कैंसर के बाद भी संभव है पैरेंटहुड

6786
0
Share:

parenthood after cancerकैंसर (Cancer) एक ऐसी बीमारी है जो आज भी लाइलाज की श्रेणी मे हैं। इसका नाम सुनते ही अधिकतर मरीज जीवन की उम्मीद छोड़ देते हैं, ऐसे मे भविष्य मे ठीक होकर पैरेंहुड (Parenthood) हासिल करने के सपने का ख्याल रखना तो दूर की बात है। लेकिन तकनीकी विकास ने आजकल शुरुआती दौर मे कई तरह के कैंसर का इलाज (Cancer Treatment) संभव कर दिया है। ऐसे मे स्वस्थ होकर एक बार फिर जीवन की गाड़ी पटरी पर लाने और पैरेंटहुड (Parenthood) की ख़्वाहिश भी बढ़ी है। तो आइये जानते हैं इसके लिए उपलब्ध विकल्पों के बारे मे:

फर्टिलिटी पर पड़ता है कैंसर के इलाज का असर
कैंसर का इलाज मरीज की प्रजनन क्षमता को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रभावित कर सकता है। बचपन में होने वाले कैंसर अथवा यंग महिलाओं के कैंसर के मामले में उपयुक्त इलाज मिलने पर उनका जीवन बचने की उम्मीद काफी बढ़ गई है। मरीज को यह समझाना बेहद जरूरी होता है कि उसे इलाज के दौरान अपनी प्रजनन की क्षमता को सुरक्षित रखने की जरूरत होती है, खासतौर से तब जब मरीज का कीमोथेरेपी अथवा रेडियोथेरेपी हो रहा हो। अगर बिना योजना के गर्भधारण होता है तो ऐसी स्थिति में दवाओं और रेडिएशन के असर से भ्रूण को गंभीर नुकसान होने का खतरा रहता है जिसके चलते गर्भपात से लेकर बच्चे को जन्मजात गंभीर बीमारियां होने का खतरा भी होता है।

हर तरह के ट्रीटमेंट मे नहीं रहता खतरा
हर तरह के कैंसर ट्रीटमेंट में इनफर्टिलिटी का खतरा नहीं रहता है, कई बार कैंसर के इलाज से पहले यह अनुमान लगाना भी कठिन होता है कि भविष्य में प्रजनन क्षमता पर यह किस तरह का प्रभाव छोड़ेगा, ऐसे में मरीज को सभी संभावनाओं और आशंकाओं के बारे में डॉक्टर से पहले ही सलाह लेनी चाहिए। यह काफी हद तक मरीज की उम्र, उसकी हार्मोनल स्थिति, आवेरियन रिजर्व, कैंसर के प्रकार और उसके प्रसार, इलाज की योजाओं, रेडियोथेरेपी की खुराक और इसकी जगह पर निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर, टोटल बॉडी इरैडिएशन, होल एब्डॉमिनल अथवा पेल्विक इरैडिएशन, ब्रेन इरैडिएशन अथवा ऐल्किलेटिंग कीमोथेरेपी आदि से प्रजनन की क्षमता सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। जिस मामले में महिला की गर्भाशय निकालने की नौबत होती है, उस मामले में वह अपना जेनेटिक बच्चा जन्म देने की क्षमता खो देती है। टेस्टिक्युलर कैंसर के मामले में अगर दोनों टेस्टिकल हटाने की स्थिति हो अथवा टेस्टिकल में रेडिएशन की हाई डोज दी जाती है तो पुरूषों के बांझपन का खतरा बहुत ज्यादा रहता है।

कैंसर वाली कोशिकाओं को खत्म करने के लिए जो कीमोथेरेपी अथवा रेडियोथेरेपी दी जाती है उसका असर स्वस्थ कोशिकाओं और शरीर के अंगों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि मरीज को कीमोथेरेपी के दौरान कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं और साइड इफेक्ट का सामना करना पड़ता है। यही मकेनिजम उनके युग्मक जिनमें स्पर्म एग्स भी शामिल हैं, पर भी बुरा असर डालता है।

टार्गेटेड थेरेपी से कम हुआ है खतरा
बेहतर इलाज की सुविधाएं और अधिक टारगेटेड कैंसर थेरेपी के आ जाने से शरीर पर इनका दुष्प्रभाव होने का खतरा भी कम हुआ है, इनके जरिए कई तरह के कैंसर का बेहतर इलाज संभव हो गया है। खासतौर से तब जब बीमारी का पता शुरूआत में ही लग जाए। आजकल बहुत सारे कैंसर के मरीजों का न सिर्फ जीवन बच रहा है बल्कि वे एक सामान्य जीवन भी जी रहे हैं। ऐसे में उन्हें अपने लिए प्रजनन की संभावनाएं संजोकर रखने के विकल्पों के बारे में जानने की जरूरत भी अधिक महसूस हो रही है।

