साइबरस्पेस में शरीर की डिजिटल प्रति

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cyberspace version of human body
मनुष्य (Human) एक दिन अपने शरीर की डिजिटल (Digital) प्रति साइबरस्पेस (Cyberspace) में संभाल कर रख सकेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि डॉक्टर मरीज के वास्तविक शरीर की तुलना उसकी डिजिटल प्रति (Digital version) से करके उसकी बीमारी का सही इलाज कर सकेंगे।

अमेरिका में नेवाडा यूनिवर्सिटी के एक विशेषज्ञ, डॉ.जेम्स मा का कहना है कि शरीर के अंगों और ऊतकों की त्रिआयामी प्रतियां संग्रहित करने की टेक्नोलॉजी विकसित हो चुकी है। कुछ मेडिकल कॉलेजों ने तो डिजिटल शरीरों पर शल्य क्रिया के लिए टेबलों पर लगी स्क्रीनों का इस्तेमाल करना शुरू भी कर दिया है। डॉ.मा के अनुसार अमेरिकी सेना अपने सैनिकों के 3डी बॉडी स्कैन संग्रहित करने पर विचार कर रही है ताकि युद्धमोर्चों पर तैनात डॉक्टर जख्मी सैनिक के शरीर का मिलान उसकी कंप्यूटरी प्रति से कर सकें। एक दिन संपूर्ण आकार के वर्चुअल शरीर का इस्तेमाल 3डी प्रिंटरों के जरिए एवजी अंग निर्मित करने के लिए भी किया जा सकेगा। कुछ सर्जन इस समय कैंसर या दुर्घटना की वजह से नष्ट होने वाली अस्थियों को पुनर्निर्मित करने के लिए 3डी प्रिंटिंग का सहारा ले रहे हैं। यदि मरीजों की संपूर्ण अस्थियों की प्रतियां डिजिटल रूप में संग्रहित हों तो सर्जन 3डी प्रिंटिंग से ज्यादा अच्छे नतीजे हासिल कर सकते हैं।

डॉ. मा ने पिछले दिनों सेन जोस, कैलिफोर्निया में अमेरिकी विज्ञान सम्मेलन को बताया कि हमारा मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति के शरीर की स्वस्थ अवस्था में स्कैनिंग करना है ताकि बाद में जरुरत पड़ने पर डेटा का उपयोग किया जा सके। सैनिकों के लिए यह टेक्नोलॉजी फायदेमंद हो सकती है। युद्ध में घायल सैनिकों के क्षतिग्रस्त अंगों को बदलना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है।यदि जख्मी सैनिक की डिजिटल प्रति पहले से कंप्यूटर में उपलब्ध है तो युद्ध के मोर्चे पर ही उसके वास्तविक अंग के सांचे को प्रिंट कर उसकी उचित शल्य चिकित्सा की जा सकती है।

स्कैनिंग टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे उन्नत होती जा रही है। अस्पतालों में प्रयुक्त होने वाले एक्स रे,एमआरआई और सीटी जैसे स्कैनरों से मिलने वाली डिजिटल तस्वीरों और डेटा को आपस में मिलाना संभव हो गया है। मरीज के हर तरह के स्कैन को मिला कर शरीर की संपूर्ण 3डी तस्वीर निर्मित की जा सकती है और उसे एक बड़ी स्क्रीन पर प्रदर्शित किया जा सकता है। एक टैब्लेट की तरह इस तस्वीर को छोटा- बड़ा किया जा सकता है। इस तरह हम टेबल पर किसी व्यक्ति को संपूर्ण आकार में देख सकते हैं। डॉ.मा ने बताया कि हम फिलहाल दो आयामी डेटा को त्रिआयामी प्रकाश संवेदी डिस्प्ले में प्रोसेस कर रहे हैं। इससे स्पर्श मात्र से व्यक्ति के शरीर की हर बारीकी को समझा जा सकता है। तस्वीर को छोटा-बड़ा करके और विभिन्न परतों को हटा कर शरीर की एनाटॉमी का अध्ययन किया जा सकता हैं। हम रक्त धमनियों, स्नायु ऊतकों और अस्थियों को किसी भी कोण से देख सकते हैं। कंप्यूटरी स्केलपल से ऊतकों की प्रत्येक परत को हटाया जा सकता है। इस खूबी की वजह से मेडिकल छात्र वास्तविक डोनर मृत शरीर को क्षतिग्रस्त किए बगैर डिजिटल शरीर पर कई बार वर्चुअल ऑपरेशन कर सकते हैं। त्रिआयामी तस्वीर प्रदर्शित करने वाली एक मशीन इस समय ब्रिटेन के अस्पतालों में प्रयुक्त की जा रही है। एक अमेरिकी फर्म द्वारा निर्मित इस मशीन की कीमत 45000 पौंड है। इस टेक्नोलॉजी के कई उपयोग हो सकते हैं। अस्पताल में कराए गए मरीज के सारे स्कैन एक डिजिटल शरीर के रूप में साइबरस्पेस में संग्रहित किए जा सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर या सर्जन इनका उपयोग कर सकते हैं।

त्रिआयामी डेटा उपलब्ध हो जाने पर इस टेक्नोलॉजी के उपयोग असीमित हो जाएंगे। इस टेक्नोलॉजी का एक बड़ा फायदा मेडिकल शिक्षा में होगा। छात्रों को शल्य चिकित्सा के प्रशिक्षण के लिए डोनर मृत शरीर की जरुरत नहीं पड़ेगी। दुनिया भर के मेडिकल कॉलेजों में अभ्यास और प्रशिक्षण के लिए डोनर मृत शरीर बहुत मुश्किल से उपलब्ध हो पाते हैं। विभिन्न देशों में कड़े नियमों और कानूनों के कारण उपलब्ध मृत शरीरों की संख्या की भी घटती जा रही है। अनेक कॉलेजों में प्रायोगिक शल्य चिकित्सा के लिए उपयुक्त प्रयोगशालाएं भी नहीं हैं। इस टेक्नोलॉजी से मृत शरीरों की कमी दूर की जा सकती है। इसके अलावा त्रिआयामी डेटा का उपयोग अस्पतालों में प्रभावी और त्रुटिरहित शल्य चिकित्सा के लिए भी किया जा सकता है।

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