पॉल्ट्री से बढ़ रहा एंटीबायटिक रेजिस्टेंस!

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poultry industry

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट की स्टडी का दावा
-दिल्ली-एनसीआर से लिए गए 70 चिकन सैंपल मे से 40% पाए गए हैं पॉज़िटिव
-17% सैंपल्स मे एक से ज्यादा एंटीबायटिक मिला है, ग्रोथ बढ़ाने के लिए हो रहा इस्तेमाल
-इंसानी बीमारियों के इलाज मे इस्तेमाल होने वाली 6 आम एंटीबायटिक को लेकर की गई स्टडी
-सिप्रोफ्लोक्सेसिन जैसी एंटीबायटिक्स का पॉल्ट्री इंडस्ट्री धड़ल्ले से कर रही है इस्तेमाल
-सरकार को तय करनी होगी लिमिट, वरना बढ़ता रहेगा एंटीबायटिक्स के लिए रेजिस्टेंस

पढ़ें पूरी खबर
देश मे तेजी से बढ़ रहे एंटीबायटिक रेजिस्टेंस की एक वजह पॉल्ट्री इंडस्ट्री मे धड़ल्ले से हो रहा इसका इस्तेमाल भी है। इसका खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट (सीएसई) की एक स्टडी से हुआ है। संस्था का दावा है की दिल्ली-एनसीआर के 40% चिकन सैंपल पॉज़िटिव हैं और इनमे से 17% मे एक से ज्यादा एंटीबायटिक की अधिकता पाई गई है।
इनमे सिप्रोफ्लोक्सेसिन जैसी वे एंटीबायटिक्स शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल इंसानी बीमारियों को ठीक करने के लिए आमतौर ओर होता है। संस्था का कहना है की अगर भी इसे कंट्रोल नहीं किया गया तो आने वाले समय मे जरूरी दवाओं को लेकर लोगों के शरीर मे प्रतिरोधक क्षमता (रेजिस्टेंस) इतनी ज्यादा बढ़ जाएगी कि दवाएं काम करना बंद कर देंगी।
स्टडी रिपोर्ट जारी करते हुए सीएसई की डाइरेक्टर जनरल सुनीता नारायण ने बताया कि, अब एंटीबायटिक का इस्तेमाल इन्सानों तक और बीमारियों के इलाज तक ही सीमित नहीं रहा है। पॉल्ट्री इंडस्ट्री इसका इस्तेमाल ग्रोथ प्रमोटर की तरह कर रहा है। मुर्गियों को एंटीबायटिक खिलाया जा रहा है ताकि वे जल्दी बड़े हो जाएँ और उनका वजन बढ़ जाए। सीएसई की पोल्यूशन मॉनिटरिंग लैब मे सैंपल्स की जांच की गई है।
सीएसई के डिप्टी डायरेक्टर जनरल चन्द्र भूषण का कहना है कि, पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स को पहले से ही यह आशंका थी कि देश मे बढ़ते एंटीबायटिक रेजिस्टेंस की एक वजह पॉल्ट्री इंडस्ट्री हो सकती है। मगर सरकार के पास एंटीबायटिक के इस्तेमाल से संबन्धित कोई डाटा ही उपलब्ध नहीं है।
जांच के लिए जो सैंपल सीएसई ने उठाए थे उनमे से 36 दिल्ली के थे, 12 नोयडा, 8 गुड़गाँव, और 7-7 फरीदाबाद और गाज़ियाबाद के थे। 6 तरह के एंटीबायटिक: ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, क्लोर्टेट्रासाइक्लीन, डोक्सिसाइक्लीन, एनरोफ्लोक्सेसिन, सिप्रोफ़्लोक्सेसिन और नियोमाइसिन की जांच के लिए सैंपल के मसल्स, लीवर और किडनी से टिश्यू लिए गए थे।
तीनों तरह के टिश्यू सैंपल मे 6 मे से 5 एंटीबायटिक की मौजूदगी पाई गई। गुड़गाँव से खरीदे गए एक सैंपल मे तो 3 एंटीबायटिक का कॉकटेल पाया गया है। 2002 से 2013 के बीह सीएसई ने कई सरकारी और प्राइवेट अस्पतालो पर की गई स्टडी के रिव्यू मे पाया था कि सिप्रोफ़्लोक्सेसिन, डोक्सिसाइक्लीन और टेट्रासाइक्लिन्स के खिलाफ लोगों मे रेजिस्टेंस काफी ज्यादा डिवेलप हो चुका है। इन दवाओं का इस्तेमाल सेप्सिस, न्यूमोनिया आउट टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज मे किया जाता है। हाल ही मे संसद मे एक सवाल के जवाब मे केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी यह स्वीकार किया है कि 2011 से 2013 के बीच देश मे एमडीआर टीबी (मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस टीबी) के मामले 5 गुना बढ़ गए हैं।

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