अटूट विश्वास ने रोशन किया जीवन

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किसी भी माँ के लिए इससे बुरा क्या होगा कि जिस बच्चे को लेकर वह रात दिन सपने सजा रही है, उसके  मानसिक रूप से विक्षिप्त होने का खतरा है। सुनते ही मानो मुझ पर पहाड़ टूट गया हो। डॉक्टर ने मेरी हालत देखी, तो घायल हो चुके मेरे मन पर मरहम लगाने की नीयत से कहा कि मैं ऐसा नहीं कह रही कि बच्चे में कमी होगी ही, इसके चांसेज बहुत कम है, परन्तु आप खतरे में है, इससे मैं इंकार नहीं कर सकती।

सरकारी जॉब मिलने के बाद मेरी प्रेग्नेंसी,  लगा था कि ईश्वर ने मेरी झोली खुशियों से भर दी है । पत्रकारिता की जॉब में खुद के लिए तो वक्त था नहीं, बच्चे को कैसे संभालती। सरकारी जॉब में वक्त भी होगा और काम का प्रेशर भी कम होगा, तो अपने नवजात को अच्छे से वक्त दे सकूंगी। खुशी-खुशी दिन बीत रहे थे। इस दौरान खुद को पैम्पर करने का एक भी मौका मैं नहीं गंवाती थी। ब्रिस्क वॉक, हेल्दी खाना, कम और बार-बार खाना, वक्त पर दवाई। पर उस दिन मानो मेरी खुशियों को किसी की नजर लग गई थी। सुबह रूटीन चेकअप के लिए मैं पति के साथ डॉक्टर के पास गई थी। उसके बताए कुछ टेस्ट की रिपोर्ट भी मेरे पास थी। टेस्ट की रिपोर्ट देखते ही डॉक्टर ने जो कहा उसने मुझे अन्दर तक हिला दिया। डॉक्टर ने कहा कि हमारा होने वाला बच्चा खतरे में है। वह मानसिक रूप से कमजोर या  विक्षिप्त हो सकता है।

वह ऐसा किस आधार पर कह रही हैं, पूछा तो डॉ. ने समझाना शुरू किया। दरअसल, सभी गर्भवती महिलाओं को, जिनकी उम्र डिलिवरी के वक्त 30 साल या उससे ज्यादा हों,  Amniocentesis या Chorionic Villus Sampling के साथ Pre-natal Diagnosis कराने की सलाह दी जाती है। इसमें जन्म से पहले बच्चे की मानसिक और शारीरिक स्थिति का पता लगाया जाता है। लिहाजा मेरा अल्ट्रासाउण्ड लेवल-2 टेस्ट कराया गया  था। डॉक्टर के अनुसार, इसमें 3 तरह के टेस्ट जुड़े होते हैं- Neural Tube defects (NTD), Trisomy 18, और  Trisomy 21, रिपोर्ट मे  Trisomy 21 (Down Syndrome)  का ग्राफ कट-ऑफ से ऊपर था, जो खतरे का इशारा था। इसमें Calculated risk 1: 77 और Age risk 1:865 दिखा रहा था।

मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी। डॉ. ने  बोलना जारी रखा। उनके अनुसार यदि हम यह कंफर्म कराना चाहते है कि हमारा बच्चा पूरी तरह ठीक है या नहीं, तो केवल दिल्ली के एक नामी अस्पताल में कानूनी प्रावधानों के तहत ऐसा टेस्ट कराया जाता है। अमूमन इस टेस्ट पर 99.4% यकीन किया जाता है। डॉ. के अनुसार प्रेग्नेंसी के 15वें और 18वें हफ्ते के बीच यह टेस्ट कराया जा सकता है। यदि कमी की पुष्टि हो जाए, तो दम्पति गर्भपात करा सकते हैं। इससे ज्यादा देर होने पर कानून के लिहाज से भी और शारिरिक तौर पर भी ऐसा नहीं कराया जा सकता। डॉक्टर बोलती जा रही थी और मैं अवाक सुन रही थी। उनके अनुसार विक्षिप्त बच्चों को दुनिया में लाकर हम उनके साथ अन्याय ही करते है। अब फैसला मुझ पर था। इस बारे में सोचने और दिल्ली के उस अस्पताल का नाम पता लेकर हम बोझिल मन से घर लौट आए।

आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये कैसे हो गया, क्यों हो गया, यह मेरा पहला बच्चा था, चार माह बीत चुके थे। दिमाग में जैसे हथौड़े बज रहे थे। मैं किसी भी सूरत में इस बच्चे को खोना नहीं चाहती थी। पर बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना भी मेरी जिम्मेदारी थी। इसी उधेड़बुन में तीन-चार दिन निकल गए। कुछ ख़ास लोगों से राय ली, इंटरनेट पर आर एण्ड डी किया। आखिकार मन बनाया कि दिल्ली जाकर कंफर्म कराऊंगी। फोन कर वहां के अस्पताल से अपॉइंटमेंट भी ले लिया।

