ओसीडी को खुद दे सकते हैं मात

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OCD

अन्य बीमारियों की तरह मानसिक बीमारियाँ भी एक सच है। ओसीडी भी इनमे से एक है, लेकिन जागरूकता की कमी के चलते ज़्यादातर लोग इसका इलाज करना तो दूर इसे बीमारी मानने को भी तैयार नहीं होते और समझाने वाले को गलत साबित करने मे लग जाते हैं। ऐसे मे देखते-देखते समस्या इस कदर गंभीर हो जाती है कि मरीज खुद पर से नियंत्रण खो देता है, जबकि, शुरुआत मे ही अलर्ट होकर मरीज खुद भी इस बीमारी को मात दे सकता है। हमने इस बारे मे बात की फोर्टिस हॉस्पिटल के सीनियर सायकायट्रिस्ट डॉ. समीर परिख से:

फिक्र करने वाली बीमारी है ओसीडी
यह एक चिंता करने वाली बीमारी है, जिसमें पीड़ित किसी बात की जरूरत से ज्यादा चिंता करने लगता है। एक ही जैसे अनचाहे ख्याल उसे बार-बार आते हैं और एक ही काम को बार-बार दोहराना चाहता है। ऐसे लोगों को सनक वाले ख्याल आते हैं और अपने बिहेवियर पर कोई कंट्रोल नहीं होता। ऐसे मरीज न खुद को रोक पाते हैं, न ही बेफिक्र रह पाते हैं। जैसे कोर्इ सूर्इ पुराने रेकॉर्ड पर अटक जाती है, वैसे ही ओसीडी मे दिमाग किसी एक ख्याल या काम पर अटक जाता है। मसलनए यह कन्फर्म करने के लिए कि गैस बंद है या नहीं, आप 20 बार स्टोव की नॉब चेक करते हैं। तब तक हाथ धोते रहते हैं जब तक कि वह छिल न जाए या आप तब तक गाड़ी भगाते रहते हैं, जब तक कि आपको यह संतुष्टि न हो जाए कि जिस शख्स ने पीछे से हॉर्न दिया था, वह पीछा तो नहीं कर रहा।

अपनी मदद खुद करें
-ओसीडी के ख्यालों को नजरअंदाज करने के लिए अपना ध्यान कहीं और लगाएं। मसलन एक्सरसाइज, जॉगिंग, वॉकिंग, स्टडी, म्यूजिक सुनना, इंटरनेट सर्फिंग, विडियो गेम खेलना, किसी को फोन करना आदि। इसका मकसद है खुद को कम.से.कम 15 मिनट तक किसी ऐसे काम में बिजी रखनाए जिससे आपको खुशी मिलती हो। ऐसा करने से आप कंपल्सिव बिहेवियर करने से खुद को रोक सकते हैं। यह देखा गया है कि आप जितनी ज्यादा देर तक खुद को ऐसा करने से रोक पाते हैं, उतनी जल्दी आपकी आदतों में बदलाव आता है।

-जब भी ऑब्सेसिव ख्याल आएं और कंप्लसिव बिहेवियर का मन कहे, आप इसे डायरी में नोट कर लें। ऐसा करने से आपको यह पता लगेगा कि आप इन बेकार की बातों में अपना कितना समय गंवा रहे हैं। एक ही बात बार-बार लिखने से आपकी नजरों में उसकी अहमियत कम होने लगेगी। चूंकि कोर्इ भी बात लिखना उस बारे में सोचने से ज्यादा मुश्किल काम है। ऐसे में थककर आप उसके बारे में सोचने से ही बचेंगे और धीरे-धीरे ये ख्याल आपके दिमाग में आने कम हो जाएंगे।

