आईएमए को नहीं भायी प्रस्तावित हेल्थ पॉलिसी

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IMA against proposed national health policy
पिछली राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना (National Health Policy) आने के 13 साल बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब एक नई पॉलिसी का मसौदा तैयार किया है, जिसे चर्चा के लिए जनता के समक्ष रखा गया है।

आईएमए के विचार से इस पॉलिसी को तैयार करने से पहले पर्याप्त होमवर्क नहीं किया गया है, इसे देखकर ऐसा लगता है कि इसमें स्पष्टता का अभाव है। इससे भी जरूरी बात यह है कि इसमें उद्देश्यों और लक्ष्यों को ही स्पष्ट नहीं किया गया; जैसा कि पहले वाली पॉलिसी में किया गया था।
इंडियन मेडिकल असोसिएशन यानी आईएमए का यह मानना है कि योजना में सबसे ज्यादा फोकस प्रिवेंटिव केयर और रीहैबिलिटेशन पर होना चाहिए, क्योंकि देश में नॉन-कम्यूनिकेबल बीमारियों (Non-communicable diseases) का असर तेजी से बढ़ रहा है।

पॉलिसी के संबंध में अपने विचार रखते हुए आईएमए के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. ए. मार्तण्ड पिल्लै और महासचिव पद्मश्री डॉ के. के. अग्रवाल ने कहा कि, जीडीपी में स्वास्थ्य के लिए बजट बढ़ाने को लेकर यह पॉलिसी विमुख और अनिश्चित लग रही है-इसमें सिर्फ 2.5 फीसदी की बढ़़ोत्तरी का प्रस्ताव है-जबकि पॉलिसी में खुद इस बात का जिक्र है कि अगर सरकार जीडीपी का 4-5 फीसदी हिस्सा खर्च करने लग जाए तो ही स्वास्थ्य क्षेत्र के परिदृश्य में बदलाव देखने को मिलेगा।

कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर यह पॉलिसी खामोश है, जैसे कि परिवार नियोजन कार्यक्रम अथवा मेडिकल शिक्षा में सुधार कैसे हो, स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा आदि। कुल मिलाकर कहा जाए तो यह पॉलिसी कुछ वक्तव्यों के अलावा बाकी सभी उद्देश्यों को लेकर अपूर्ण है।

सरकारी योजना में कॉरपोरेट सेक्टर को अधिक महत्व दिया गया है। इसमें यह बात भुला दी गई है कि आज भी देश के स्वास्थ्य देखभाल के एक बड़े हिस्से की जिम्मेदारी छोटे संस्थानों पर है, और सही मायने में ये छोटे संस्थान ही राष्टृ के सबसे जरूरतमंद तबके की पहुंच में आते हैं।

इस योजना की कुछ बातें जमीनी स्थिति के ज्ञान का अभाव भी दर्शाती हैं, खासतौर से छोटे और मध्यम आकार वाले अस्पतालों की भूमिका को लेकर जो देश की गरीब जनता को और पिछड़े इलाकों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सरकार की योजना ऐसी होनी चाहिए जो इन अपने दम पर चल रहे संस्थानों को फलने-फूलने का अवसर दे, ताकि लोगों के लिए इनके खर्च और उपलब्धता पर कोई असर न पड़े।

सरकार को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कॉरपोरेट कल्चर को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे इलाज का खर्च और उपलब्धता प्रभावित होगी, क्योंकि अधिकतर कॉरपोरेट अस्पताल शहरों में हैं।इस पॉलिसी के हिसाब से आने वाले समय में भी गरीब लोग झोलाछाप के सहारे ही रह जाएंगे।

ऐसी जगह पर जहां स्वास्थ्य देखभाल की 70 फीसदी जिम्मेदारी निजी क्षेत्र पर है वहां प्राइवेट क्षेत्र को दरकिनार कर देना ठीक नहीं है। अस्पतालों पर इनकम टैक्स, लग्जरी टैक्स और दवाओं पर वैट लगाना स्वास्थ्य को मूलभूत अधिकार बनाने की सोच के खिलाफ है।

सरकारी योजना ऐसी होनी चाहिए जो निजी स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र को बढ़ावा दे, इसके लिए अस्पतालों को इनकम टैक्स आदि में छूट दी जानी चाहिए। इसके बदले सरकार इन संस्थानों से 15 फीसदी मरीजों को निशुल्क इलाज देने के लिए कह सकती है, जिससे गरीबों को लाभ हो।

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