मिर्गी के इलाज मे उम्मीद की नई किरण

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deep brain stimulation

डॉ. आदित्य गुप्ता

लाइलाज मामलों के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन थेरेपी हो सकती है कारगर
23 साल की आशा पिछले चार साल से मिर्गी (epilepsy) की परेशानी झेल रही है। उसे रात को बाहर पार्टियों में जाने से भी डर लगता है। आशा के माता पिता भी उसे अकेले कही भी भेजने से डरते है चाहे वो एजुकेशनल टूर हो या फिर किसी भी दोस्त के घर। इस बीमारी का उसे मास मीडिया प्रोग्राम के दूसरे साल मे पता चला और उस समय उस दौरे की तीव्रता इतनी तेज थी कि आशा अपनी परीक्षाएं भी नहीं दे पाई। आशा की मां मर्सी एजंस कहती हैं, हमने आशा की पर्सनेलिटी को बदलते देखा है। पहले हमेशा खुश रहने वाली आशा का अब आत्मविश्वास टूट गया है। अब वो बहुत ही सहमी रहती है। इसी कारण उसका कैंपस इंटरव्यू भी बहुत ही खराब रहा।

क्या है मिर्गी (epilepsy)
मिर्गी (epilepsy) एक न्यूरोलोजिकल यानि कि तंत्रिका से संबंधी बीमारी है जिसमें रोगी खुद को एक अलग ही नजरिए से देखता है। पहले इस बीमारी को अंधविश्वास के तौर पर देखा जाता था लेकिन बाद में वैज्ञानिक तथ्यों से ये सामने आया कि दिमाग में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होता है तो पीड़ित को अचानक ही दौरे या अकड़न होने लगती है। मिर्गी चौथी ऐसी आम बीमारी है जो प्रत्येक उम्र के लोगों को प्रभावित करती है। मिर्गी में अचानक से होने वाले दौरे व अकड़न की तीव्रता सभी को अलग अलग रूप से प्रकट होती है।

हो सकती हैं ये वजहें
मिर्गी के दौरे पड़ने का कारण वंशानुगत या किसी दिमागी चोट, गर्भ में मस्तिष्क की क्षति, दिमागी ट्यूमर हो सकता है लेकिन ज्यादातर मामलों में इसके कारणों का पता नहीं चल पाता। बहुत से लोग मिर्गी के दौरे को अपशकुन मानते हैं, क्योंकि उनमे जागरूकता का अभाव है।

आशा के लिए मुश्किल रही इलाज की डगर
आशा को जैसे ही पता चला तो उसने ऐंटीऐप्लिेटिक दवाइयां लेनी शुरू कर दी। लेकिन दवाइयां लेने से उसे कई अन्य गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। कई दवाइयां लेने के बावजूद उसे नियमित तौर पर दौरे पड़ ही रहे थे। आशा की मां कहती हैं, अकसर वो पेट में दर्द और चक्कर आने जैसी शिकायतें करने लगी तो हमने इसे इलाज का ही हिस्सा मानकर अनदेखा कर दिया। फिर उसे मलेरिया हो गया तो अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आशा के टेस्ट से पता चला कि उसमें वाइट ब्लड सैल बहुत तेजी से कम हो रहे है जिससे उसे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है और रिकवरी में भी देरी होगी। आशा के डाक्टर ने सभी दवाइयां तुरंत ही बंद करवा दी और फिर उसकी स्थिति मे सुधार आया।

दवाओं के साइड इफेक्ट भी कम नहीं
कई ऐंटी ऐप्लिेप्टिक दवाइयों में कुछ स्तर तक विषाक्तता होती है जो रोगी के शरीर पर बुरा असर डालती है।
दवाइयां दिमाग की नर्व्ज की उत्तेजना कम करती है जिससे दिमाग की सामान्य गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती है। अगर बहुत सारी ऐंटी ऐप्लिेप्टिक दवाइयां इस्तेमाल की जाएं तो सोचने, यादाश्त और एकाग्रता जैसी सामान्य गतिविधियों पर असर हो सकता है।

डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (deep brain stimulation)
आशा ने डीप ब्रेन स्टिमुलेशन () थेरेपी के लिए हामी भरी और सर्जरी के छ महीने बाद वो मिर्गी के दौरों से मुक्त हो गई। इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा और अब एक साल से आशा सामान्य जिंदगी बिता रही है। डॉ. आदित्य गुप्ता कहते हैं, जिन रोगियों को कई दवाइयां लेने के बावजूद दौरों से निजात नहीं मिली और जिन रोगियों को सामान्य रूप से की जाने वाली सर्जरी जिसमें दिमाग के उस हिस्से को हटा दिया जाता है जिससे दौरे पड़ते हैं, से भी कोई फायदा नहीं हो रहा उनके लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन थेरेपी () कारगर है। यूके और यूएस में इसकी सफलता का दर बेहद अच्छा रहा है और ये बहुत ही प्रभावी और सुरक्षित उपचार का विकल्प है।

ऐसे काम करती है यह तकनीक
डीबीएस तकनीक में इलेक्ट्रोड को दिमाग के अगले भाग के थेलेमस में रखा जाता है। ये इलेक्ट्रोड उन सिग्नल को रोकते है जो हाथों व पैरों की अकडन करते है। डीबीएस सर्जरी में डीबीएस सिस्टम को मस्तिष्क में प्रत्यरोपित किया जाता है। इसके तीन मुख्य हिस्से हैं-

लीड- एक पतली इंसुलेटिड तार जिसे दिमाग में छोटा सा छेद करने पर उसे दिमाग के उस हिस्से में रखा जाता है जहां मिर्गी के दौरे की गतिविधियां होती है।

एक्सटेंशन – लीड इंसुलेटिड तार है जो एक्सटेंशन से जुडी है जो सिर की त्वचा से होते हुये गर्दन के नीचे और छाती के ऊपर आती है।

न्यूरो स्टेमुलेटर – एक्सटेंशन न्यूरो स्टेमुलेटर से जुड़ा है। ये छोटा सीलबंद डिवाइस है जैसा कि कोर्डियो पेसमेकर में इस्तेमाल किया जाता है। ये हंसली के पास त्वचा में लगाया जाता है। इसमें एक छोटी बैटरी होती है जिसे कंम्यूटर चिप द्वारा प्रोग्राम किया जाता है जो विद्युत तरंगों की सहायता से इसके लक्षणों को रोकने में मदद करता है।
वैसे तो स्टेमुलेटर 3 से 5 साल तक चलता है लेकिन ये काफी हद तक रोगी की जरूरतों पर भी निर्भर करता है। इसको बदलने की तकनीक काफी सरल है। इस सर्जरी को करने से पहले एमआरआई या सीटी स्कैन किया जाता है जिससे ये पता चल सके कि दिमाग के किस हिस्से में गतिविधियां उत्पन्न हो रही है। डीबीएस सिस्टम को प्रत्यारोपित करने के बाद न्यूरो-स्टेमुलेटर से विद्युतीय तरंगे एक्सटेंशन तार और लीड से दिमाग में प्रेषित की जाती है। ये तरंगे दिमाग के उस भाग को स्टेमुलेट करते है जो अकड़न या मिर्गी के दौरे के लिये जिम्मेदार होते है। इस नई प्रक्रिया की जानकारी भारत में बहुत कम है।

Written by:
Dr. Aditya Gupta,
HOD Functional Neuro Surgery
Medanta Medicity, Gurgaon

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