गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले उतना अच्छा

2326
1
Share:

Breast Cancer

ब्रेस्ट कैंसर को लेकर हमने पहले भी कई कवितायेँ पढ़ी हैं, उन कविताओं को लेकर लम्बी-लम्बी बहसों की भी आपको याद होगी. आज कुछ कविताएं प्रसिद्ध रंगकर्मी, लेखिका विभा रानी की. कैंसर पर जीत हासिल करने के बाद उन्होंने यह ताजा कविताएं आपके लिए भेजी हैं. रोग का शोक नहीं जश्न मनाती कविताएं:

गाँठ
गाँठ
मन पर पड़े या तन पर
उठाते हैं खामियाजे तन और मन दोनों ही
एक के उठने या दूसरे के बैठने से
नहीं हो जाती है हार या जीत किसी एक या दोनों की।
गाँठ पड़ती है कभी
पेड़ों के पत्तों पर भी
और नदी के छिलकों पर भी।
गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले
उतना अच्छा ।
पड़ गए शगुन के पीले चावल
चलो उठाओ गीत कोई।
गाँठ हल्दी तो है नहीं
पिघल ही जाएगी
कभी न कभी
बर्फ की तरह।

2. कैंसर का जश्न!

क्या फर्क पड़ता है!
सीना सपाट हो या उभरा
चेहरा सलोना हो या बिगड़ा
सर घनबाल हो या गंजा!
ज़िन्दगी से सुंदर,

गुदाज़
और यौवनमय
नहीं है कुछ भी।

आओ, मनाओ,

जश्न- इस यौवन का

जश्न- इस जीवन का!

3. ब्रेस्ट कैंसर!

अच्छी लगती है अंग्रेजी, कभी कभी
दे देती है भावों को भाषा का आवरण
भदेस क्या, शुद्ध सुसंस्कृत भाषा में भी
नहीं उचार -बोल पाते
स्तन- स्तन का कैंसर
जितने फर्राटे से हम बोलने लगे हैं-
ब्रेस्ट- ब्रेस्ट कैंसर!
नहीं आती है शर्म या होती है कोई झिझक
बॉस से लेकर बाउजी तक
डॉक्टर से लेकर डियर वंस तक को बताने में
ब्रेस्ट कैंसर या यूट्रेस कैंसर।
यह भाषा का सरलीकरण है
या भाव का भावहीनता तक विस्तार
या बोल बोल कर, बार बार
भ्रम- पाने का डर से निजात
ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट
ब्रेस्ट, ब्रेस्ट, ब्रेस्ट कैंसर!

4. जनाना चीज़!

बचपन में ही चल गया था पता
कि बड़ी जनाना चीज़ है ये।
मरे जाते हैं सभी इसके लिए
छोकरे- देखने के लिए
छोकरियाँ- दिखाने के लिए
बाज़ार- बेचने- भुनाने के लिए।
सभी होते हैं निराश
गर नहीं है मन-मुआफिक आकार।
बेचनेवाले कैसे बेचें उत्पाद!
ब्रेसरी कि मालिश की दवा
कॉस्मोटोलोजी या खाने की टिकिया
पहेलियाँ भी बन गयी बूझ-अबूझ:
“कनक छडी सी कामिनी काहे को कटि छीन
कटि को कंचन काट बिधि, कुचन मध्य धरि दीन।”
ये तो हुआ साहित्य विमर्श
बड़े-बड़े हैं देते इसके उद्धरण
साहित्य से नहीं चलता जीवन या समाज।
सो उसने बनाया अपना बुझौअल और बुझाई यह पहेली-
“गोर बदन मुख सांवरे, बसे समंदर तीर
एक अचम्भा हमने देखा, एक नाम दो बीर!”
वीर डटे हुए हैं मैदान में
कवियों के राग में
ठुमरी की तान में
“जब रे सिपहिया चोली के बंद खोले
जोबन दुनु डट गयी रात मोरी अम्मा!”
खुल जाते हैं चोली के बंद
बार-बार, लगातार
सूख जाती है लाज-हया की गंगा
बैशाख-जेठ की गरमी सी
ख़तम हो जाती है लोक-लाज की गठरी
आँखों में बैठ जाता है सूखे कांटे सा
कैंसर!
उघाड़ते-उघाड़ते
जांच कराते-कराते
संवेदनहीन हो जाता है डॉक्टर संग
मरीज भी।

5. भीगे कम्बल सा माहौल!

आप मानें या न मानें
पल भर को हो तो जाता है

भीगे कम्बल सा भारी माहौल
सूखे मलमल सा हल्का
जब डॉक्टर करता है मजाक
एक हलकी मुस्कान से-
“वेलकम टू द वर्ल्ड ऑफ़ कैंसर” या
“केमो डोंट सूट एनीवन!”
जब देता है उदाहरण कैंसर सेल्स की आतंकवादी से
और इलाज को एन एस जी कमांडो से।
उसे भी पता है और मरीज को भी कि
बड़े बडे मेडिकल टर्म्स से नहीं हो सकता भला
आम मरीज का
उन्हें समझाने के लिए सुनाने ही पड़ेंगे किस्से
दादी-नानी की तरह
सुननी ही पड़ेगी बकवास जैसी जिज्ञासाएं मरीजों की।
समझाना ही पडेगा, दिलाना होगा यकीन का झुनझुना
और उसके नीचे से कराने होंगे सारे कागजातों पर दस्तखत …

कि हो रहा है यह इलाज रोगी की इच्छा से।
होने पर कोई उंच-नीच,

नहीं होंगे हम जिम्मेदार।
हमारी गर्दन और नाई का उस्तरा
देना हमारी मजबूरी है,

चलाना उनका अधिकार!
क्या यह संभव है कि हर व्यक्ति रखे हर मेडिकल टर्म
या जीवन के हर क्षेत्र की जानकारी?
इसीलिए डॉक्टर करते हैं हल्का माहौल
छोड़ते हैं एकाध पीजे,

बनाते हैं अपनी रणनीति
सर्फ़ कर लेते है रोगी को नेट पर
कर देते हैं तारीफ़ उनके गुणों की।
फलता-फूलता है इसतरह से मेडिकल व्यवसाय।
वो सहाय, हम निस्सहाय।
उनकी बढती और हमारी खाली होती जाती गठरी।
मोटापा गठरी और मन का-
सुनिश्चित तो करना है आपको ही
इसलिए सीखना होगा मुस्काना -आपको भी
और आपको ही।

साभार: http://www.jankipul.com/

Share:
0
Reader Rating: (0 Rates)0

1 comment

Leave a reply