प्रॉस्टेट कैंसर तेजी से फैला रहा है पाँव

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जीवनशैली में बदलाव और लाइफ एक्सपेक्टेंसी बढ़ने से अब भारत में भी प्रॉस्टेट कैंसर (prostate cancer) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर प्रॉस्टेट कैंसर की जांच शुरूआत में ही हो जाए तो इसका सफल इलाज संभव है। यहां तक कि 10 में से 9 मामलों में इलाज संभव है। मगर शुरूआती जांच के लिए बीमारी और इसकी स्क्रीनिंग के बारे में जागरूकता लाना बेहद जरूरी है।

क्या है प्रॉस्टेट कैंसर
प्रॉस्टेट पुरूष के रिप्रोडक्टिव ऑर्गन का एक बाहरी ग्लैंड है। प्रॉस्टेट ग्लैंड सीमेन और स्पर्म को सुरक्षित रखने वाले फ़्ल्यूइड बनाने के अलावा यूरीन को कंट्रोल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सर गंगाराम हॉस्पिटल के सीनियर यूरोलॉजिस्ट डॉ. विपिन त्यागी सिंह कहते हैं, शुरूआत में जांच का मतलब है प्रोस्टेट ग्लैंड के बाहर कैंसर के फैलने से पहले इसका पता लग जाना। क्योंकि इसके फैल जाने के बाद इलाज मुश्किल हो जाता है। बीमारी के लक्षण अक्सर एडवांस स्टेज में पहुंचने के बाद ही सामने आते हैं, तब तक सफल इलाज कर पाने का अवसर हाथ से निकल चुका होता है। यही वजह है कि डॉक्टर ऐसे लोगों को प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग की सलाह देते हैं जो लोग खतरे के दायरे में आते हैं।

उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता है खतरा
प्रॉस्टेट कैंसर होने का खतरा उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता रहता है। प्रॉस्टेट कैंसर के तकरीबन 70 पर्सेंट मामलों का पता 65 साल की उम्र के बाद चल पाता है। अन्य रिस्क फैक्टर्स में रेसेज़, एथनीसिटी और जीवनशैली संबंधी बीमारियां और जेनेटिक कारण शामिल है। इसके 5 से 10 पर्सेंट मामलों में पारिवारिक इतिहास जिम्मेदार होता है, जिसमें मरीज को जेनेटिक तौर पर इस तरह के कैंसर का खतरा रहता है। कई अध्ययनों से यह बात भी सामने आ चुकी है कि जिन पुरूषों को सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियां होती हैं उन्हें प्रॉस्टेट कैंसर होने का खतरा भी अधिक रहता है।

हेल्दी लाइफस्टाइल है जरूरी
हालांकि यह माना जाता है कि आमतौर पर एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से सभी प्रकार के कैंसर होने का खतरा कम रहता है, जिसमें प्रॉस्टेट कैंसर भी शामिल है। एक स्वस्थ जीवनशैली में ये बुनियादी चीजें शामिल हो सकती हैं:
-अपने रोज के खान-पान में अच्छी मात्रा में फल व सब्जियां शामिल करें।
-एक्सरसाइज़ और वॉकिंग के जरिए खुद को फिट रखना।
-शरीर का वजन सामान्य लेवल पर रखना।

देर होने पर मुश्किल है इलाज
बीमारी जब ग्लैंड के बाहर फैल जाती है, ऐसी हालत में इलाज की संभावनाएं बेहद कम हो जाती हैं। ऐसे में इलाज से ज्यादा से ज्यादा इतना फायदा हो सकता है कि मरीज का दर्द कम हो जाता है और उसके जीवन के कुछ साल और बढ़ सकते हैं। इसकी एक अच्छी बात यह है कि प्रॉस्टेट कैंसर अन्य बढ़ने वाले कैंसर के मुकाबले धीरे-धीरे फैलता है और इससे पीड़ित ज्यादातर मरीज लंबे समय तक जी पाते हैं।

इलाज के ऑप्शन
इसके इलाज के विकल्पों में सर्जरी (प्रॉस्टेटेक्टमी), रेडियोथेरपी, हार्मोन थेरपी जिसमें एंड्रोजन हटाने वाली दवाएं दी जाती हैं आदि उपलब्ध हैं। किस मरीज के लिए इलाज का कौन सा विकल्प बेहतर रहेगा, इसका फैसला कैंसर के स्टेज के हिसाब से किया जाता है। आमतौर पर सर्जरी और रेडिएशन थेरपी उन मामलों में दी जाती है जिनमें बीमारी का पता शुरूआती दौर में लग जाता है, जबकि हार्मोन थेरपी एडवांस केसेज में दी जाती है।

प्रॉस्टेटेक्टमी में पूरा प्रॉस्टेट ग्लैंड हटा दिया जाता है। यह उस केस में किया जाता है जिसमें बीमारी का शुरूआत में ही पता लग जाता है और यह पक्का होता है कि कैंसर ग्लैंड के बाहर तक नहीं फैला है। कई बार प्रॉस्टेट कैंसर बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है, ऐसे मरीजों को इलाज की जरूरत नहीं होती, लेकिन ग्लैंड की नियमित जांच और देखरेख की जरूरत होती है।

ऐसे हो सकती है स्क्रीनिंग
प्रॉस्टेट कैंसर में कैंसरस ग्रोथ का पता लगाने का जो सबसे आम तरीका है वह है प्रॉस्टेट स्पेसिफिक एंटिजेन (पीएसए) के इस्तेमाल से स्क्रीनिंग। प्रॉस्टेट-स्पेसिफिक एंटिजन एक तत्व है जो प्रॉस्टेट ग्लैंड में बनता है। प्रॉस्टेट ग्लैंड में स्थित सेल्स इसे बनाते हैं। ज्यादातर स्वस्थ पुरूषों में इसका स्तर प्रति मिली लीटर ब्लड पर 4 नैनोग्राम होता है (एनजी/एमएल )। जब पीएसए का स्तर बढ़ा हुआ मिलता है तब कैंसर होने की आशंका रहती है। इसे कनफर्म करने के लिए प्रॉस्टेट बायॉप्सी करा सकते हैं।

अमेरिकन युरोलॉजिकल असोसिएशन के दिशानिर्देशों के मुताबिक 55 से 69 साल के बीच की उम्र वाले पुरूषों को अपने डॉक्टर से इसकी स्क्रीनिंग के फायदे नुकसान के बारे में बात करनी चाहिए और इसके बाद यह तय करना चाहिए कि प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग कराई जाए या नहीं। इंडिया में इस बीमारी को लेकर लोगों में अब भी जागरूकता का अभाव है। ज्यादातर लोग यह जानने के लिए कभी डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं कि वे खतरे के दायरे में आते हैं अथवा नहीं, या उन्हें स्क्रीनिंग की जरूरत है या नहीं।

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