बच्चे के ब्रेन को ऐसे बनाएँ शार्प

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boost your child's brainजन्म के समय बच्चे के ब्रेन में 100 बिलियन से भी अधिक न्युरॉन्स होते हैं, जो कि एक एडल्ट व्यक्ति की तुलना में काफी ज्यादा हैं। जन्म के पहले 3 वर्षोँ में बच्चे का दिमाग सबसे तेज गति से विकसित होता है, प्रत्येक सेकंड दिमाग में लाखोँ ब्रेन-सेल्स कनेक्शन बनते हैं। इन कनेक्शन को न्युरल सिनैप्स यानी सूत्रयुग्मन भी कहते हैं। इन सूत्रयुग्मन के लिए विभिन्न प्रकार के स्टिम्युलेशन से जुड्ना भी जरूरी होता है। अगर इनका सही सन्योजन न हो तो उम्र बढने के साथ ये सूत्रयुग्मन खोने लगते हैं।

यूज इट ऑर लूज इटका फॉर्मुला  

आइए जानते हैं कि किन स्थितियोँ में ये न्युरल-सिनैप्स खो जाते हैं? पारस हॉस्पिटल की वरिष्ठ बाल रोग कंसल्टेंट डॉ. ज्योति चावला कहती हैं, “ दिमागी फंक्शन में वायरिंग जिस सूत्र के आधार पर काम करता है वह है ‘यूज इट ऑर लूज इट’ यानी इस्तेमाल करेँ, वर्ना खो जाएगा। अगर यह वायरिंग विभिन्न प्रकार के प्रयासोँ (स्टिम्युलेशन) से निरंतर रूप से नहीं हुई तो बच्चे के स्कूल जाने की उम्र तक सूत्रयुग्मन खोने लगेंगे। स्टिम्युलेशन ऐसे किसी भी क्रियाकलाप को कह सकते हैं जो बच्चे के दिमाग को सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करे। यह स्टिम्युलेशन गले लगाने, तरह-तरह के खिलौनो का एक्स्पोजर जैसी सामान्य प्रक्रियाएँ हो सकती हैं।

बच्चे सीख सकते हैं कई भाषाएँ

एक नवजात बच्चे का दिमाग कुछ इस तरह से बना होता है कि इसमेँ कई भाषाएँ सीखने की क्षमता होती है। यह बडोँ के ब्रेन की तुलना में काफी ज्यादा लचीला होता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि छोटे बच्चोँ के ब्रेन मेँ प्रौढ लोगोँ की तुलना में दोगुना न्युरल कनेक्शन होते हैं। ऐसे में अगर आप बच्चे को अधिक दुलार देंगे और उन्हेँ भाषागत विविधताओँ से भरपूर माहौल में रखेंगे तो उनके न्युरल कनेक्शन की अच्छी वायरिंग होगी।

भावनात्मक विकास के लिए भी अहम है बचपन

बचपन संज्ञानात्मक और भावनात्मक दोनोँ तरह के विकास के लिए अहम दौर होता है। बच्चे का दिमाग सही दिशा में विकसित हो इसके लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उन्हेँ स्वस्थ्य वातावरण और प्रोत्साहन मिले। प्रोत्साहन/स्टिम्युलेशन/क्रियाकलाप के अलावा बच्चे के दिमागी विकास हेतु कुछ अन्य अहम कारकोँ का भी ध्यान रखना आवश्यक है:

  • सेट करेँ बच्चे का बॉडी क्लॉक- बॉडी क्लॉक हमेँ दिन में जगाए रखने और रात में सोने में सहायता करता है। आपके बच्चे के दिमागी विकास के लिए अच्छी नींद भी बेहद जरूरी है क्योंकि तमाम शारीरिक व दिमागी क्रियाकलाप अनुकूलन पर भी निर्भर करते हैं और अगर यह अनुकूलन न हो तो शरीर कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओँ की चपेट में भी आ सकता है। बच्चे जैसे-जैसे बडे होते हैं, उनके सोने और जागने का एक पैटर्न सेट होने लगता है। माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे सही पैटर्न को नियमित बनाने की कोशिश करेँ। सोने जागने की स्वस्थ्य आदत ही गहरी नींद सुनिश्चित करती है, इसी से बच्चे का बॉडी क्लॉक सेट होता है और तय समय पर दिमाग नींद का सिग्नल देने लगता है। लेकिन अगर बच्चा टीवी, मोबाइल आदि में व्यस्त रहेगा अथवा लोग डिस्टर्ब करते रहेंगे तो यह प्रक्रिया सामान्य रूप से नहीं चलेगी। बच्चे की सोचने, ध्यान लगाने, याददाश्त और मूड को ठीक रखने में गहरी नींद की भूमिका बेहद अहम है। अगर उन्हेँ भरपूर गहरी नींद नहीं मिलेगी तो चिडचिडे और थके-थके महसूस करेंगे। इसके लिए पैरेंट्स कुछ उपाय कर सकते हैं:

 

