सरकारी अस्पतालों में खराब दवाइयां

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Self Medicationदेश में दवाओं को लेकर हुए एक सर्वे के अनुसार सरकारी अस्पतालों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। सर्वे के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में 10 फीसदी दवाओं की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। ये खराब दवाइयां मरीजों की जान पर मुसीबत बन सकती है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार बाजार में बिक रही 3.2 फीसदी दवाओं की गुणवत्ता खराब है।

खराब गुणवत्ता और नकली दवाओं पर जांच

नेशनल ड्रव सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, जांच के लिए दो मानकों नकली दवाओं और खराब गुणवत्ता में बांटा गया। देशभर में हुए सर्वे से पता चला कि बाजार में बिकने वाली दवाओं में 3.16 फीसदी दवाओं की गुणवत्ता खराब थी। 0.0245 फीसदी नकली दवाओं

सरकारी केंद्रों पर स्थिति ज्यादा खराब

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल्स ने 2014-2016 में देश भर में सर्वे किया। सर्वे के दौरान सरकारी अस्पतालों, डिस्पेंसरियों और दवा की दुकानों से 47,954 सैंपल लिए गए। जिनके नतीजे चौंकाने वाले निकले। बाजार से ज्यादा दवाओं की खराब गुणवत्ता सरकारी अस्पतालों में मिली। केमिस्ट की दुकानों पर जहां तीन फीसदी दवाओं की गुणवत्ता खराब थी तो वहीं सरकारी अस्पतालों में इसका आंकड़ा 10 फीसदी था।

नकली दवाएं भी सरकारी केंद्रों में ज्यादा

सर्वे के दैरान फुटकर दुकानों में 0.023 फीसदी नकली दवाएं पाई गई। जबकि सरकारी केंद्रों में 0.059 फीसदी। यानि कि फुटकर दुकानों से औसतन दोगुना। सर्वे के अनुसार स्थिति में फिलहाल सुधार हो रहा है।

इन राज्यों का सबसे खराब स्तर

खराब दवाओं की गुणवत्ता के मामले में उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मिजोरम, तेलंगाना, मेघालय, नागालैंड और अरूणाचल प्रदेश अव्वल हैं। यहां पर 11.39-17.39 फीसदी दवाएं खराब थीं। जबकि दिल्ली, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और चंडीगढ़ में 7.39 फीसदी थी।  

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