जानें पेन किलर की लिमिट

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Painkillers could be harmful
तकरीबन हर बीमारी में यह बनती है सहारा, लेकिन लिमिट से बाहर होते ही बन जाती है जानलेवा

पेन किलर एक ऐसी दवा है जिससे आए दिन हर किसी का पाला पड़ता है। काम के बोझ या किसी तनाव के चलते सिरदर्द, बदन दर्द हो अथवा किसी बीमारी के चलते परेशानी, हर सूरत में जिस एक चीज की याद आती है वह है पेन किलर। अगर सही तरीके से उचित मात्रा में इसका इस्तेमाल किया जाए तो वरदान है, लेकिन थोड़ी सी भी लापरवाही होने पर यह जानलेवा भी बन सकती है।

दो तरह से काम करता है पेनकिलर
सनराइज ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स की एम. डी. डॉ. निकिता त्रेहन कहती हैं, पेन किलर दो तरह से काम करती है, या तो ब्रेन की ओर जाने वाले दर्द के सिग्नल को बंद कर देती है अथवा ब्रेन में सिग्नल के इंटरप्रिटेशन सिस्टम में छेड़छाड़ कर देती है, बिना एनेस्थीसिया प्रोड्यूस किए या कॉंशिअसनेस को खत्म किए। दरअसल पेन किलर में दो तरह के एनाल्जिस होते हैं एक नॉन नारकोटिक्स जैसे एसिटेमिनोफेन और दूसरा नारकोटिक्स जैसे ऑपियड्स मोर्फिन।

इसके केमिकल पहुंचा सकते हैं नुकसान
गंगाराम हॉस्पिटल के सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. रजनीश जैन कहते हैं कि पेन किलर बनाने में मॉर्फिन नारकोटिक्स, नॉन स्टेरॉइडल एंटी इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स और एसेटैमिनोफेन नॉन नारकोटिक्स केमिकल का इस्तेमाल होता है। सबसे जरूरी बात है, बिना डॉक्टर की सलाह के पेन किलर जहां तक हो सके अवॉइड करें और कभी भी ओवर डोज न करें, जब डॉक्टर ने बंद करने के लिए कहा हो तब बंद कर दें। इसे खाली पेट बिल्कुल न लें। नॉन नारकोटिक्स पेन किलर ऐसे लेने से किडनी, लिवर और पेट के लिए खतरनाक हो सकती हैं। इसे कम से कम मात्रा में लेना चाहिए और तब जब बहुत ही जरूरी हो। क्योंकि इससे पेट अपसेट हो सकता है, सीने में जलन और एसिडिटी भी हो सकती है। इसलिए बार- बार लेने से बचें। कुछ पेन किलर अस्थमा को भी बढ़ा सकती हैं। लिवर या किडनी की समस्या वाले मरीजों में डोज बदलनी पड़ सकती है, क्योंकि इसकी हाई डोज जहरीली साबित हो सकती है।

बार-बार लेने से लग सकती है लत
इससे तुरंत दर्द में राहत मिलती है तो इंसान बार- बार राहत के लिए इसका इस्तेमाल करता है। इसके अलावा दवा बंद करने से फिर होने वाले दर्द को लेकर एंग्जाइटी भी हो जाती है जिससे बचने के लिए लोग बार-बार दवा लेते रहते हैं और एक लिमिट के बाद इसकी आदत हो जाती है। लंबे समय तक इस्तेमाल से शरीर में इन दवाओं के प्रति टॉलरेंस उत्पन्न हो जाती है और दिमाग व शरीर उस पर निर्भर हो जाता है। इस स्थिति को एडिक्शन यानी लत कहते हैं। नारकोटिक वाले तत्व एडिक्टिव फिजिकल डिपेंडेंसी का सबसे बड़ा कारण बनते हैं। लक्षण तब दिखते हैं जब दवा का इस्तेमाल रोक दिया जाए। हालांकि अभी तक एडिक्शन के कारण और उसके लक्षणों के बाहर आने की सही वजह का पूरी तरह से पता नहीं लग पाया है, लेकिन हालिया प्रयोगों ने कुछ जानकारी मुहैया कराई हैं। कुछ नारकोटिक्स से मूड एलिवेशन होता है और नींद भी आती है। लगातार लंबे समय तक लेने से यह अल्कोहल का काम करने लग जाती हैं।

दर्द से राहत के लिए अपनाएं दूसरे तरीके
जहां तक हो सके दर्द बर्दाश्त करने की कोशिश करें और संभव हो तो डॉक्टर की सलाह से ही पेन किलर लें। दर्द वाले हिस्से पर ठंडी या गर्म सिंकाई, पेन किलर के स्प्रे या जेल से दर्द में राहत मिल सकती है। डोज की मात्रा लिमिट से ज्यादा होने, एक साल तक रोज इस्तेमाल करने या कोई एलर्जी अथवा इसके प्रति हाइपरसेंसेटिव रिएक्शन होने पर पेनकिलर खतरनाक हो सकती है। एसिटामिनोफेन के इस्तेमाल से लिवर डैमेज होने का खतरा काफी ज्यादा होता है। पेनकिलर लेने के लिए बेस्ट लिक्विड है ताजा पानी। अगर इसे लेने से पेट दर्द हो तो तुरंत उस पेनकिलर का इस्तेमाल बंद कर दें। एक एंटासिड लें और डॉक्टर से सलाह लें। कोई भी पेनकिलर बेस्ट नहीं है, सिर्फ किसी का असर कम साइड इफेक्ट के साथ ज्यादा हो सकता है। पैरासिटामोल प्रेग्नेंसी में भी सुरक्षित होती है। बीपी, डायबीटीज और किडनी के मरीजों को बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी पेन किलर नहीं लेना चाहिए, क्योंकि कुछ पेन किलर बिल्कुल ही नहीं ली जा सकती हैं इस सिचुएशन में।

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