डायबीटीज़ मे इन बातों पर जरूर करें गौर

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आज के टाइम मे डायबीटीज़ देश के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है। गलत लाइफस्टाइल और महंगी दवाएं जहां इससे जुड़ी गंभीर बीमारियों को बढ़ावा दे रही हैं वहीं जागरूकता की कमी अंजाने मे ही उस तबके को भी मुश्किल मे डाल रहा है जो इसके मैनेजमेंट पर पैसा खर्च कर सकते हैं या कर रहे हैं। ऐसे मे हम यहाँ डायबीटीज़ से जुड़ी कुछ अहम बातों की जानकारी आपको दे रहे हैं, ताकि आप इसे सही ढंग से मैनेज कर सकें:

सही इंसुलिन का ही करें इस्तेमाल
फ़ोर्टिस हॉस्पिटल के एचओडी डॉ. अनूप मिश्रा कहते हैं, कई बार नियमित इंसुलिन की डोज लेने के बावजूद ब्लड शुगर लेवल नियंत्रण से बाहर ही रहता है, और गलतफहमी में इसे बेअसर मानते हुए कई लोग इंसुलिन का इस्तेमाल ही बंद कर देते हैं। ऐसे में समस्या और गंभीर हो जाती है। इंसुलिन खरीदते समय यह सुनिश्चित कर लें कि वह सही है या नहीं। हालांकि, इसे देखकर असली-नकली का पता लगाना मुश्किल है। कई बार हम इंसुलिन के रंग से उसके असली-नकली होने का अंदाजा लगा सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए किसी रजिस्टर्ड केमिस्ट से ही इसे खरीदें और इसका बिल जरूर लें। इसके साथ ही यह भी जांच लें कि इंसुलिन के स्टोरेज में तापमान के मानक का ध्यान रखा गया है अथवा नहीं। इसकी गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री तापमान पर रखना चाहिए। केमिस्ट की दुकान से घर तक लाने और घर में इसे स्टोर करने में भी तापमान का ध्यान रखना जरूरी है। कई बार लोग इसे स्कूटर पर दूर-दूर से गर्मी में लेकर आते हैं। अथवा गाड़ी में इंसुलिन रख लेते हैं, पार्किंग में धूप में गाड़ी खड़ी रहने से इंसुलिन खराब हो जाता है। सही तापमान मेंटेन न होने से इंसुलिन का असर कम हो जाता है और इस्तेमाल के बावजूद आपकी समस्या बढ़ती रहती है।

डायबीटीज को समझें
यह हार्मोनल इमबैलेंस, मोटापा और अनहेल्दी लाइफस्टाइल का एक मिक्सड रिजल्ट है। इन कारणों से खाने से मिला कार्बोहाइडृट, जिसे हमारे सेल्स में जाकर एनर्जी देना चाहिए, वह ब्लड में ही घूमता रहता है। इससे ब्लड में शुगर की मात्रा तो अधिक मिलती ही है, यह शरीर के सभी अंगों की नसों को भी प्रभावित करता है।

टाइप 1 डायबीटीज- यह बचपन व टीनएज में अचानक इंसुलिन के प्रॉडक्शन की कमी होने से होता है जिसमें इंजेक्शन लेकर डायबीटीज को कंट्रोल में रखा जाता है।

टाइप 2 डायबिटीज- अक्सर 30 साल की उम्र के बाद यह धीरे-धीरे बढ़ता है। इससे प्रभावित ज्यादातर लोगों का वजन नॉर्मल से ज्यादा होता है अथवा उन्हें पेट के मोटापे की समस्या होती है। यह कई बार हेरिडिटरी होता है तो कई मामलों में खराब लाइफस्टाइल से संबंधित होता है।

हर अंग को प्रभावित करता है डायबीटीज
किडनी पर इसका असर कुछ साल बाद ही शुरू हो जाता है, इसे रोकने के लिए ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों नॉर्मल रखें। ब्लड शुगर स्तर नियंत्रण में रखकर आंखों में मोतियाबिंद, रेटिनोपैथी से बचा जा सकता है। डायबीटीज के मरीजों में अक्सर 65 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते दिल के दौरे की समस्या शुरू हो जाती है। इससे बचने के लिए ग्ललूकोज स्तर नियंत्रण में रखने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर, कोलेस्टृॉल और स्ट्रेस पर नियंत्रण भी जरूरी है।

खान-पान का ध्यान रखना जरूरी
तीन बार साधारण भोजन और दो बार थोड़ा-थोड़ा स्नैक्स, जिसमें घी, तेल की मात्रा कम से कम हो। इसके साथ रोजाना दो बार फल और सलाद खाएं।

क्या कहती हैं नई रिसर्च
1. डायबीटीज नियंत्रण के लिए जीवन शैली में सुधार किसी भी नई या पुरानी दवाओं से अधिक कारगर है
2. अगर आपको दिल के दौरे का अधिक खतरा है तो कुछ दवाएँ बचाव की जगह नुकसान पहुंचा सकती हैं
3. दिल का दौरा आने के बाद ब्लड शुगर ज्यादा कम रखना भी खतरनाक है। ऐसे में फास्टिंग 120 और खाने के बाद 2 घंटे बाद का 180 से कम न होने दें।
4. नई इंसुलिन पर रिसर्च चल रही है, सूंघकर या टैबलेट के रूप में खाकर लिया जा सकता है। इसके आ जाने के बाद डायबीटीज मरीजों की जिंदगी बेहद आसान हो जाएगी।

लगातार ब्लड शुगर स्तर को मॉनिटर करने के लिए नया मॉनिटरिंग सिस्टम जिसे सीजीएम कहते हैं, इंसुलिन पंप एक अन्य नया डिवाइस है जिससे नियमित रूप से इंसुलिन सीधे शरीर में लिया जा सकता है।

ये उपाय भी हैं कारगर
सत्या फाउंडेशन के एक्सपर्ट चेतन उपाध्याय कहते हैं कि, कुछ खास योगासन और प्राणायाम ब्लड ग्लूकोज लेवल और ब्ल प्रेशर को कम करने में सहायक हैं, क्योंकि इनसे शारीरिक और मानसिक तनाव कम होता है। आयुर्वेद के मुताबिक कुछ घरेलू चीजों का इस्तेमाल भी फायदेमंद होती हैं, जैसे मेथी, दालचीनी, करेला आदि।

आर्टिफीशियल स्वीटनर बिगड़ सकता है खेल
ज़्यादातर आर्टिफीशियल स्वीटनर के फायदे नुकसान दोनों होते हैं। इसके बुरे प्रभावों में अनजाने में अधिक मात्रा में कैलोरी ले लेना, पकी हुई चीजों के टेक्सचर में बदलाव, एलर्जी अथवा कार्सिनोजेनिक असर शामिल है। कुछ अन्य रिपोर्टेड साइड इफेक्ट्स में सिरदर्द, घबराहट, मितली, नींद कम आना, याददाश्त कमजोर होना, जोड़ों में दर्द और पल्पिटेशन आदि शामिल है।
हानिकारक –सेक्रीन , ऐसपारटेम ,
न्यूटृल — सुक्रालोज , स्टीविया

करें टेस्ट
-खाली पेट ब्लड शुगर (100-120) और खाने के 2 घंटे बाद (130-160), कम से कम हफ्ते में एक बार टेस्ट करें।
एचबीए1सी टेस्ट ( पिछले 3 महीने का एवरेज) हर 3-4 महीने बाद करवाएं

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