“चातुर्मास” मे होते हैं सबसे ज्यादा तलाक!

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शरीर ही नहीं, मन पर भी पड़ता है इसका गहरा असर

“चतुर्मास”, यानी मौजूदा 4 महीनों का शरीर पर ही नहीं, बल्कि मन भी गहरा असर पड़ता है। असाढ़ महीने की एकादशी को शुरू होकर कार्तिक की एकादशी तक चलने वाले इस समय को सबसे ज्यादा नेगेटिव मनोदशा वाला माना जाता है। इस मौसम बीमारियाँ तो सबसे ज्यादा पाँव पसारती ही हैं, झगड़े और तलाक भी अन्य दिनों कि तुलना मे अधिक होते हैं। यही वजह है कि इस दौरान कोई भी महत्वपूर्ण फैसले लेने से बचने की सलाह दी जाती है। इस दौरान शादी या कोई भी अन्य संस्कार नहीं किए जाते हैं।

दक्षिणायन से शुरू होती है नेगेटिव मनोदशा 

उत्तरायण और दक्षिणायन न सिर्फ वैदिक साहित्य में बताया गया एक समयकाल है बल्कि यह एक मनोदशा भी है। उत्तरायण का मतलब है पॉज़िटिव मनोदशा का समय और दक्षिणायन का समय नेगेटिव मनोदशा का होता है। दक्षिणायन सूर्य का दक्षिणी संक्रमण होता है। दक्षिण और उत्तर भारत में उत्तरायण और दक्षिणायन काल की गणना अलग तरीके से की जाती है। दक्षिण भारत में उत्तरायण की शुरूआत जनवरी महीने में मकर संक्रांति के दिन से होती है और इसका अंत जुलाई के मध्य में होता है। इसके हिसाब से दक्षिणायन मध्य जुलाई से शुरू होकर जनवरी में मकर संक्रांति तक चलता है।

मेन्टल हेल्थ के नजरिए से, उत्तरायण का मतलब है सत्व, यानी स्वस्थ मनोदशा और दक्षिणायन का मतलब है तनावग्रस्त नेगेटिव मनोदशा। यज्ञ करना, या इसका हिस्सा बनना, पूर्ण प्रकाश वाली जगह पर रहना और सुबह की धूप  के नियमित संपर्क में रहने से डिप्रेशन यानी अवसाद के इलाज में सहायता मिलती है। पूर्णिमा के पहले पखवाड़े और उत्तरायण के समय साइकोथेरपी और काउंसलिंग अच्छा असर दिखा सकती हैं, जिससे इलाज में दवाओं के इस्तेमाल की जरूरत कम हो सकती है। जबकि दक्षिणायन में इसके उलट हो सकता है।

चतुर्मास और आयुर्वेद
पहला, यानी सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित होता है, खासतौर से महीने के सभी सोमवार। इस महीने में वात या वायु संबंधी असंतुलन हो सकता है। एक क्लासिकल गीत ’’सावन का महीना पवन करे शोर’’ इस महीने में होने वाले वायु संबंधी असंतुलन का बेहतरीन उल्लेख करता है। दिमाग के वात संबंधी फंक्शन का संबंध भावनात्मक असंतुलन से है।
दूसरा आता है भाद्रपद, यह त्योहारों का मौसम होता है, जिसमें गनेश चतुर्थी और जन्माष्टमी भी शामिल है। यह महीना भी वात और वायु संबंधी असंतुलन का होता है। क्लासिकल बॉलीवुड गीत ’’मेरे नैना सावन भादो फिर भी मेरा मन प्यासा’’ सावन,  भादो महीने की मनोदशा की व्याख्या करता है। इस दौरान आशाएं पूरी न होने पर नेगेटिव सोच  बनने की आशंका अधिक रहती है।
तीसरा होता है अश्विन माह, जिसमें दुर्गा पूजा, नवरात्रि आदि त्योहार आते हैं। चौथा होता है कार्तिक और दिवाली इसी माह के आखिर में होती है।

ऐसा कहा जाता है कि सावन महीने में हरी पत्तेदार सब्जियां खाने से बचना चाहिए। भादो में दही और अश्विन में दूध और दाल खाने से बचना चाहिए और कार्तिक में दालों की दो खंड हुई (स्प्लिट) वैराइटी से बचना चाहिए।

