एग फ्रीज करवा रही हैं! तो जरा सावधानी से

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Baby in womb
सही तरीके से फ्रीज़ न होने की हालत मे खराब हो सकते हैं एग

37 वर्षीय मार्केटिंग प्रोफेशनल निकिता पांडेय, 2008 में बेहतर करियर ऑप्शन के लिए जर्मनी शिफ्ट हो गई थीं। उनकी मां को ऑवेरियन कैंसर की शिकायत थी इसलिए उनकी फैमिली डॉक्टर ने जाने से पहले एग फ्रीज करवाने की सलाह दी, क्योंकि करियर के इतने सुनहरे अवसर को छोड़ फिलहाल निकिता की शादी करने की कोई योजना नहीं थी।
टूट गया सपना…
फैमिली हिस्ट्री में ओवेरियन कैंसर होने की वजह से बाद मे फैमिली प्लानिंग मे कोई दिक्कत न आए, यह सोचकर निकिता ने विदेश जाने से पहले अपने एग फ्रीज करवा लिए। पांच साल बाद देश लौटीं तो शादी और फैमिली की प्लानिंग शुरू हुई। अगस्त 2013 में शादी की। जल्द ही फैमिली प्लान करना चाहती थीं। जब नेचुरल तरीके से कंसीव नहीं कर सकीं तो अपने फ्रीज किए हुए एग से असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (आईवीएफ) की सहायता से गर्भधारण का प्लान किया। प्रक्रिया शुरू हुई तो पता चला कि सही तरीके से फ्रीज़ न किए जाने की वजह से उनके एग (अण्डाणु) बहुत पहले ही खराब हो चुके थे।

गली-गली मे खुलने लगे हैं प्रिजर्वेशन सेंटर
नर्चर आईवीएफ सेंटर की गाइनकॉलोजिस्ट एवं ऑब्स्टेट्रिशियन डॉ अर्चना धवन बजाज कहती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है कि भविष्य में इस्तेमाल के लिए अण्डाणु व शुक्राणु (एग व स्पर्म) को संरक्षित करने की तकनीक एक वरदान की तरह है। लेकिन संरक्षित किए हुए अण्डाणु व शुक्राणु के भविष्य में गर्भधारण मे उपयोग की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं। संरक्षित एग व स्पर्म से गर्भधारण की संभावना 15 से 20 परसेंट ही होती है। उस पर फ्रीजिंग की गलत प्रैक्टिस के कारण संरक्षित किए अण्डाणु व शुक्राणु खराब हो जाते हैं।जिसकी एक शिकार निकिता भी बनी।

ऐसे होता है प्रिजर्वेशन
डॉ अर्चना बताती हैं कि ज्यादातर फ्रीजिंग प्रक्रिया में हेल्दी स्पर्म चुनकर क्रायोप्रोक्टेन्ट में रखा जाता है। उसके बाद एक पाइप जैसे एक्विपमेंट में डालकर, जिसके उपर प्रिजर्व कराने वाले का नाम व अन्य जानकारी लिखी रहती है। इस एक्विपमेंट को प्रोसेस करके -196 डिग्री के तापमान पर एक बड़े टैंक में प्रिजर्व कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य एग में कूलिंग की वजह से बर्फ जमने और प्रिजर्वेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले केमिकल के साइड इफफेक्ट से बचाना होता है।

दो तकनीकों का होता है इस्तेमाल
एग को फ्रीज करने की मुख्य रूप से दो तकनीक होती हैं, पहली में रिट्रीव एग को कम टेम्परेचर और क्रायोप्रोक्टेंट के मिनिमम लेवल पर रखा जाता है। दूसरी तकनीक में क्रायोप्रोक्टेंट का लेवल अधिक रखा जाता है। इस प्रक्रिया में तकरीबन 70% एग व शुक्राणु एक्टिव रहते हैं, अगर फ्रीजिंग टेम्परेचर गाइडलाइंस के हिसाब से मेंटेन किया जाए तो। आमतौर पर अण्डाणु को 5 साल के लिए प्रिजर्व किया जाता है।

आईसीएमआर की गाइडलाइंस
इसके अनुसार, प्रिजर्वेशन सेंटर्स के लिए प्रिजर्वेशन के बारे सारी जानकारी कंज़्यूमर को पहले ही बताना जरूरी होता है। ताकि वह सही जानकारी के आधार पर उचित फैसला ले सके। सच्चाई यह भी है कि मौजूदा समय मे प्रिजर्व किए हुए एग से सफल प्रेग्नेंसी के मामले काफी कम हैं। सिर्फ 2 से 3% एग ही गर्भधारण की पूरी प्रक्रिया में एक्टिव रह पाते हैं। अभी इस दिशा मे और रिसर्च करने की जरूरत है, ताकि प्रिजर्व किए गए एग व स्पर्म पूरी तरह से सुरक्षित रखे जा सकें। डॉ अर्चना बताती हैं कि एक बार जब एग को 5 साल के लिए स्टोर कर दिया जाता है तो यह समय सीमा बढ़ाने से पहले एग की दोबारा जांच की जानी चाहिए। क्योंकि स्टोरिंग की प्रक्रिया के किसी भी स्टेज पर मामूली सी गलती से एग बर्बाद हो सकते हैं। एनएबीएच अप्रूव्ड सेंटर में ही एग व स्पर्म प्रिजर्व कराएं।

आप करा सकती हैं एग फ्रीजिंग
-जिन महिलाओं की उम्र 30 साल से उपर की हो चुकी हो और वे किसी कारण से देर से फैमिली प्लान करना चाहती हैं।
-अगर परिवार में जल्द मीनोपोज़ की शिकायत हो तो उन्हें अपने एग जरूर फ्रीज करवाने चाहिए।
-परिवार में कैंसर या ओवेरियन कैंसर का इतिहास हो तो, क्योंकि फैमिली हिस्ट्री में कैंसर होने पर अगली जेनरेशन में भी आशंका बढ़ जाती है। यदि शुरूआती दौर में बीमारी को पकड़ भी लिया जाए तो भी कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली रेडिएशन व कीमोथेरेपी से क्षमता प्रभावित होती है।
– जिन महिलाओं में ल्यूपस या रयूमेटॉयड अर्थराइटिस की शिकायत होती है उन्हें भी एग फ्रीजिंग अवश्य करवानी चाहिए, क्योंकि इन बीमारियों के इलाज में प्रयोग होने वाली दवाओं से ओवरी फंक्शन बंद हो जाता है।
– जिन महिलाओं को एंडोमिट्रियोसिस या अन्य किसी कारण से ओवरी निकालने के लिए कह दिया जाता है उन्हें भी अपने एग जरूर फ्रीज़ करवा लेने चाहिए।

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