अपॉइंटमेंट लेते वक्त एक्सपर्ट डॉक्टर का नाम पूछा और उनसे बात कराने की गुज़ारिश की। फोन उठाने वाले ने शायद मेरी घबराहट को मेरी आवाज में महसूस कर लिया था, सो उसने संबंधित डॉक्टर से मेरी बात करवा दी। मैंने उनसे पूछा- कि यह टेस्ट क्या है, इसमें मेरे बच्चे को कोई खतरा तो नहीं, किस्मत से उनके पास इतना समय था कि वह मुझे सब समझा सकें। उन्होंने बताया, इस टेस्ट में गर्भ के अन्दर बच्चा जिस वॉटर बैग (Amniotic fluid) में होता है, उसकी बहुत छोटी मात्रा (1 ओंस से भी कम) सुई की सहायता से, जो Abdomen से होकर यूट्रस में डाली जाती है,  निकाली जाती है। इस फ्लूइड में भ्रूण के लाइव स्किन सेल्स एवं अन्य चीजे जैसे AFP (Alpha-Fecto protein) आदि मौजूद होती हैं,  जो जन्म से पहले बच्चे की स्थिति की जानकारी देने में मदद करती हैं। फ्लूइड निकालने के बाद इसे जाँच के लिए लैब में भेज दिया जाता है। इस पर कई अलग-अलग टेस्ट किये जा सकते हैं। यह कुछ खास जन्मजात कमियों  जैसे- Down Syndrome, Chromosonal abnormality आदि का पता लगाता है।

यह पूछने पर कि अगर बच्चा ठीक हुआ, तो इस टेस्ट के दौरान उसे कोई खतरा तो नहीं होगा, डॉ. ने जवाब दिया, हालांकि यह टेस्ट एक्सपर्ट द्वारा कराया जाता है, फिर भी खतरे की आशंका तो रहती है। इसमें बच्चे या माँ को चोट लगने,  इन्फेक्शन होने,  एबोर्शन होने या समय से पहले लेबर पेन शुरू कोने का दर रहता है, लेकिन ये खतरे  नाममात्र होते हैं। उन्होंने कहा, प्रक्रिया से पहले जेनेटिक काउंसलिंग लेने और इस टेस्ट के फायदे, नुकसान अच्छी तरह से समझ लेने के बाद, इसे कराने या नहीं कराने का फैसला ले सकती हो।

मन में उधेड़बुन अभी भी चल रही थी। डॉक्टर ने कहा कि खतरा नाममात्र का होता है, ऐसे में क्या यह टेस्ट कराना चाहिए। वैसे सब एक्सपर्ट ही तो करेंगे, फिर डर किस बात का। मेरे जीवन में यह पहला मोड़ था, जब मुझे इतना कठिन फैसला करना था। मेरी एक चूक मुझसे मेरा बच्चा छीन भी सकती थी, और जिन्दगी भर उसके लिए अभिशाप भी बन सकती थी। मेरे पति ने सब मुझ पर छोड़ दिया था। इस मुश्किल वक्त में मैं खुद को बेहद कमजोर, टूटा हुआ महसूस कर रही थी।

सोच-विचारों से लड़ते-लड़ते अपनी टेस्ट रिपोर्ट कई बार पढ़ चुकी थी मैं। लेकिन यह क्या, इस बार जो पढ़ा, उस पर अब तक ध्यान नहीं गया था मेरा। उसमें लिखा था- Trisomy-21 टेस्ट के रिजल्ट मे 100 मे से  लगभग 77  महिलाओं में ऐसे आंकड़े की अपेक्षा की जाती है, परन्तु इसमें से सिर्फ 1 महिला Trisomy-21  प्रेग्नेंसी से प्रभावित होती है,  बाकी 76 महिलाएं नहीं।

पढ़ने के बाद सोचा- ओह इसका प्रतिशततो काफी कम है। 77 मे से 1।  पर वो एक मैं हुई तो। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होगा। उसी वक्त अपनी डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लिया और अगले दिन उनसे मिली। वो डीटेल और डेटा दिखाया। उन्होने कहा मैं फिर कह रही हूं, जरूरी नहीं है ऐसा हो, सब ठीक हो सकता है। कमी के चांसेज बहुत कम होते हैं। मैंने इस बार साफ कह दिया, कि मैं इस बच्चे को जन्म दूंगी। आप ये बताइये मैं अपनी तरफ से क्या कर सकती हूं। उसने कहा ठीक से सोच लिया है ना? मेरी आवाज में अब कुछ दम था। मैंने कहा, हां सोच लिया है। उसने आगे कहा-बस यह पॉज़िटिव सोच ही है, जिससे तुम अपने बच्चे को बचा सकती हो। खुश रहो, अच्छी बातें करो, अच्छा बोलो, अच्छे वातावरण में रहो। अब मेरी घुटन कुछ कम होने लगी थी। मैंने तय कर लिया था कि अब सिर्फ बच्चा ही मेरी प्रायॉरिटी होगा।

