किडनी डोनेट कर ‘सावित्री’ बन गई प्रिया

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new hope for life

विश्व अंगदान दिवस (13 अगस्त) पर खास

29 साल के बालशंकर आज एक बैंक मे काम करते हैं। घर मे ग्रैंड पैरेंट्स, पैरेंट्स, पत्नी और एक 9 महीने का प्यारा सा बच्चा है, जिसे उन्होने हाल ही मे गोद लिया है। बालशंकर अपने इस खुशहाल परिवार के लिए किसी स्टार से कम नहीं हैं। लेकिन बालशंकर की ज़िंदगी हमेशा से ऐसी नहीं थी। मैंगलोर के रहने वाले बालशंकर कुट्टी चार साल पहले का वो दिन याद करके सिहर उठते हैं, जब वह यहाँ के एक सरकारी अस्पताल के बेड पर लेटे-लेटे खिड़की से डूबते सूरज को निहारते रहते थे और अपने जीवन की तुलना उस ढलती सांझ से करते थे। फिर नर्सिंग की एक स्टूडेंट प्रिया उनकी ज़िंदगी मे नयी सुबह की तरह आईं और बालशंकर के जीवन की ‘सावित्री’ बन गईं।

बालशंकर बताते हैं कि 4 साल पहले वह तमिलनाडू मे अपने पैतृक गाँव मे थे। रात के समय तेज बुखार और शरीर मे सूजन होने पर परिवार वाले घबरा गए और एक केमिस्ट की दुकान से लाकर कोई दवा खिला दी। कुछ घंटे बाद बुखार उतार गया और सूजन भी कम हो गई। बात आई-गई हो गई। मगर 3-4 दिन बाद तबीयत काफी बिगड़ने लगी। फिर मैंगलोर लौटकर डॉक्टर को दिखाया तो पता लगा कि यूरिन इन्फेक्शन हुआ था। गलत दवा खाने से शरीर मे इन्फ़्लेमेशन हो गया और किडनी फंक्शन डिस्टर्ब हो गया है। और टेस्ट हुए तो पता लगा कि दोनों किडनियाँ डैमेज हो गई हैं और जल्द ही मुझे डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। यह सब सुनकर जैसे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। पूरा परिवार सदमे मे था।

इलाज शुरू हुआ। हर हफ्ते डायलिसिस के लिए जाना पड़ता था। इलाज का खर्च था कि सुरसा के मुंह कि तरह बढ़ता ही जा रहा था। मैं अब काम करने मे असमर्थ था और परिवार की जमा पूंजी तकरीबन खत्म हो गई। डॉक्टर ने किडनी ट्रांसप्लांट करने की सलाह दी तो पिताजी ने गाँव की जमीन बेच दी, माँ ने अपने गहने बेच डाले। सब मिलाकर ट्रांसप्लांट पर आने वाले खर्चों का इंतज़ाम तो कर लिया गया, मगर किस्मत का खेल देखिये! माता-पिता दोनों ही मेरे लिए सूटेबल डोनर नहीं थे। मैं उनकी इकलौती औलाद हूँ, और किडनी डोनेट करने के लिए कजिंस के आगे आने का तो सवाल ही नहीं उठता था। धीरे-धीरे हम सबने मेरे सामान्य होने की उम्मीद खो दी।
उस दौरान मेरे दिमाग मे तरह-तरह की बातें आती थीं। घरवालों की परेशानी देखकर लगता था कि यह बोझ जैसी जिंदगी जितनी जल्दी खत्म हो जाए उतना अच्छा है, मगर अगले ही पल यह ख्याल मुझे अंदर तक झकझोर देता था कि मैं नहीं रहा तो शायद परिवार वालों के जीने का मकसद भी खत्म हो जाएगा। एक दिन डायलिसिस के लिए अस्पताल गया हुआ था। जो एक्सपर्ट मेरी डायलिसिस करते थे उनके साथ उस दिन एक लड़की भी थी। वह पूरे टाइम मेरे साथ बैठी रही। बातचीत से पता चला कि नर्सिंग की स्टूडेंट हैं और यहाँ इंटर्नशिप के लिए आई हैं।

हम दोनों ने एक-दूसरे के लिए एक अजीब सा जुड़ाव महसूस किया। हमने मोबाइल नंबर एक्सचेंज किया और उसके बाद वह हर रोज सुबह शाम फोन कर मेरा हाल-चाल पूछती थी। 4 महीने बाद एक दिन वह मेरे घर आई और मुझे अपनी एक किडनी डोनेट करने कि मंशा जाहिर की। मेरा पूरा परिवार उसकी बात सुनकर हैरान था। हम सबने उसे समझाया कि तुम्हारी ज़िंदगी बहुत कीमती है। तुम्हारे घरवाले भी इसके लिए कभी राजी नहीं होंगे। उसने कहा, मुझे भगवान ने एक और जिंदगी बचाने का मौका दिया है। अगर मेरे सामने तुम्हारी जिंदगी चली गई तो मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकूँगी। उसकी जिद के आगे हम सबको झुकना पड़ा और बैंगलौर के एक हॉस्पिटल मे हमने सारे टेस्ट कराए। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि बिना किसी रिश्ते के ही उसके सारे सैंपल मुझसे मैच हो गए। डॉक्टर ने कहा, वह मेरे लिए परफेक्ट डोनर है। लेकिन किडनी डोनेट करने के लिए कानूनी तौर पर कुछ बाध्यताएँ हैं। उससे मेरा न तो ब्लड रिलेशन है और न ही कोई अन्य रिश्ता। ऐसे मे दिक्कत हो सकती है।

4 दिन बाद उसका फोन आया और बोली चलो शादी कर लेते हैं। मैं अवाक रह गया। कुछ जवाब भी नहीं दे सका। उसी दिन शाम को उसके पैरेंट्स मेरे घर आए मेरे परिवार पर उनकी बेटी को बरगलाने का आरोप लगाया। बोलने लगे, अपने बीमार बेटे को मेरी बेटी के गले बांधने की कोशिश भी मत करना। उसके 3 दिन बाद प्रिया का फोन आया कि चलो मंदिर मे शादी करते हैं और कोर्ट मे शादी रजिस्टर कराएंगे। इसके बाद तो मुझे तुम्हारी जान बचाने से कोई नहीं रोकेगा!

लाख समझाने के बाद भी प्रिया नहीं मानी। फिर सब कुछ वैसे ही हुआ जैसा वह चाहती थी। एक महीने बाद कोर्ट मे हमारी शादी रजिस्टर हो गई और उसके अगले महीने मेरा किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। प्रिया मेरी जिंदगी मे एक मसीहा बनकर आई और देखते-देखते ढलती साँझ जैसी धूमिल ज़िंदगी उगते सूरज की तरह चमकने लगी। आज मैं जो कुछ भी हूँ वह प्रिया की वजह से। या यूं कहें कि, हम दोनों ही एक-दूसरे की जिंदगी हैं, क्योंकि मेरे भीतर भी उसकी धड़कने पलती हैं।

(गोपनीयता का ध्यान रखते हुए इस लेख मे नाम बदले गए हैं, प्रिया और बालशंकर दोनों काल्पनिक नाम हैं)

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