4 तरह से होती है मोटापे की सर्जरी

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वजन घटाने वाली सर्जरी कैसे काम करती है यह समझने के लिए, यह जानना सहायक हो सकता है कि सामान्य पाचन प्रक्रिया कैसे काम करती है। जैसे ही खाना डाइजेस्टिव ट्रैक्ट (Digestive Tract) के पास पहुंचता है, खास तरह के पाचक जूस और एंजाइम्स सही समय पर और सही जगह पर उसे पचाने के लिए और पौष्टिकता व कैलोरी सोखने के लिए पहुँच जाते हैं। जब हम खाना चबाकर निगलते हैं, इसके बाद यह धीरे-धीरे भोजन नलिका से होते हुए पेट तक पहुंचता है, जहां असरदार एसिड और एंजाइम पाचन प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। पेट एक बार मे एक लीटर तक खाना संभाल सकता है।

गैस्ट्रिक बाइपास का विकल्प
गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी एक ऑपरेशन है जिसमे पेट के अंदर खाना लेने की क्षमता कम करने के लिए एक छोटा पाउच बना देते हैं और छोटी आंत के एक हिस्से को बाइपास कर देते हैं। गैस्ट्रिक बाईपास प्रक्रिया मे, सर्जन पेट के पाउच से छोटी आंत के बीच सीधा संपर्क बना देते हैं, डूओडेनम (छोटी आंत का पहला हिस्सा) बाईपास करना और कुछ हिस्सा जेजूनम (छोटी आंत का दूसरा हिस्सा) का बाइपास करने से, खाए गए भोजन को मिक्स होने की प्रक्रिया मे देरी होती है।

1- रौक्स-एन-वाई गैस्ट्रिक बाईपास (आरवाईजीबी)
(Roux-n-y-gastric bypass) आरवाईजीबी बेरियाट्रिक सर्जरी का सबसे आप प्रकार है। सर्जरी की शुरुआत पेट के ऊपरी सिरे को बांटकर एक छोटा पाउच बनाने से होती है। इससे फूड इनटेक कम हो जाता है। आगे, छोटी आंत का एक हिस्सा पाउच से जोड़ दिया जाता है ताकि खाना डूओडेम और जेजूनम के पहले हिस्से को बाइपास कर दे। छोटी आंत को 100 सीएमएस से दोबारा जोड़ा जाता है (यह मरीज के बीएमआई के हिसाब से अलग हो सकता है) ताकि पाउच मे खाना जा सके और यह डाइजेस्टिव एंजाइम्स के साथ मिक्स हो सके।

मिनी गैस्ट्रिक बाईपास
लैप्रोस्कोपिक मिनी गैस्ट्रिक बाइपास जिसे ओमेगा लूप गैस्ट्रिक बाईपास अथवा बिलरोथ 2 बाइपास भी कहते हैं, गैस्ट्रिक बाइपास का एक दूसरा रूप होता है। इस गैस्ट्रिक पाउच मे एक लंबी स्लीव जैसी होती है जो आंत के साथ जुड़ी होती है, सिर्फ एक जोड़ से लूप बनाते हुए इस प्रक्रिया को पूरा किया जाता है। इस पद्धति का आरवाईजीबी से अधिक फायदा दिखता है वह है लॉन्ग टर्म फॉलो अप मे आंतों मे रुकावट न दिखना।

