम चरण के हार्ट फेल्योर दौर से गुजर रहे हैं और नाउम्मीद हो चुके हैं।

फोर्टिस हार्ट इंस्टीट्यूट में हार्ट फेल्योर प्रोग्राम के प्रमुख डाॅ. विशाल रस्तोगी ने बताया कि ट्रांसप्लांट कराने वाली इस युवा मरीज के लिए ट्रांसप्लांट के बगैर जिंदा रहने का बहुत कम वक्त रह गया था। उसके हृदय को सुचारू रखने के लिए सर्जरी के बाद भी अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता के मुताबिक उसे सहयोग करने की हमारी जिम्मेदारी कम नहीं हुई थी। इस मामले में हमें महारत हासिल है हम हृदय की नाकामी की स्थिति में हर तरह की अत्याधुनिक देखभाल मुहैया कराते हैं।

फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट के चेयरमैन डाॅ. अशोक सेठ ने कहा कि एक अत्यंत बीमार युवती का हार्ट ट्रांसप्लांट कर हमने दूसरी बार कामयाबी हासिल की है। इस सफलता से हम भारत के चंद हार्ट ट्रांसप्लांट संस्थानों में शुमारहो गए हैं जहां नाकाम हृदय के मरीजों को अत्याधुनिक देखभाल मुहैया कराई जाती है।

फोर्टिस हार्ट इंस्टीट्यूट के क्षेत्रीय निदेशक डाॅ. सोमेश मित्तल कहते हैं, भारत में हर साल कार्डियोवैस्क्यूलर रोगों के कारण 30 लाख से अधिक मरीजों की मौत हो जाती है और यही वजह है कि भारत को ‘दुनिया में हृदय रोग की राजधानी’ करार दिया गया है।। इस हार्ट ट्रांसप्लांट की कामयाबी के साथ ही हमने अपने डाॅक्टरों की दक्षता एवं विशेषज्ञता के सर्वोच्च स्तर की एक बार फिर मिसाल कायम की है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरा हार्ट ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में जबर्दस्त तरक्की हुई है। आज ट्रांसप्लांट कराने वाले 85 प्रतिशत से अधिक मरीज कम से कम एक साल ज्यादा जीते हैं और ऐसे ही 70 प्रतिशत से ज्यादा मरीज पांच साल से ज्यादा जीने लगे हैं। हालांकि मरीजों को किसी डोनर का हार्ट पाने के लिए लंबी प्रतीक्षा सूची का सामना करना पड़ता है। अंगदान के नेक कार्य के प्रति अधिक से अधिक जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर बहुत ज्यादा जोर देना पड़ेगा। भारत में सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर साल सबसे ज्यादा लोगों की मौत होती है विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे के मुताबिक सड़क दुर्घटनाओं के कारण मरने वाले 60 प्रतिशत लोगों की उम्र 15 से 44 वर्ष ही होती है। इस आयुवर्ग के लोग युवा और स्वस्थ माने जाते हैं और असमय मृत्यु होने वाले ऐसे लोगों के परिजन अंगदान की जरूरत और अंग प्रत्यारोपण की जरूरत के बीच भारी अंतर को अंगदान के जरिये कम कर सकते हैं। निःसंदेह इस नेक कार्य से कई लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है क्योंकि कई लोगों की मौत दाताओं द्वारा दान किए जाने वाले
अंगों की अनुपलब्धता के कारण ही हो जाती है।

ओशिन गोयल से जब बात की गई तो वह भावुक हो उठी। आंसू भरी आंखों से उसने डाॅक्टरों तथा दानकर्ता के परिवार का आभार व्यक्त किया और कहा, मेरे पास आभार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं हैं। मैं उस परिवार के प्रति कृतज्ञ हूं जिसने मुझे जीवनदान का तोहफा देने के लिए हृदयदान का यह नेक फैसला किया है। अब मैं अपने जीवन का दायित्व संभालने का इंतजार कर रही हूं और अपने जीवन में आने वाली किसी भी चुनौती पर विजय पाने की उम्मीद कर रही हूं।

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