अब यह मेरे लिए टास्क बन गया था। मैंने शुरुआत  कर दी थी। मैं अच्छी किताबें पढ़ती, अच्छा सोचती, डायरी बनाती, जो अच्छा लगता उसे जरूर करती। सिर्फ उन्हीं लोगों से बात करती जिनसे बात करके मुझे सकारात्मक ऊर्जा मिलती। वो लोग भी मेरी जरूरत को समझते थे, इसलिए बदले में वही देते जो मुझे उनसे चाहिए था। दिन धीरे-धीरे बीतने लगे। मन के किसी कोने में डर दुबक कर बैठा था, लेकिन सकारात्मकता बाकी सारे कोने रोशन कर चुकी थी। ईश्वर की प्रार्थनाओं में भी मैं अपने बच्चे का स्वस्थ जीवन ही मांगती। ऐसा नहीं कि इस दौरान मेरा दुखों से वास्ता नहीं पड़ा या मैं रोई नहीं। सब कुछ हुआ पर मेरा विश्वास कमजोर नहीं पड़ा। सफल डिलिवरी को लेकर भी मैंने वो सब किया, जो मेरे डॉक्टर ने मुझे सुझाया। इस दौरान मेरे भाई की शादी भी हुई, जिसमें मुझे दौड़ना-भागना पड़ा। मतलब व्यस्तता ने मुझे बांधने की कोशिश की। लेकिन मैंने हर बंधन को ढीला कर दिया। अपने बच्चे के प्रति हर कर्तव्य को मैंने निभाया।

आखिरकार वो घड़ी आ गई, जब मेरे घर में किलकारियां गूंजने वाली थीं। सब खुश थे।  डिलिवरी को लेकर मैं चिंतित तो थी, लेकिन उससे ज्यादा यह डर था कि कहीं मेरा फैसला गलत ना साबित हो जाए। कहीं मैं खुद ही अपने बच्चे की अशक्तता  का कारण न बन जाऊँ। मन में डर और होठों पर प्रार्थनाओं के साथ आखिर मैं लेबर रूम में चली गई। कुछ देर बाद पता चला कि बच्चे का सिर घूम गया है, जिसकी वजह से ऑपरेशन करना पड़ेगा। रात के 9:30 बजे मुझे ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया। सभी तैयारियों के बाद मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी गई। कुछ देख या महसूस नहीं कर पा रही थी, पर यह पता चल रहा था कि कुछ हो रहा है। अचानक बच्चे के रोने की आवाज आयी और मेरे चेहरे पर मुस्कान तैर गई। इसी के साथ नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया।

होश आया तो देखा सामने लगी घड़ी 11:00  बजा रही थी। आसपास कुछ लोगों के बात करने की आवाज आ रही थी। गर्दन घुमाई तो एक नर्स नजर आई। उससे पूछा-क्या हुआ है?  बोली बेटी। मैंने फिर पूछा ठीक है ना, बोली हाँ। मैंने कहा, नहीं कोई कमी तो नहीं है। उसने फिर जवाब दिया, ज्यादा मत बोलो अभी चुप रहो। मैंने मन ही मन कहा, ओहो इसे क्या पता होगा । कुछ देर बाद मेरे स्ट्रेचर को हमारे रेंटेड रूम मे ले जाया गया। वहां मेरे पापा बच्ची को गोद में लिये टेढ़ा करके उसे मुझे दिखा रहे थे। सब लोग बहुत खुश थे। बच्ची की फोटो खींची जा रही थी। देखकर सब अच्छा लग रहा था। लेकिन मेरा मन शांत नहीं था। अपनी माँ को इशारे से पास बुलाया। पूछा, डॉक्टर से पूछा-ठीक है ना वो। माँ बोली चिन्ता मत कर वो बिल्कुल ठीक है। हमने चाइल्ड स्पेशलिस्ट से भी पूछ लिया है। सब ठीक है।

ओह! गॉड। कुछ कहते नहीं बन रहा था। आंखों से ढलकते आंसुओं ने ईश्वर को धन्यवाद कह दिया था। माँ मेरी पीड़ा को समझती थी इसलिए मेरे आंसुओं को भी समझ रहीं थी। बिस्तर पर तो मेरा बस शरीर पड़ा था, मेरा मन तो नाच रहा था। रह रहकर ईश्वर को धन्यवाद कह रहा था। मेरी सकारात्मकता ने मेरे बच्चे को नया जीवन दे दिया था। सही मायनों में डर की वो काली रात बीत गई थी। अब सामने रंगीन और नई सुबह थी

आज ईरा एक साल की है। पूरी तरह स्वस्थ, दिमाग से चुस्त और स्वभाव से बेहद चंचल।

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6 comments

  1. Manju 7 August, 2014 at 21:20

    You are a tough Woman we all know this.I love you that’s all which I want to say you this point of time.I know each and everything about you but still your feature filled my eyes from that pain which you were supposed to face that time. May God bless you and Era.

  2. Hemlata Bhardwaj 18 August, 2014 at 13:07

    बहुत ही साफगोई से आपने अपनी बात को रख दिया। बिटिया को जन्मदिन की शुभकामनाएं। वह हमेशा ऐसे ही स्वस्थ और चंचल रहे।

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