जाने मेडिकल टेस्ट कराने का सही आधार

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अगर आप रोजाना तीन से 4 किलोमीटर तेज कदमों से चल सकते हैं, और ऐसा करते हुए आपकी सांस नहीं उखड़ती है। अथवा सीने में दर्द नहीं होता है तो यह मान सकते हैं कि आपका दिल पूरी तरह स्वस्थ्य है। लेकिन यह फॉर्म्यूला उन लोगों पर लागू नहीं किया जा सकता है जिन्हें डायबीटीज जैसी समस्या है, क्योंकि उन्हें साइलेंट इस्कीमिया भी हो सकता है।

हार्ट केयर फॉउन्डेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल कहते हैं, ‘यह बात जरूर याद रखें कि अगर किसी को दिल की बीमारियों के लक्षण सामने आना शुरू हो गए हैं तो यह मान के चलें कि उसे 70 पर्सेंट समस्या हो चुकी है। इस स्थिति से बचने के लिए रिस्क प्रोफाइल जानना और उसके आधार पर कुछ सामान्य टेस्ट कराते रहना जरूरी है। इसे आप दो उदाहरणों से समझ सकते हैं:

-एक 18 साल का लड़का रेग्युलर एक्सरसाइज करता है। पढ़ाई से लेकर खेलकूद के जरिए पूरे दिन एक्टिव रहता है। दिल की बीमारी अथवा इसके लिए जिम्मेदार हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्टृॉल, डायबीटीज जैसी किसी समस्या का उसका पारिवारिक इतिहास नहीं है। उसकी खानपान की आदत ठीक है तो उसे दिल की बीमारी होने का चांस कम है। ऐसे में उसको कोई टेस्ट कराने की जरूरत नहीं है।

-वहीं 55 साल के एक व्यक्ति धूम्रपान करते हैं, उन्हें हाई ब्लड प्रेशर की भी समस्या है। वह कभी कभार ही एक्सरसाइज कर पाते हैं और दिल की बीमारी का उनका पारिवारिक इतिहास भी है। ऐसे में उनको दिल की बीमारी होने का खतरा काफी ज्यादा है।

यानी टेस्ट कराना है या नहीं, इस बात का फैसला करने के लिए व्यक्ति का रिस्क प्रोफाइल आधार बनता है। अगर उम्र कम है, अच्छी जीवनशैली है, बीमारी का कोई पारिवारिक इतिहास नहीं है तो बीमारी का खतरा कम है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, जीवनशैली खराब होती है और इसके साथ पारिवारिक इतिहास भी जुड़ जाता है तो खतरा बढ़ जाता है।

तो कराएं टेस्ट…
अगर पारिवारिक इतिहास डायबीटीज, हार्ट प्रॉब्लम, स्ट्रोक आदि का है तो 30 साल की उम्र में रूटीन टेस्ट शुरू करा देने चाहिए। अगर टेस्ट रिपोर्ट सामान्य हो तो हर पांचवें साल में और अगर कोई एबनॉर्मेलिटी है तो उसके हिसाब से डॉक्टर की सलाह पर कदम उठाएं। अगर पारिवारिक इतिहास खराब नहीं है तो महिलाओं को 40 साल में और पुरूषों को 35 साल की उम्र में टेस्ट शुरू करा देना चाहिए और इसे 2 से 5 साल में रिपीट कराएं। टेस्ट में लिपिड प्रोफाइल, 2डी ईको और टीएमटी शामिल करें।

डाइट पर दें ध्यान
हर किसी को, चाहे उसे दिल की बीमारी हो अथवा न हो, संतुलित आहार लेना चाहिए। संतुलित आहार का मतलब है, जिसमें कार्बोहाइडृट, प्रोटीन, विटामिन आदि की र्प्याप्त मात्रा हो। वनस्पति घी अथवा देसी घी में खाना बनाने से बचें। टोंड मिल्क का इस्तेमाल करें। बादाम और अखरोट जैसे डृईफ्रूट गुड कोलेस्टृॉल के सबसे अच्छे स्रोत हैं।

समझें तेल का खेल
फैट दो तरह का होता है। एक हैवी फैट, जो किसी भी तापमान में जम जाता है, जैसे कि घी, मक्खन, मलाई, चॉकलेट, मटन आदि।
दूसरा होता है लिक्विड फैट, जो कि जमता नहीं है और जिसकी थोड़ी मात्रा शरीर के लिए आवश्यक होती है। इनमें सरसों का तेल या कैनोला ऑयल आदि शामिल है। कैनोला सरसो की प्रजाति का होता है, लेकिन इसमें सरसो के तेल की तरह कड़वेपन वाली महक नहीं होती है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक कैनोला ऑयल और ऑलिव ऑयल सेहत के लिए बेस्ट होता है, मगर दोनों के इस्तेमाल में बुनियादी फर्क यह है कि ऑलिव ऑयल में डीप फ्राइंग नहीं की जा सकती है, इसे सलाद आदि में अथवा सब्जियां सॉते करने में इस्तेमाल किया जा सकता है। कैनोला ऑयल डीप फ्राइंग के लिए बेस्ट होता है। चूंकि देश में सरसों का तेल लंबे समय से और एक बड़ी आबादी द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है, ऐसे में इसके परिणामों से भारतीय एक्सपर्ट सबसे ज्यादा परिचित हैं, जिनके आधार पर वे सरसों के तेल को बेस्ट बताते हैं। हालांकि साथ में यह भी कहा जाता है कि कोई भी तेल आइडियल नहीं होता। ऐसे में दो-तीन तरह के तेल बदल-बदल कर इस्तेमाल करें। जहां तक तेल के इस्तेमाल की हेल्दी लिमिट की बात है तो तीन चम्मच प्रति दिन इस्तेमाल किया जा सकता है।

