हर अंग पर पड़ता है डायबीटीज़ का असर

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डायबीटीज़ हार्मोनल इमबैलेंस, मोटापा और अनहेल्दी लाइफस्टाइल का एक ज्वाइंट रिजल्ट है। इन कारणों से भोजन से मिला कार्बोहाइड्रेट, जिसे हमारी कोशिकाओं (सेल्स) में जाकर एनर्जी देना चाहिए, वह ब्लड में ही घूमता रहता है। इससे ब्लड में शुगर की मात्रा तो अधिक मिलती ही है, यह शरीर के सभी अंगों की नसों को भी प्रभावित करता है।

टाइप 1 डायबीटीज- यह बचपन या टीनएज में अचानक इंसुलिन के प्रॉडक्शन की कमी होने से उत्पन्न हुआ रोग है जिसमें इंजेक्शन लेकर डायबीटीज को कंट्रोल में रखा जाता है।

टाइप 2 डायबिटीज- अक्सर 30 साल की उम्र के बाद यह धीरे-धीरे बढ़ता है। इससे प्रभावित ज्यादातर लोगों का वजन सामान्य से ज्यादा होता है अथवा उन्हें पेट के मोटापे की समस्या होती है। यह कई बार जेनेटिक होता है तो कई मामलों में खराब लाइफस्टाइल से संबंधित होता है।

हर वाइटल ऑर्गन पर पड़ता है इसका असर
डायबीटीज़ मे किडनी पर कुछ साल बाद ही असर शुरू हो जाता है, इसे रोकने के लिए ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों नॉर्मल रखें। ब्लड शुगर स्तर कंट्रोल में रखकर आंखों में मोतियाबिंद, रेटिनोपैथी से बचा जा सकता है। डायबीटीज के मरीजों में अक्सर 65 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते हार्ट अटैक की समस्या शुरू हो जाती है। इससे बचने के लिए ग्लूकोज लेवल कंट्रोल में रखने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और स्ट्रेस पर कंट्रोल भी जरूरी है।

खान-पान का ध्यान रखना है जरूरी
तीन बार साधारण भोजन और दो बार थोड़ा-थोड़ा स्नैक्स, जिसमें घी, तेल की मात्रा कम से कम हो। इसके साथ रोजाना दो बार फल और सलाद खाएं।

क्या कहती हैं नई रिसर्च
1. डायबीटीज नियंत्रण के लिए लाइफस्टाइल में सुधार किसी भी नई या पुरानी दवाओं से अधिक कारगर है
2. अगर आपको दिल के दौरे का अधिक खतरा है तो कुछ दवाएँ बचाव की जगह नुकसान पहुंचा सकती हैं
3. दिल का दौरा आने के बाद ब्लड शुगर ज्यादा कम रखना भी खतरनाक है। ऐसे में फास्टिंग 120 और खाने के 2 घंटे बाद का 180 से कम न होने दें।
4. नई इंसुलिन पर रिसर्च चल रही है, सूंघकर या टैबलेट के रूप में खाकर लिया जा सकता है। इसके आ जाने के बाद डायबीटीज मरीजों की जिंदगी बेहद आसान हो जाएगी। लगातार ब्लड शुगर स्तर को मॉनिटर करने के लिए नया मॉनिटरिंग सिस्टम जिसे सीजीएम कहते हैं, इंसुलिन पंप एक अन्य नया डिवाइस है जिससे नियमित रूप से इंसुलिन सीधे शरीर में लिया जा सकता है।

कंट्रोल करने के वैकल्पिक उपाय भी हैं कारगर
-कुछ खास योगासन और प्राणायाम ब्लड ग्लूकोज स्तर और ब्लड प्रेशर को कम करने में सहायक हैं, क्योंकि इनसे शारीरिक और मानसिक तनाव कम होता है। आयुर्वेद के मुताबिक कुछ घरेलू चीजों का इस्तेमाल भी फायदेमंद होती हैं, जैसे मेथी, दालचीनी, करेला आदि।

न पड़ें आर्टिफीशियल स्वीटनर के चक्कर में
ज़्यादातर आर्टिफीशियल स्वीटनर के फायदे नुकसान दोनों होते हैं। इसके बुरे प्रभावों में अनजाने में अधिक मात्रा में कैलोरी ले लेना, पकी हुई चीजों के टेक्सचर में बदलाव, एलर्जी अथवा कार्सिनोजेनिक असर शामिल है। कुछ अन्य रिपोर्टेड साइड इफेक्ट्स में सिरदर्द, घबराहट, मितली, नींद कम आना, याददाश्त कमजोर होना, जोड़ों में दर्द और पल्पिटेशन आदि शामिल है।
हानिकारक –सेक्रीन , ऐसपारटेम ,
न्यूटृल — सुक्रालोज , स्टीविया

डायबिटीज के सबसे अच्छे टेस्ट
-खाली पेट ब्लड शुगर (100-120) और खाने के 2 घंटे बाद (130-160), कम से कम हफ्ते में एक बार करें।
एचबीए1सी टेस्ट ( पिछले 3 महीने का एवरेज) हर ३-४ महीने बाद करवाएं

पैरों की सुरक्षा भी है जरूरी
-रोजाना मिरर में पैरों की जांच करें
-पैरों को साफ रखें, खासतौर से तलवे को
-नंगे पैर कभी न चलें, मंदिर में या घास पर भी नहीं
-जूते-चप्पल की रगड़ से अगर त्वचा सख्त पड़ गई हो तो डॉक्टर को दिखाएं
– स्मोक बिल्कुल न करें
– कभी पैरों की गर्म सिंकाई न करें

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