-ओसीडी की चिंता का समय तय करें। इसके लिए 10 मिनट का समय और जगह तय करें और अपने सारे ऑब्सेसिव ख्यालों को उस पीरियड के लिए टालें। उदाहरण के तौर पर शाम 8 बजे से 8:10 मिनट तक के समय को वरी पीरियड तय करें और इसके लिए लिविंग रूम की जगह तय करें। इस पीरियड में शांति से बैठें और सिर्फ अपने नेगेटिव विचारों पर ध्यान लगाएं। इन्हें ठीक करने की चिंता बिल्कुल न करें। वरी पीरियड के आखिर में कुछ गहरी सांस लें। ऑब्सेसिव ख्यालों को अपने मन से निकल जाने दें और अपने सामान्य कामों में लग जाएं। ऐसा करके आप दिन के बाकी समय और रात को नींद के दौरान अपने आप को नेगेटिव विचारों से बचा सकते हैं।

-अपने ओसीडी ऑब्सेशन का टेप बनाएं। इसे टेप रिकॉर्डरए लैपटॉप या स्मार्ट फोन में टेप करें। आपके दिमाग में आने वाले ऑब्सेसिव ख्यालोंए लाइनों या कहानियों की गिनती करें। इस टेप को रोजाना 45 मिनट के लिए सुनें। बार.बार एक ही तरह के ऑब्सेशन के बारे में सुनकर आपको यह बात समझ आ जाएगी कि इसकी वजह ओसीडी है और कुछ ही दिनों में आपको ये बातें परेशान करना बंद कर देंगी।

-अपना ध्यान रखें। एक स्वस्थ और संतुलित लाइफस्टाइल आपको ओसीडी बिहेवियर, डर और चिंताओं से दूर रखने में सहायक साबित होगी। इसके लिए रिलैक्सेशन तकनीक सीखें। ध्यान, योग और डीप ब्रीदिंग तकनीक अपनाएं। ऐसा दिन में कम.से.कम 30 मिनट के लिए करें।

– बेहतर खान.पान की आदत डालें। खाने में साबुत अनाज, फल, सब्जियां आदि शामिल करें। इससे न सिर्फ आपका ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहेगा, बल्कि आपके शरीर में सेरोटोनिन बढ़ेगा, जो एक न्यूरोट्रांसमीटर है और दिमाग को शांत करता है।

-रेग्युलर एक्सरसाइज करें। एरोबिक एक्सरसाइज से तनाव कम होता है और शारीरिक व मानसिक एनर्जी बढ़ती है। एंडॉर्फिन आपके दिमाग को खुशी का अहसास कराता है। रोजाना 30 मिनट एक्सरसाइज करें।

-अल्कोहल और निकोटिन से दूर रहें और भरपूर नींद लें।

– फैमिली और दोस्तों के कॉन्टैक्ट में रहें।

-कोइ ओसीडी सपोर्ट ग्रुप जॉइन करें।

ओसीडी को समझना है जरूरी
ऑब्सेशन बिना आपकी चाहत के होता है। इसमें कंट्रोल से बाहर वाले विचार, तस्वीरें और उत्तेजना बार-बार दिमाग में आती रहती है। आप चाहते हैं कि ये ख्याल आपके दिमाग में न आएं मगर आप इन्हें रोक नहीं पाते। दिक्कत यह है कि ये ख्याल अक्सर निराशाजनक और ध्यान भंग करने वाले होते हैं।
कंपल्शन ऐसा बिहेवियर है, जिसे आप बार-बार दोहराने की जरूरत महसूस करते हैं। आमतौर पर कंपल्शन ऑब्सेशन से छुटकारा पाने की कोशिश के तहत किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, अगर आप गंदगी से डरते हैं तो शायद आप बार-बार सफार्इ करने के आदी हो जाएंगे। यानी इससे आपको कोर्इ फायदा महसूस नहीं होता। उलटे ऑब्सेसिव सोच और मजबूती से वापस आती है। ऐसे में कंपल्शन वाला बिहेवियर बेचैनी में बदल जाता है क्योंकि आप ऐसा बार-बार करने लगते हैं और इस पर ज्यादा से ज्यादा वक्त लगाने लगते हैं।

