होम्योपैथी से मैनेज करें डायबीटीज़

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होमियोपैथी बताती है कि किसी व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व के अनुसार बीमारी होती है, जिसका मतलब उसे होने वाला रोग आनुवांशिक एवं वातावरण जनित यानी मनोजैववैज्ञानिक एवं मनोसामाजिक है। होमियोपैथी डाॅक्टर को यह समझना होता है कि बीमारी ने किस रूप में हमला किया है। यही कारण है कि एक उपचार के लिए कुछ दवाइयां अतिसंवेदनशील होती हैं और कुछ दूसरी बीमारियों के लिए।

बात करूं अपने अनुभव की, तो जहां तक मैंने समझा है मेलिटस टाइप 2, डीएम 2 जैसे मुधमेह रोग का मुख्य आधार व्यक्तित्व होता है। डीएम 2 का हमला शरीर पर होता है, जिसके मनोजैववैज्ञानिक एवं मनोसामाजिक आयाम हैं। पीएनआई यानी साइको-न्यूरो-इम्यूनोलाॅजी के हाल के विचार में यह साबित हुआ है कि कैसे यह सब मानव शरीर में संपन्न होता है। जैविक इतिहास के कारण मनोचिकित्सक और एंडोक्रीनोलाॅजिकल बीमारियां के बीच का रिश्ता महत्वपूर्ण है। शरीर में रक्त में ग्लूकोज़ स्तर और इसमें नियमितता लगातार मस्तिष्क और मानसिक क्रियाओं पर प्रभाव डालते हैं और रक्त में ग्लूकोज़ की प्रतिकूलता से मानसिक एवं भावनात्मक बदलाव होते हैं। कई शोधों में स्पष्ट हुआ है कि व्यक्तित्व और शर्करा में नियमितता के बीच खास रिश्ता होता है।

ये लक्षण और किरदार खास हैं
– क्रोध, चिंता, डिप्रेशन, थकावट और वजन में वृद्धि। टीबी यानी ट्यूबरक्यूलोसिस थकावट का अहम कारण है, यह एक संवैधानिक लक्षण है, जो परिवार के अगले वंश तक जाता है। जबकि – आधुनिक चिकित्सा शास्त्र मानता है कि टीबी इंफेक्शन से होने वाली एक बीमारी मात्र है।

उपचार के दृष्टिकोण से इस बीमारी को दो विभिन्न स्तरों में बांटा गया है:

मधुमेह से पहले: कई बार इस चरण में किसी तरह के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं, पर हाल ही में नीचे लिखे लक्षणों की पहचान की गई है।

– त्वचा में गहरे दाग होना, गर्दन के चारों ओर, उंगलियों में, कुहनी, कांख, घुटनों के पीछे और अन्य वैसे अंगों में जहां जोड़ होता है। इस परिस्थिति को एकैथोसिस निग्रीकैंस कहा जाता है।

– प्यास में वृद्धि।

– बार-बार पेशाब लगना।

– मोटापा।

– दृष्टि में धुंधलापन।

उपरोक्त सभी लक्षण युवा या बच्चों में दिखाई पड़ते हैं, जो इस बीमारी के लिए सतर्क होने की चेतावनी देते हैं। होमियोपैथी इस चरण पर जीवन पद्धति में सुधार करते हुए इस बीमारी का पूरी योग्यता से उपचार कर सकता है।

मधुमेह: रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा 180 से नीचे होने के स्तर को मधुमेह माना जाता है, हालांकि अभी तक इसके लिए किसी तरह की दवा की आवश्यकता नहीं बताई गई है, पर यहां होमियोपैथी में इसे लेकर उम्मीद दिखाई देती है और इसके उपचार में सफलता भी मिलती है। लेकिन अगर एक बार रक्त में शर्करा की मात्रा 180 से उपर हो गई या 300 से नीचे, तो काफी सख्त नियमों के साथ होमियोपैथी उपचार की आवश्यकता होती है। अगर शर्करा की मात्रा इस स्तर से उपर हो जाए, तो यह खतरनाक स्थिति है और इसे लिए एलोपैथी और सही चिकित्सा की ज्यादा आवश्यकता होती है।

परेशानियां: इस चरण में डीएम असंख्य परेशानियां दिखाता है। इस चरण में संयुक्त उपचार विधि उपयोगी और जरूरी मानी जाती है।

शोध एवं आंकड़ें:

– भारत में करीब चार करोड़ लोग मधुमेह रोग से पीडि़त हैं। देश के शहरी इलाकों में सीपीआर यानी क्रूड प्रीवेलेंस रेट 9 प्रतिशत माना गया है। जबकि ग्रामीण इलाकों में यह कुल जनसंख्या का 3 प्रतिशत माना गया है।

– भारत की जनसंख्या 1000 मिलियन से अधिक हो गई है। इससे समस्या के बारे में जानकारी देने में मदद मिलती है।

– असल में भारत में दुनिया भर के मुकाबले सबसे ज्यादा मधुमेह रोगी हैं। भारत में आईजीटी यानी इम्पेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस एक बड़ी व उभरती हुई समस्या है।

– आईजीटी की उपस्थिति के बारे में कहा जाता है कि यह शहरी इलाकों में 8.7 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 7.9 प्रतिशत है।

– भारत में मधुमेह का प्रसार पश्चिमी दुनिया से हुआ माना जाता है। टाइप 7 मधुमेह ज्यादा दुर्लभ है और केवल एक तिहाई ही टाइ्रप 2 मधुमेह से पीडि़त हैं, जिसका कारण मोटापा एवं ज्यादा वजन है।

– मधुमेह के बारे में कहा जाता है कि भारतीयों को काफी जल्दी अपना शिकार बना लेता है, यानी गंभीर मधुमेह की परेशानियां काफी तेजी से बढ़ती जा रही हैं।

Written by
Dr. Pankaj Aggarwal
MD, Homeopathy

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