अब पैदा हो सकेंगे 3 पैरेंट्स वाले बच्चे!

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Three-Parent-babies
विवादास्पद आईवीएफ तकनीक को ब्रिटेन मे मंजूरी
ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमंस ने भारी मतों से विवादास्पद आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) को मंजूरी दे दी है जिससे तीन लोगों के डीएनए से भ्रूण (three-parents babies) उत्पन्न किए जाएंगे। नई आईवीएफ तकनीक से पहला आईवीएफ शिशु अगले वर्ष जन्म ले सकता है। दुनिया में दूसरे देशों के विशेषज्ञों ने विवादास्पद तकनीक को मंजूरी दिए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि ब्रिटेन मानव निषेचन और भ्रूण विज्ञान कानून में संशोधन करके बहुत बड़ी गलती करेगा। 44 ब्रिटिश सांसदों का मानना है कि इस तकनीक से यूरोपीय कानूनों का उल्लंघन होता है। कई लोगों ने इस तकनीक की नैतिकता पर सवाल उठाए हैं। इस तकनीक के कुछ अन्य आलोचकों का कहना है कि इससे बच्चों में अज्ञात स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाएगा।

ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स में अगले महीने इस मुद्दे पर चर्चा होगी और वहां संशोधन के ठुकराए जाने की संभावना बहुत कम है। नया कानून इसी साल अक्टूबर में लागू हो जाएगा। इसके तुरंत बाद इंसानी परीक्षण शुरू हो जाएंगे। इस तकनीक के पक्षधरों का कहना है कि नए इलाज से ब्रिटेन में 2500 महिलाओं को लाभ होगा। इस समय इस तकनीक का असली मकसद बचपन की आनुवंशिक बीमारियों से छुटकारा दिलाना है लेकिन भविष्य में मनचाहे गुणों वाली संतान अथवा ‘डिजाइनर बेबी’ पैदा करने के लिए इस तकनीक का दुरुपयोग भी हो सकता है। यह तकनीक दरअसल ‘जर्म -लाइन जीन थिरैपी ‘ का एक रूप है जिसमें एक परिवार में होने वाली संतानों को वंशानुगत बीमारियों से निजात दिलाने के लिए उनके डीएनए को बदल दिया जाता है। हमारी कोशिकाओं में पाए जाने वाले माइटोकोंड्रिया में आनुवंशिक गड़बड़ियों से करीब 6500 लोगों में एक व्यक्ति प्रभावित होता है। माइटोकोंड्रिया के विकारों का इस समय कोई इलाज नहीं है। इन्हें मां से शिशुओं में फैलने से रोकने का भी कोई तरीका नहीं है।

माइटोकोंड्रिया दरअसल हमारी कोशिका का सूक्ष्म ‘बिजलीघर’ है। माइटोकोंड्रिया में 37 जीन होते है। ये जीन हमारी कोशिकाओं को ऊर्जा आपूर्ति के लिए जरुरी होते हैं। हमारे डीएनए का बहुत बड़ा हिस्सा कोशिका के नाभिक में होता है। हमारे शरीर को रूप और आकार देने वाले जीन इसी डीएनए में होते हैं। ब्रिटेन की न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों द्वारा विकसित इस तकनीक को ‘माइटोकोंड्रियल ट्रांसफर’ भी कहा जाता है। इस विधि में एक स्वस्थ महिला डोनर के डीएनए का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य माताओं द्वारा बच्चों में आनुवंशिक बीमारियों के प्रसार को रोकना है। इन बीमारियों में मस्कुलर डिस्ट्रोफी(मांसपेशियों का क्षय) तथा ह्रदय और लिवर की बीमारियां शामिल हैं। ज्यादातर बच्चों में यह बीमारी हलके रूप में प्रकट होती है लेकिन साल में जन्म लेने वाले पांच से दस बच्चे माइटोकोंड्रिया रोग के उग्र रूप से प्रभावित होते हैं। नई तकनीक से ऐसे बच्चों का जीवन सुधारा जा सकता है।

इस विधि में आनुवंशिक विकारों वाली महिला की अंडाणु कोशिका की आनुवंशिक सामग्री को एक स्वस्थ महिला के अंडाणु में हस्तांतरित कर दिया जाता है ताकि उसके माइटोकोंड्रिया का डीएनए आईवीएफ शिशु में पहुंच सके। इसका अर्थ यह हुआ कि शिशु को तीन अभिभावकों यानी माता,पिता और डोनर महिला से से डीएनए मिलेगा। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि शिशु को डोनर से सिर्फ 0.1 प्रतिशत डीएनए ही मिलेगा। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी माइटोकोंड्रिया को हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं। उसके डीएनए से व्यक्ति के गुणों पर असर पड़ सकता है। अतः नई तकनीक को मंजूरी देने से पहले माइटोकोंड्रिया को ठीक से समझना जरुरी है। इस तकनीक से जन्म लेने वाली लड़कियों की भावी संताने आगे की पीढ़ियों में भी माइटोकोंड्रिया के परिवर्तनों को जारी रखेंगी। नई तकनीक से जन्म लेने वाले बच्चों को डोनर महिला की पहचान जानने का अधिकार नहीं दिया जाएगा। न ही उस महिला को एक अभिभावक के रूप में मान्यता मिलेगी। डोनर महिला का नाम गुप्त रखा जाएगा। नई तकनीक के पक्षधरों की तरफ से यह भरोसा दिलाने की कोशिश की जा रही है कि डाक्टर इस तकनीक से जन्म लेने वाले बच्चों की बहुत बारीकी से निगरानी करेंगे। इस बात पर खास ध्यान दिया जाएगा कि आईवीएफ की इस विधि से कहीं बच्चे के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर तो नहीं पड़ रहा।

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