क्लासरूम का ज्यादा शोर भी कर देगा बीमार

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लगातार शोर-शराबे वाले माहौल में रहने से हमारी सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है जो वक्त के साथ बहरेपन का कारण भी बन सकती है। 85 डेसिबल से अधिक शोर खतरनाक साबित हो सकता है, भले ही यह शोर क्लासरूम का ही क्यूँ न हो। इसमेँ क्लासरूम का अतिशय शोर भी शामिल है।

 

गौर करने वाली बात यह है कि न्वॉयज पॉल्युशन का असर सिर्फ कानोँ तक नहीं रहता है। इसका सम्बंध कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओँ के साथ भी है। जैसे कि, तनाव, घबराहट, हाई ब्लड प्रेशर जो कि दिल की धडकनेँ बढाने और दिल से सम्बंधित अन्य बीमारियोँ का कारण बन सकता है। यह नींद में खलल/इनसोम्निया, सिरदर्द, चक्कर आने, चिडचिडापन, ध्यान लगाने में परेशानी और काम में मन नहीं लगने जैसे लक्षणोँ के रूप में सामने आ सकता है।

 

क्लास रूम का न्वॉयज लेवल भी एक चिंता का विषय है। इस शोर का स्रोत बाहरी, जैसे कि ट्रैफिक, प्ले ग्राउंड अथवा एयरप्लेन का हो सकता है। अथवा इनडोर स्रोत जैसे कि, हॉल में होने वाला शोर अथवा अन्य कमरोँ से आने वाला शोर आदि। य फिर क्लासरूम में होने वाली बातचीत, पंखोँ, लाइट, पेपर आदि से होने वाला शोर, जो कि पढाई के इतर होता है, भी इसमेँ शामिल है।

 

क्लासरूम में बैकग्राउंड में होने वाला शोर न सिर्फ हमारी सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है बल्कि हमारी शब्दोँ को समझने व ग्रहण करने की क्षमता पर भी असर डालता है। इससे भाषा को समझने और पढने सम्बंधी विकास पर बुरा असर पडता है, जो कि अकैडेमिक विकास को बाधित कर सकता है। इससे ध्यान और याद्दाश्त भी प्रभावित होती है।

 

ऐसे में जब भी अपने बच्चे के लिए स्कूल का चयन करेँ तब बाकी चीजोँ के साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखेँ कि वह न्वॉयज पॉल्युशन से दूर हो। इसीलिए अक्सर स्कूल कॉलेज के कैम्पस मेन रोड से दूर शांत जगहोँ अर बनाए जाते हैं।

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