जज्बे से जीत ली जिंदगी की जंग

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कार्डिएक अरेस्ट के साथ हुआ था मल्टी ऑर्गन फेलियर

सीने में दर्द की शिकायत के बाद जब विनोद गोर्खे को डॉक्टर के पास ले जाया गया तब उन्हें इस बात का अंदेशा नहीं था कि उन्हें बीमारियों से गंभीर जंग लड़नी पड़ सकती है। सिर्फ 35 साल की उम्र होने के नाते विनोद को गंभीर हार्ट अटैक का अंदेशा भी कम था, मगर हालत देखने के बाद डॉक्टर ने उन्हें तुरंत टर्शरी केयर अस्पताल में रेफर कर दिया। जब वह अस्पताल जा ही रहे थे उन्हें गंभीर कार्डिएक अरेस्ट आ गया।

जब विनोद कोलंबिया एशिया अस्पताल पुणे पहुंचे तब उनकी पल्स गायब थी ब्लड प्रेशर का पता नहीं चल रहा था, जिसे देखकर उनका परिवार उनके बचने की उम्मीद खो चुका था। मौत के खिलाफ विनोद की गंभीर जंग की शुरूआत हो चुकी थी। अस्पताल के आपातकालीन विभाग के कर्मचारियों की एक प्रभावी टीम ने तुरंत सही कदम उठाया, जिसमें विनोद की किस्मत ने भी उनका साथ दिया और किसी चमत्कार की ही तरह विनोद की जिंदगी बच गई। दो महीने की कोशिशों के बाद आज विनोद ठीक हो चुके हैं।
मरीज अब पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी रहे है। अब उनके शरी का न्युरोलॉजिकल फंक्शन पूरी तरह ठीक है जो कि ऐसे मामलों में बेहद मुश्किल होता है। वह अब अपनी कहानी खुद की जुबानी बयां कर रहे हैं।

विनोद की कहानी
इस पूरी जंग की शुरूआत 19 जुलाई 2014 को हुई थी जब विनोद को अचानक सीने में तेज दर्द महसूस हुआ। डॉक्टर के पास गए तो ईसीजी में पता लगा कि उन्हें गंभीर हार्ट अटैक हुआ है। कुछ ही देर में उनकी पल्स पूरी तरह गायब हो गई। उन्हें खरादी पुणे स्थित कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्हें गंभीर कार्डिएक अरेस्ट भी हो गया।

बिना पल्स वाले इस मरीज, जिसके बचने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी, को देखकर अस्पताल की कोड ब्लू टीम जिसकी अगुवाई कंसल्टेंट इंसेंटिविस्ट डॉ. मेघना पांडे करती हैं, को नर्सिंग स्टाफ के साथ तुरंत सक्रिय किया गया। तुरंत कार्डियोपल्मनरी रीससिटेशन यानी सीपीआर शुरू किया गया और इसे एक घंटे तक चालू रखा गया, तब तक जब तक कि मरीज की पल्स वापस नहीं आ गई।

जब पल्स वापस आ गई तब मरीज को आपातकालीन कारोनरी एंजियोग्राफी के लिए कैथलैब में शिफ्ट कर दिया गया। इसके रिजल्ट में पता लगा कि उनकी एक नस में रक्त संचार पूरी तरह बंद हो चुका है। इसके बिना बिना वक्त गंवाए कंसल्टेंट हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. मनोहर साखरे ने थक्कों से बंद हो चुकी नस को खेलने के लिए तुरंत मरीज की एंजियोप्लासटी की। ऐसे में दिल की मांसपेशियों तक दोबारा रक्तसंचार होने लगा और आगे इसमें कोई डैमेज नहीं हुआ।

डॉ. सखारे ने बताया एंजियोप्लासटी के बाद मरीज को इंटेंसिव केयर वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया और उसे कृत्रित वेंटिलेशन और आइनोट्रोप पर रखा गया क्योंकि उसका ब्लड प्रेशर बेहद कम था। पीटीसीए के बाद उसके हृदय के निचले भाग के फंक्शन में थोड़ा सुधार आया। चूंकि मरीज को लंबा कार्डिएक अरेस्ट हुआ था, ऐसे में उसके शरीर के कई अंगों में समस्या हो गई थी, जैसे कि रीनल फेलियर, हेपैटिक फेलियर, पेट में ब्लीडिंग और न्युमोनिया भी हो चुका था।’ उसका किडनी फंक्शन फेल हुआ था, ऐसे में उसे तुरंत अस्पताल के किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. गनेश म्हेत्राज के सुपुर्द किया गया।

डॉ. म्हेत्राज ने बताया, मरीज को कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट हुआ था जिसके चलते उसे एक घंटे तक रीससिटेशन की जरूरत पड़ी थी। इस दौरान किडनी तक पर्याप्त मात्रा में रक्त और ऑक्सिजन नहीं पहुंचा, जिसके चलते इसे गंभीर नुकसान हो गया। 4 हफ्तों तक मरीज की किडनियों ने पेशाब नहीं बनाया। आईसीयू में रहने के दौरान मरीज को हीमोडायलिसिस का 26 सेशन दिया गया तब जाकर उसकी किडनी में पेशाब बनना शुरू हुआ।

हीमोडायलिसिस में कृत्रित तरीके से रक्त की सफाई की जाती है और इसके गैर जरूरी तत्वों को अलग किया जाता है, स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में यह कार्य उनकी किडनियां करती हैं। ऐसा किडनी के पूरी तरह फेल होने अथवा इसके कगार पर पहुंच जाने की स्थिति में किया जाता है। विनोद के मामले में 4 हफ्तों तक हीमोडायलिसिस की जरूरत पड़ी तब जाकर उनकी किडनी ने सामान्य रूप से काम करना चालू किया।

तमाम समस्याओं से जूझ रहे विनोद के लिवर फेलियर का भी इलाज किया गया। इतना ही नहीं 4 हफ्तों के दौरान उनके पेट में ब्लडिंग और न्युमोनियां का भी इलाज हुआ। इस सबके लिए उन्हें 41 दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। इसके बाद स्वस्थ होने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी गई।

अस्पताल के महाप्रबंधक डॉ. सुनीज राव कहते हैं, यह ऐसे गंभीर मामले का एक उदाहरण है, जिसमें बेहद नाजुक हालत में भी डॉक्टरों की टीम हार नहीं मानती है और अपनी कोशिशों एवं अग्रेसिव थेरपी के जरिए न सिर्फ मरीज का जीवन बचाती है बल्कि उसके जीवन की गाड़ी को सामान्य पटरी पर भी ले आती है। हालांकि इस तरह के मामले बेहद कम देखने को मिलते हैं। दरअसल कार्डिएक अरेस्ट के अधिकतर मामलों में मरीज वक्त पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते हैं। ऐसे में उनके बचने की उम्मीद 15 फीसदी ही रहती है। जो मरीज बच जाते हैं उनमें से भी बहुत सारे लोगों को न्युरोलॉजिकल समस्याएं होने का खतरा रहता है।

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