ओसीडी के कॉमन टाइप
ओसीडी के ज्यादातर मरीज इनमें से किसी कैटिगरी में आते हैं
– बार-बार सफार्इ करने वाले गंदगी से डरते हैं। उन्हें आमतौर पर सफार्इ और बार-बार हाथ धोने का कंपल्शन होता है।
– कुछ लोग बार-बार चीजों की जांच करते हैं; अवन बंद किया या नहीं, दरवाजा बंद किया या नहीं आदि, उनके मन में इनके खतरे का डर होता है।
– शंकालु और पाप से डरने वाले लोग यह सोचते हैं कि अगर सब कुछ ठीक ढंग से नहीं हुआ तो कुछ बुरा हो जाएगा या वे सजा के भागी बन जाएंगे।
– गिनती करने वाले और चीजों को व्यवस्थित करने वाले क्रम और समानता से ऑब्सेस्ड होते हैं। उनमें से कुछ निश्चित संख्याओं, रंगों और अरेंजमेंट को लेकर अंधविश्वास हो सकता है।
– चीजों को संभालकर रखने वाले इस बात से डरे होते हैं कि अगर उन्होंने कुछ बाहर फेंका तो कुछ बुरा होगा। अपने इसी डर की वजह से वे गैरजरूरी चीजों को भी संभालकर रखते हैं।
लेकिन सिर्फ ऑब्सेसिव विचार और कंपल्शन की आदत होने का यह मतलब नहीं कि आपको ओसीडी है। ओसीडी में ये विचार और बिहेवियर गंभीर तनाव की वजह बन जाते हैं। व्यक्ति इसमें अपना ज्यादा.से.ज्यादा समय लगाने लगता है और ये काम उसके रुटीन और पारिवारिक संबंधों पर भी असर डालने लगते हैं।

ऐसे करें पहचान
इस समस्या से पीड़ित ज्यादातर लोगों में ऑब्सेशन और कंपल्शन दोनों देखा जाता है, लेकिन कुछ लोगों में सिर्फ एक ही समस्या भी हो सकती है।

लक्षण और पहचान
ऑब्सेसिव ख्याल
– कीटाणुओं, गंदगी आदि के संपर्क में आने या दूसरों को दूषित कर देने का डर।
– किसी और को नुकसान पहुंचने का डर।
– सेक्स संबंधी बुरे और हिंसक ख्याल या इमेज दिखना।
– धर्म या नैतिक विचारों पर पागलपन की हद तक ध्यान देना।
– क्रम और समानता को लेकर यह सोचना कि सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए।
– किसी चीज या व्यक्ति को लकी या अनलकी मानने का अंधविश्वास।

कंपल्सिव बिहेवियर
– चीजों को बेवजह बार-बार जांचना, जैसे कि ताले, उपकरण और स्विच आदि।
– गिनना, टेप करना, कुछ खास शब्दों को बार-बार दोहराना या बेचैनी दूर करने के लिए कोई और पर फालतू काम करना।
– साफ-सफार्इ में ज्यादा से ज्यादा समय लगाना।
– बेवजह ही चीजों को क्रम से लगाना या अरेंज करना।
– जरूरत से ज्यादा प्रार्थना करना या ऐसे संस्कारों में बिजी रहना जिनसे धर्म से डर की भावना झलकती हो।
– बेकार चीजें इकट्ठा करना जैसे कि पुराने न्यूजपेपर या खाने के खाली डिब्बे आदि।

होर्डिंग व दूसरे डिसॉर्डर; ओसीडी से अलग कैसे?
चीजें बचाकर रखने की सनक, ऐसी चीजों को जमा करना या संभालकर रखनाए जो मामूली जरूरत की हों या बेकार हों। ओसीडी के मरीजों में देखा जाने वाला यह एक आम लक्षण है। खासकर उस स्टेज मेंए जिसमें बीमारी गंभीर न हुई हो। होर्डिंग लक्षणों वाले मरीजों में दूसरी बीमारियां होने की आशंका भी काफी ज्यादा होती है जैसे कि डिप्रेशन, एक खास तरह का फोबिया पीटीएसडी, अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिव डिसॉर्डर, एडीएचएडी या बेवजह की खरीदारी का डिसॉर्डर।

सोर्स: जर्नल ऑफ सायकाट्रिक रिसर्च

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