    • करेँ सुबह की धूप का इस्तेमाल: बच्चे के कमरे में सुबह-सुबह धूप आने देँ, इससे बच्चा समय पर सोकर उठेगा और शाम को जल्दी सोएगा। रात में सोने के टाइम पर कमरे में अंधेरा कर देँ।
    • रात में लाइट बंद कर देँ: सुबह की ही तरह, जब बच्चे को सुलाने के लिए ले जाएँ तब सारी अप्राकृतिक रोशनी बंद कर देँ। साथ ही टीवी, मोबाइल फोन आदि भी बंद कर देँ।
    • सोने का समय एडजस्ट करेँ: बच्चे को रात में जल्दी सुलाने के लिए काफी मेहनत करनी पडती है। बच्चे को बहुत जल्दी सुलाने की कोशिश करने की बजाय, सबसे पहले उसके रुटीन को सेट करेँ और फिर 15-15 मिनट करके इसे प्रीपोन करते रहेँ। ऐसा तब तक करेँ जब तक बच्चे को सही टाइम पर सोने की आदत न लग जाए।
    • तय समय पर ही सुलाएँ: सोने-जागने का समय फिक्स होने के बाद, यह बेहद जरूरी है कि इस समय चक्र को नियमित रूप से अपनाएँ। पारिवारिक क्रियाकलाप बच्चे के सोने के टाइम में बाधक नहीं होने चाहिए।
    • गहरी नींद सुनिश्चित करेँ: यह सुनिश्चि त करेँ कि रोशनी अथवा शोरगुल से बच्चे की नींद में बाधा न आए। उन्हेँ गहरी नींद सोने देँ।

 

  • स्क्रीन-बेस्ड क्रियाकलाप कम कर ब्रेन केमिस्ट्री को एड्जस्ट करेँ: आज के दौर में टीवी, मोबाइल और कम्प्युटर जैसी चीजेँ हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं, मगर बच्चोँ के लिए इनका एक्सपोजर संतुलित रखना जरूरी है।
    • सही हार्मोन संतुलन सुनिश्चित करेँ: सम्बंधित क्रियाकलाप डोपामाइन हार्मोन को प्रभावित करते हैं, जो कि किसी भी ऐक्टिविटी की लत लगने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। मेलाटोनिन हार्मोन आपको सेहतमंद रखने के लिए जरूरी होता है, यह हार्मोन सीरोटोननिन में बदलता है, अगर शरीर में इसकी कमी हो जाए तो सेरोटोनिन हार्मोन का स्तर भी घट जाता है। सीरोटोनिन मन शांत रखने, अच्छा महसूस करने और जुडाव महसूस करने में अहम भूमिका निभाता है। अगर इसकी कमी होती है तो बच्चे का मूड खराब रहता है।
    • माथे में रक्त संचार में सुधार: गहन सोच, कलात्मकता और खेल सम्बंधी क्रियाएँ माथे में रक्त संचार को सुधारती हैं। जबकि स्क्रीन ऐक्टिविटी रक्त संचार को दिमाग के प्रारम्भिक हिस्से तक ही सीमित रखती है। यह बडे लोगोँ के लिए भी ठीक नहीं है, मगर बच्चोँ के मामले में यह उनके मानसिक और दिमागी विकास को नियमित रूप से प्रभावित कर सकता है।
    • स्ट्रेस हार्मोन को कम करेँ: स्क्रीन सम्बंधी क्रियाएँ तनाव से सम्बंधित होती हैं। इसका मतलब है कि कम समय तक स्क्रीन पर ध्यान होने से फाइट या फ्लाइट हार्मोन बनते हैं और ज्यादा देर होने पर कॉर्टिसोल, जो कि स्ट्रेस हार्मोन के नाम से जाना जाता है। ये दोनो ही हार्मोन संज्ञानात्मक विकास, मूड और व्यवहार में बदलाव एवम खराब शारीरिक सेहत से सम्बंधित होते हैं।
  • ओवर स्टिम्युलेशन में कमी लाएँ:हमारा दिमाग इस तरह से बना होता है कि इस पर अप्राकृतिक चीजोँ की अति बुरा असर डालती है। जैसे कि बहुत ज्यादा गाढे और चटक रंग, तेजी से बदलते सीन, तीव्र गति वाले मूवमेंट और स्क्रीन की ब्राइटनेस आदि। इतना ही नहीं यह इंसान द्वारा निर्मित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड की प्रॉसेसिंग के लिए भी नहीं बने होते हैं।
  • बायोफील्ड को भी रखेँ सामान्यबायोफील्ड अन्य चीजोँ की तुलना में एक नई वस्तु है जिसका अध्ययन होने लगा है। बायोफील्ड शरीर का प्राकृतिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड है और यह कई रूपोँ में प्रत्यक्ष होता है, जैसे कि, दिमाग व दिल की तरंगे, नर्व इम्पल्स और सेल्युलर मेंबरेन चैनल, डीएनए वाइब्रेशन और दिल व दिमाग का कनेक्शन आदि। इसका मतलब है कि बायोफील्ड का अध्ययन कई मायनोँ में कारगर साबित हो सकता है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि शरीर की प्राकृतिक बायोफील्ड को सुरक्षित रखने का सबसे आसान तरीका क्या है। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस खासतौर से स्क्रीन वाली डिवाइस का इस्तेमाल कम से कम करेँ। स्क्रीन वाली चीजेँ ज्यादा प्रभावित करती हैं क्योंकि हमारी आंखेँ सीधे तौर पर ब्रेन से जुडी होती हैं।“
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