इन कारणों से चतुर्मास में नहीं होते महत्वपूर्ण कार्य

1. चूंकि यह एक नकारात्मक मनोदशा का काल होता है, ऐसे में इस दौरान तलाक होने की आशंका ज्यादा रहती है।
2. इसी कारण से इनफर्टिलिटी का खतरा भी रहता है।
3. बारिश का मौसम होने के नाते कीणाणु और बैक्टीरिया के पनपने और हरी पत्तेदार सब्जियों के संक्रमित होने का खतरा अधिक रहता है।
4. वात यानी गैस्टिक संबंधी समस्या पहले से अधिक होने के कारण पत्तेदार सब्जियां इस दौरान स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं हो सकती हैं।
5. पित्त यानी मेटाबोलिजम कमजोर पड़ने की वजह से पाचन शक्ति कम हो सकती है
6. बहुत से लोग इस दौरान लहसुन, प्याज से परहेज करते हैं, क्योंकि ये चीजें अनावश्यक रूप से उत्तेजना बढ़ा सकती हैं जिसकी वजह से अपच की शिकायत हो सकती है और पूजा, अर्चना से भी ध्यान भटक सकता है।

मॉनसून के दिन आमतौर पर स्वस्थ नहीं होते हैं। हां, डॉक्टरों के लिए यह एक हेल्दी सीजन हो सकता है। क्योंकि उन्हें इस दौरान ज्यादा मरीज मिलते हैं

सेहत पर असर
-मॉनसून सीजन में आयुर्वेद के मुताबिक तीनों दोष (मूवमेंट, मेटाबोलिजम और स्टृक्चर) विकृत हो जाते हैं।
– वात संबंधी समस्या बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा होती है, जिसके चलते जोड़ों आदि में दर्द होता है।
– नदियों का पानी दूषित हो जाता है।
– इस दौरान हल्का औ कम मसालेदार खाना खाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस दौरान पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। इससे पेट खराब हो सकता है।
– जमीन के भीतर रहने वाले जीवाणु बारिश में जमीन के उपरी सतह पर आ जाते हैं और जमीन के नीचे उगने वाली तथा सतह पर उगने वाली सब्जियों को संक्रमित कर देते हैं।
– सहभोज, शादी, सामाजिक कार्यक्रम आदि इस दौरान कम होते हैं।
– बीच-बीच में लगातार व्रत है आने से इन अस्वास्थ्यकर स्थितियों से सामना करने में आसानी होती है।
– इस दौरान सांप बिलों से बाहर आ जाते हैं और सांप के काटने की घटनाएं आम हो जाती हैं। नागपंचमी त्योहार इस बात का संदेश देने के लिए होता है कि सांपों को बेवजह मारें नहीं क्योंकि इनमें से अधिकतर जहरीले नहीं होते हैं।
– हरी पत्तेदार सब्जियों से सावन महीने में परहेज करना चाहिए। भादो में दही से, अश्विन में दूध से और कार्तिक महीने में दोखंड होने वाली वैरायटी की दालों से एवं तेल के इस्तेमाल से बचना चाहिए।
– बारिश के मौसम में वात दोष बढ़ जाता है। हरी सब्जियां वात की समस्या बढ़ा सकती हैं, इसीलिए इनसे बचने की सलाह दी जाती है।
– भाद्रपद में पित्त जमा हो जाता है। ऐसे में पित्त उत्पन्न करने वाली चीजें जैसे कि दही व अन्य फर्मेंटेड चीजों से बचना चाहिए।
– कार्तिक में कफ दोष बढ़ जाता है। इसी वजह से तेल से परहेज करने की सलाह दी जाती है।
– एलोपैथी में वात मूवमेंट है, पित्त मेटाबोलिज्म और कफ स्टृक्चरल है।
– आपको इस दौरान चाय, कॉफी, शुगर, चावल, गेहूं आदि से परहेज करना चाहिए। लहसुन प्याज का इस्तेमाल कम करना चाहिए क्योंकि ये अनावश्यक रूप से उत्तेजना बढ़ाते हैं और आपको अपच की शिकायत हो सकती है।
-चतुर्मास ध्यान करने, धार्मिक पुस्तकें पढ़ने और ध्यान से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का समय होता है।
– चूंकि चतुर्मास में वात असंतुलन के चलते भावनात्मक असंतुलन ज्यादा होता है, ऐसे में इस दौरान कोई भी समझौता या जरूरी आयोजन नहीं करना चाहिए।

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