आजकल कैंसर के इलाज से पहले प्रजनन की संभावनाओं को संजोकर रखने के विकल्प भी उपलब्ध हो चुके हैं। हालांकि, अभी ये प्रक्रियाएं ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सकी हैं। अगर आप भी इस समस्या को लेकर चिंतित हैं तो आप किसी फर्टिलिटी एक्सपर्ट से जरूर मिलें और अपने कैंसर रोग विशेषज्ञ से भी इस बारे में बात करें, ताकि आपको यह पता लग सके कि कैंसर का टृीटमेंट शुरू करने से पहले एग या स्पर्म फ्रीजिंग की प्रक्रिया पूरी करने के लिए पर्याप्त समय बचा है अथवा नहीं। याद रखें, आपकी पहली प्राथमिकता है कैंसर के खिलाफ जंग जीतना और स्वस्थ जीवन जीना।

ये हैं विकल्प
एंब्रायो फ्रीजिंगः इस प्रक्रिया में महिला के अंडाणु लिए जाते हैं, उसके पार्टनर के शुक्राणुओं के साथ लैब में फर्टिलाइज किए जाते हैं और फिर इसे भविष्य में इस्तेमाल के लिए फ्रीज किया जाता है। अगर मरीज सफलतापूर्वक कैंसर से जंग जीत लेता है और भविष्य में अपने बच्चे को जन्म देना चाहता है तो फ्रीज किए गए एंब्रायो को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। हालांकि, महिला की माहवारी की शुरूआत से लेकर अंडाणु निकालने की पूरी प्रक्रिया में दो सप्ताह का समय लगता है। ऐसे में मरीज को इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है कि वह कैंसर के इलाज में इतनी देरी करने की स्थिति में है अथवा नहीं। धीरे-धीरे विकसित होने वाले कैंसर के मामलों में, यह एक विकल्प हो सकता है लेकिन तेजी से बढ़ने वाले मामलों में ऐसा नहीं किया जा सकता है।

एग फ्रीजिंगः यह विकल्प सिंगल महिलाओं के लिए ज्यादा उपयुक्त रहता है जो भविष्य के लिए अपने अंडाणुओं को प्रिजर्व कराना चाहती हैं। इस प्रक्रिया में अंडाणुओं को बिना फर्टिलाइज किए ही फ्रीज किया जाता है। इसे बाद में स्पर्म के साथ लैब में फर्टिलाइज किया जाता है और इसे महिला के गर्भाशय में तब प्रत्यारोपित कर दिया जाता है जब वह पूरी तरह ठीक हो जाती है और बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार होती है। इस प्रक्रिया में भी दो सप्ताह का समय लगता है। ऐसे में यह विकल्प भी उन्हीं मामलों में उपयुक्त होता है जो कैंसर के इलाज के लिए इंतजार कर सकते हैं।

ओवेरियन टिश्यू फ्रीजिंगः ऐसे मामलों में जिसमें महिला को गर्भाशय में ठीक न होने वाला डैमेज होने का खतरा हो, उनके लिए यह एक संभावित विकल्प हो सकता है। हालांकि यह विकल्प अब भी प्रयोग के चरण में ही है। इसमें कैंसर का टृीटमेंट शुरू करने से पहले महिला के ओवेरियन टिश्यू को निकालकर फ्रीज किया जा सकता है। ये टिश्यू कैंसर के इलाज और रिकवरी के बाद ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। यह प्रक्रिया दुनिया भर में फिलहाल प्रयोग के चरण में है और इसके जरिए कुछ ही बच्चों के जन्म की सूचनाएं अब तक उपलब्ध हैं।

ओवेरियन प्रोटेक्शनः कुछ मामलों में गर्भाशय को रेडिएशन के खतरे से बचाने के लिए रेडिएशन शील्ड का विकल्प रहता है। इस प्रक्रिया में कीमोथेरेपी के दौरान ओवरी में एक हार्मोन दिया जाता है जिससे अस्थायी मीनोपॉज होतो है, लेकिन यह विकल्प अब भी एक बहस का मुद्दा है।

शुक्राणु फ्रीजिंगः शुक्राणु यानी स्पर्म कैंसर का इलाज शुरू होने से पहले कई बार इजैकुलेशन प्रक्रिया के बाद निकालकर फ्रीज किए जा सकते हैं।

डोनर स्पर्म और सरोगेसीः अगर अपनी बायोलॉजिकल औलाद को जन्म देने की किसी की क्षमता को संजोकर रखना संभव नहीं होता है तो डोनर से लिए गए शुक्राणु, अंडाणु और डोनर एंब्रायो का विकल्प रहता है। कई बार सरोगेसी और दत्तक ग्रहण की जरूरत भी पड़ सकती है।

Share:
0
Reader Rating: (1 Rate)9.5

Leave a reply