एडवांस तकनीक से सच हुआ पैरेंटहुड का सपना

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डिजीटल माइक्रोस्कोप-इंक्यूबेटरDigital microscope incubator (एंब्रायोस्कोप) तकनीक ने आईवीएफ (in vitro fertilization) की सफलता की संभावना बढ़ा दी है। इससे सबसे हेल्दी स्पर्म को पहचानकर उसे गर्भ में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इससे न सिर्फ आईवीएफ प्रक्रिया के सफल होने की उम्मीद बढ़ती है बल्कि जुड़वां या एक साथ तीन बच्चे होने की संभावना भी नहीं रहती, जो की आईवीएफ प्रक्रिया  की एक आम समस्या है।

सामान्य तौर पर इन विट्रो फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया (in vitro fertilisation procedure)में महिला के अंडे को शरीर के बाहर एक एक परखनाली मे स्पर्म के साथ रखा जाता है और अंडे के फर्टिलाइजेशन के बाद इसे महिला की कोख में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

फोर्टिस ला फेम और लीलावती हॉस्पिटल मुंबई के स्त्री रोग एवं इंफर्टीलिटी एक्सपर्ट डॉ. ऋषिकेश पाई बताते हैं कि,आधुनिक एंब्रायोस्कोप इंक्यूबेटर तकनीक मे एक माइक्रोस्कोपकैमरे और कंप्यूटर का इस्तेमाल किया जाता है,जिससे डॉक्टर को इस बात की निगरानी करने में मदद मिलती है कि कैसे भ्रूण का विकास हो रहा है। इससे भ्रूण के विकास को परखने के लिये उसे इंक्यूबेटर से बाहर निकालने की जरूरत नहीं पड़ती है,और इसकी सफलता की संभावना बढ़ जाती है।

 स्त्री रोग एवं इंफर्टीलिटी एक्सपर्ट डॉ. नंदिता पालशेत्कर बताती हैं कि भ्रूण को आमतौर परर कल्चर के दो से पाँच दिनों बाद महिला के गर्भ मे प्रत्यारोपित किया जाता है। क्योंकि आईवीएफ प्रक्रिया काफी महंगी होती और मरीज या डॉक्टर इसके फेल होने का कोई रिस्क नहीं लेना चाहते,ऐसे मे एक बार मे दो या तीन फीटस प्रत्यारोपित करते हैं। ताकि किसी एक की भी क्वालिटी अच्छी होने पर प्रक्रिया सफल हो जाए। हालांकि प्रक्रिया के फेल होने के चांसेज इसके बाद भी रहते हैं,औ अगर सारे फीटस अच्छे निकले तो मल्टिपल प्रेग्नेंसी हो जाती है। नई तकनीक के इस्तेमाल से इन सारी समस्याओं से निजात मिल सकती है।

डॉ. ऋषिकेश पाई बताते हैं कि मौजूदा समय मे आईवीएफ का सक्सेस रेट 30 से 40% है,वह भी 35 साल से कम आयु की महिलाओं में। नई तकनीक से हम बेस्ट फीटस को प्रत्यारोपित करते हैं,इससे सक्सेस रेट बढ़ता है और मल्टीपल प्रेग्नेंसी का खतरा कम होता है।

 एंब्रायोस्कोप मे क्या है खास

-टाइम-लैप्स को कवर करने वाला माइक्रोस्कोप इंक्यूबेटर।

-फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया को बिना डिस्टर्ब किए करता है काम

-क्वालिटी फीटस को पहचानने मे करता है मदद

-गैस इंक्यूबेटर मे कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन की मात्रा के सटीक नियंत्रण मे मददगार

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