आप खुद दे सकते हैं अल्ज़ाइमर्स को मात

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आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी मे जिस तरह से हम डेडलाइंस के पीछे भागते हैं, एक साथ बहुत सारे काम निबटाने के तनाव से जूझते हैं, ऐसे मे हममे से अधिकतर के लिए कुछ भूल जाने की समस्या सामान्य बात होगी। बहुत बार ऐसा भी होता है कि प्रोजेक्ट सबमिट करने की डेडलाइन के आखिरी मिनट आपको याद आता है कि आपने तो काम ही नहीं किया, कई बार डॉक्टर का अप्वाइन्मेंट लेते हैं पर जाना भूल जाते हैं, घर मे जरूरी समान नहीं है, ऑफिस से लौटते समय लेकर आने की योजना बनाते हैं लेकिन लाना भूल जाते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि आप अलमारी खोलकर उसके सामने खड़े होते हैं और यह याद ही नहीं आता कि आप ढूंढ क्या रहे थे! हममे से बहुत से लोगों के लिए यह सामान्य सी बात होगी। अगर उम्र बढ़ने के साथ आपके साथ इस तरह के वाकये हो रहे हैं, तब तो इसे ढलती उम्र का असर माना जा सकता है, लेकिन अगर ऐसा यंग एज मे ही महसूस होने लगा है तो अभी से अलर्ट हो जाइए। ये अल्ज़ाइमर्स की शुरुआती चेतावनी हो सकती है। जिसे अभी कंट्रोल करने के उपाय नहीं किए गए तो वक्त के साथ आपकी हालत बदतर हो सकती है:

इन लक्षणों को न करें नज़रअंदाज़- पहले से सीखी बातें भूल जाना-अल्ज़ाइमर्स का सबसे कॉमन लक्षण है जल्दी-जल्दी चीजें भूल जाना, लोगों के नाम, अप्वाइंमेंट और जरूरी तारीखें भूल जाना। एक ही सवाल बार-बार पूछना।

सामान्य शब्दों को रीकॉल करने परेशानी- ऐसे लोगों को आमतौर पर नए शब्दों को बोलने या लिखने मे समस्या होती है। ऐसे लोग बातचीत मे हिस्सा लेने या सामाजिक डिस्कशन मे दिक्कत महसूस करते हैं। कई बार बात करते-करते बीच मे अटक सकते हैं, यह समझ नहीं पाते कि बात आगे कैसे बढ़ाएँ, ये भूल जाते हैं कि बात को कहाँ छोड़ा था, और एक ही बात बार-बार दोहराते रहते हैं।

समाज से दूरी- ऐसे लोग अक्सर अपनी कन्फ़्यूजन के चलते होने वाली शर्मिंदगी से बचने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों से दूरी बनाने लग जाते हैं। धीरे-धीरे लोगों से बात करने से भी बचने लगते हैं और अकेले रहना पसंद करते हैं।

जान-पहचान वाले लोगों को पहचानने मे भी दिक्कत-यह स्थिति परिवार वालों के लिए बेहद परेशानी वाली होती है। क्योंकि मरीज जान-पहचान वालों को भी पहचानने मे दिक्कत महसूस करने लगता है, लोगों के नाम मिक्स करने लग जाता है अथवा अपने ही घर वालों के साथ अजनबी जैसा बर्ताव करने लगता है।
आत्मविस्मृति (Disorientation)-ऐसे लोग अक्सर समय और स्थान को लेकर कन्फ़्यूज हो जाते हैं। दिनों और साल की गणना भूल जाते हैं। यह भी भूल सकते हैं कि वे हैं कहाँ, और यहाँ तक पहुंचे और कितनी देर से वहाँ हैं।

मूड और पर्सनेलिटी मे बदलाव: अल्ज़ाइमर्स से पीड़ित लोग अक्सर जल्दी से इरिटेट हो जाते हैं और मामूली सी बात पर भी नाराज होने लग जाते हैं। चूंकि अधिकतर मामलों मे लोग इन बदलावों की वजह से अंजान होते हैं, ऐसे मे लोग व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखने लग जाते हैं। और मरीज की फ्रस्ट्रेशन इस कदर बढ़ जाती है कि वह डिप्रेशन मे चला जाता है। याददाश्त और मनोभावों के बीच गहरा संबंध होता है, और रिसर्च बताते हैं कि जीवनशैली मे बदलाव कर हम अपनी याददाश्त को बेहतर बना सकते हैं।

जीवनशैली प्रबंधन (Lifestyle management)- नियमित फिजिकल एक्सरसाइज, पर्याप्त नींद और भूख हमारे स्ट्रेस लेवल को कम करने के लिए जरूरी है। अगर ये चीजें बेहतर हैं तो हमें मानसिक रूप से फिट रहने मे मदद मिलती है। चीजों को अच्छे ढंग से ऑर्गनाइज्ड करके भी हम अपना स्ट्रेस लेवल कम कर सकते हैं।
चीजों को याद रखने मे मददगार उपकरण- वाल चार्ट, नोट्स, चेकलिस्ट और कैलेंडर डायरी बनाकर आप न सिर्फ चीजों को प्लान कर सकते हैं बल्कि इन्हें आसानी से याद भी रख सकते हैं। एक ही बात को बार-बार रिपीट करने की आदत का आप पॉज़िटिव इस्तेमाल कर सकते हैं। आप नए वर्ड्स याद कर सकते हैं।

बौद्धिक स्टिम्युलेशन (Intellectual stimulation)- आपके लिए न सिर्फ अपने शरीर को फिट रखना जरूरी है बल्कि खुद को मानसिक रूप से सक्रिय रखना भी जरूरी है। सूडोकू, मेज़ेज और दूसरी पहेलियाँ सुलझाएँ, उपन्यास आदि पढ़ें, नई भाषा या म्यूज़िक सीखें। कहने का मतलब यह है कि आपको हर उस क्रियाकलाप मे शामिल होना चाहिए जिससे आपका दिमाग एक्टिव रहे। इससे आपकी मेमोरी शार्प होगी।

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