दिल की बीमारी और गैस की समस्या
इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्टिल के एक्सपर्ट डॉ. एल. के झा कहते हैं, चेस्ट पेन होने पर अक्सर यह कन्फ्युजन रहती है कि इसके लिए गैस की समस्या जिम्मेदार है अथवा दिल की बीमारी। खासतौर से उन लोगों में जिनमें दिल की बीमारी का पता नहीं होता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस तरह की कन्फ्युजन में कई बार लोगों की जान भी चली जाती है। ऐसे में अगर किसी को पता है कि उसे हार्ट की बीमारी है तो वह ऐस्पिरिन की गोली अपने पास रखे। चेस्ट पेन होने पर जुबान के नीचे ऐस्पिरिन की गोली रखे। लेकिन जिन्हें नहीं पता है वे इसे अपनी मर्जी से बिल्कुल न लें क्योंकि इससे उनका ब्लड प्रेशर तेजी से गिर जाता है।
चेस्ट पेन के मामले में कुछ लक्षणों पर गौर करें, मसलन अगर एग्जर्शन की वजह से दर्द हो रहा है तो इसके दिल से संबंधित होने के चांसेज ज्यादा हैं। आराम करते समय होने वाला चेस्ट पेन जो कुछ सेकंड में गायब हो जाता है वह एसिडिक हो सकता है। लेकिन यह ध्यान रखें कि आराम के समय होने वाला चेस्ट पेन भी अगर जबड़े और बाईं बांह तक पहुंच रहा है तो यह हार्ट से संबंधित है। लक्षणों को लेकर जरा सा भी कन्फ्युजन हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें और ईसीजी टेस्ट कराकर सही वजह का पता लगाएं।

रखें इन बातों का ध्यान
-हर किसी को अपने शरीर का वनज लंबाई के अनुपात में सामान्य रखना चाहिए। धूम्रपान और अधिक मात्रा में अल्कोहल के इस्तेमाल से बचें। कम से कम हफ्ते में 5 दिन, 30 मिनट एक्सरसाइज करें। संतुलित आहार लें।
-जो लोग दिल की बीमारी से पीड़ित हैं उनके लिए बेहतर होगा हफ्ते में 5 दिन 30 से 40 मिनट ब्रिस्क वॉक करें। हल्की जॉगिंग फायदेमंद है, मगर इन्हें वनज उठाने वाली एक्सरसाइज करने से मना किया जाता है।
-आपके शरीर का वनज आपकी लंबाई के अनुपात में होना चाहिए। लंबाई के अनुपात में कमर की चौड़ाई का रेशियो 0.85 से कम होना चाहिए।

हार्ट अटैक को ऐसे करें मैनेज
अगर किसी को हार्ट अटैक आने का अंदेशा होता है तो सबसे पहले उसे अगर डिस्प्रिन टैबलेट उपलब्ध है तो उसे चबाना चाहिए और जीभ के नीचे सॉर्बिटृट टैबलेट रखना चाहिए। घबराएं नहीं। ज्यादा दौड़भाग न करें और तुरंत करीबी अस्पताल पहुंचने की कोशिश करें।

सेक्सुअल लाइफ हो सकती है प्रभावित
एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट के डॉ. समीर श्रीवास्तव कहते हैं, दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों के दिमाग में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या अब वह पहले की तरह अपने जीवनसाथी के साथ अंतरंग संबंध बना सकेंगे। दिल के इलाज या प्रॉसीजर के बाद भी कहीं सेक्सुअल संबंध बनाना उनके लिए खतरनाक तो नहीं होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सावधानी न बरतने पर ऐसा करना जानलेवा भी हो सकता है, इसके कई उदाहरण भी सामने आएं हैं।
अगर व्यक्ति को पहले से दिल की बीमारी है और उसका इलाज नहीं हुआ है, तो बेहतर है कि वह संबंध बनाने से बचे। अगर बीमारी का इलाज हो चुका है तो वह सामान्य जिंदगी जी सकता है। लेकिन इससे पहले यह जरूर देख लें कि आप ऐसा करने के लिए फिट हैं अथवा नहीं। इसके लिए एक टृडमिल टेस्ट होता है। अगर कोई 5 मिनट से अधिक समय टृडमिल टेस्ट बिना सांस उखड़े या बिना दर्द के कोई कर सकता है तो वह फिट है। मगर ऐसे लोगों का वायग्रा जैसी दवाएं बिल्कुल नहीं लेना चाहिए, खासतौर से तब जब वे नाइट्ृट की कैटिगरी की कोई दवा ले रहे हों। क्योंकि सिल्डेनालिल कैटिगरी की दवा लेने से कई दिल के मरीजों की सेक्स के दौरान ही सडन हार्ट अटैक से मौत के मामले सामने आ चुके हैं। इस बारे में अपने डॉक्टर की सलाह लें।
आमतौर पर हार्ट अटैक आने अथवा हार्ट संबंधी बीमारी के इलाज के बाद पहले दो हफ्ते तक सेक्स करने से परहेज बताया जाता है। इसके बाद टृडमिल टेस्ट पास करने वाले को सामान्य एक्टिविटी की अनुमति दी जाती है। इसके बावजूद भी सेक्स के दौरान अगर चेस्ट पेन या प्रेशर महसूस हो, थकान, बेहोशी, नॉजिया, सांस लेने में तकलीफ, पल्स तेज होने अथवा सिर चकराने जैसे लक्षण महसूस हां तो समझ जाएं कि आपके दिल को बेहद कठिनाई हो रही है। अपने डॉक्टर से सलाह लें।

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