2- प्रतिबंधात्मक ऑपरेशन
गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी के वैकल्पिक प्रक्रियाओं के रूप मे प्रतिबंधात्मक ऑपरेशन किए जाते हैं जैसे कि वर्टीकल—बैंडेड गैस्ट्रोप्लास्टी अथवा एड्जस्टेबल गैस्ट्रिक बैंडिंग। प्रतिबंधात्मक सर्जरी मे वजन इसलिए कम होता है क्योंकि हम पेट के ऊपरी हिस्से मे जहां भोजन नली से खाना प्रवेश करता है, मे एक छोटा पाउच बना देते हैं। आमतौर पर पाउच के निचले हिस्से का डायामीटर ½ इंच का होता है। छोटे पाउच के इस छोटे हिस्से से खाना खाली होने मे वक्त लगता है, ऐसे मे मरीज को पेट भरा होने का एहसास होता है। सर्जरी के बाद, मरीज सिर्फ आधा कप तक खाना बिना किसी परेशानी अथवा मितली के एहसास के खा सकते हैं। प्रबंधात्मक सर्जरी करने वाले अधिकतर लोग एक बार मे ज्यादा खाना नहीं खा पाते हैं। कुछ मरीज जरूर मोडेस्ट मात्र मे खाना खा पाने की स्थिति मे वापस लौट जाते हैं, बिना जरूरत से ज्यादा भूखा होने से एहसास के। दोनों ही प्रक्रियाएं खाना अंदर लेने की क्षमता मे कमी लाने के लिए की जाती हैं न कि सामान्य पाचन प्रक्रिया अथवा संचयन की क्षमता को प्रभावित करने के लिए।

3- लैप्रोस्कोपिक एड्जस्टेबल गैस्ट्रिक बैंडिंग (एलएबीजी)
प्रक्रिया के दौरान, पेट के ऊपरी हिस्से मे हवा वाला सिलिकान बैंड प्रत्यारोपित किया जाता है। यह बैंड, एक नया और छोटा पाउच बनाता है ताकि खाने की मात्रा को सीमित और नियंत्रित किया जा सके। यह पाउच एक ऐसी जगह भी बनाता है जो पेट से खाना खाली होने की प्रक्रिया को धीमा करता है और आंत मरीज को थोड़ा खाना खाने के बाद ही पेट भर जाने का एहसास करती हैं। इससे मरीज थोड़ी मात्र मे खाना खाकर ही संतुष्ट महसूस करता है। इससे अंततः वजन कम हो जाता है।

एलएजीबी प्रक्रिया मे पेट अथवा बाउल मे कोई चीरा अथवा टांका लगाने की जरूरत नहीं होती है, ऐसे मे इसे वजन घटाने की सबसे कम इंवेसिव प्रक्रिया माना जाता है। इसमे बैंड मे बदलाव भी संभव है, इसके लिए बैंड को सलाइन सोल्युशन के साथ और फुलाया जा सकता है अथवा उसमे से हवा निकालकर उसे छोटा भी किया जा सकता है। सर्जन त्वचा के जरिये एक सुई अंदर ले जाकर बैंड मे सलाइन की मात्र को नियंत्रित भी कर सकते हैं।

4- लैप्रोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रेक्टमी
लैप्रोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रेक्टमी (जो वर्तिकल गैस्ट्रेक्टमी के नाम से भी जानी जाती है) मे पेट के 75% हिस्से को निकाल दिया जाता है और एक पतले ट्यूब जैसी जगह छोड़ दी जाती है जिसमे से खाना निकलता है। स्लीव गैस्ट्रेक्टमी मे आंत को हटाया या बाईपास नहीं किया जाता है। इससे मालएब्जोर्प्शन सिंड्रोम कि समस्या आमतौर पर नहीं होती है।
स्लीव गैस्ट्रेक्टमी का इस्तेमाल आजकल सिंगल स्टेम प्रक्रिया के तौर भी हो रहा है और बैंड लाइजेशन के मामले मे आगे और इंटरवेनशन की जरूरत नहीं पड़ती है। तथापि यह डूओडोडीनल स्विच के साथ कम्बाइन भी किया जा सकता है। स्लीव मे शरीर का 60-70% अतिरिक्त वजन घट सकता है। कुछ मरीजों मे, मेडिकल स्थिति मे सिधार के लिए गैस्ट्रिक बाइपास के चरण से पहले प्राथमिक प्रक्रिया के रूप मे स्लीव का इस्तेमाल किया जाता है।

Dr Atul N C Peters
Director –Bariatric & Metabolic Surgery
Fortis Hospital, Shalimar Bagh

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