नडेला ने शुरू कराई जानलेवा एएलएस पर चर्चा

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Ice-Bucket-Challenge

माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नाडेला के “आइस बकेट” चैलेंज लेने के बाद एएलएस (Amyotrophic Lateral Sclerosis) बीमारी चर्चा मे आ गई है। इस मानसिक बीमारी के बारे मे जागरूकता लाने के लिए नाडेला ने सिर पर बर्फ वाला पानी डलवाने का चैलेंज लिया। 14 अगस्त, यानी बीते गुरुवार को माइक्रोसॉफ्ट के कर्मचारियों के एक ग्रुप ने उनके सिर पर बर्फ का पानी डाला। इस तरह का चैलेंज अमेज़ॅन के सीईओ जेफ़ बेजोज़ और गूगल के को फाउंडर लैरी पेज भी ले चुके हैं। आखिर क्या है ये एएलएस? आइये जानते हैं इसके बारे मे:

क्या है एएलएस (Amyotrophic lateral sclerosis)?
इस बीमारी को लू गेरिग्ज डीजीज भी कहा जाता है। यह बेहद तेजी से असर दिखाने वाली, खतरनाक न्यूरोलोजिकल बीमारी है जो नर्व सेल्स (neurons) यानी दिमाग की कोशिकाओं पर हमला करती है, ये नर्व सेल्स हाथ, पैर और चेहरे के एक्शन को कंट्रोल करते हैं। यह बीमारी मोटर न्यूरोन डीजीज़ की कैटिगरी मे आती है, जो मोटर न्यूरॉन सेल्स के धीरे-धीरे मरने का कारण होती हैं। मोटर न्युरॉन नर्व के वह सेल्स होते हैं जो ब्रेन, ब्रेन स्टेम और स्पाइनल कॉड (जिसे लोवर मोटर न्युरॉन कहते हैं) से लेकर संबन्धित अंग के मसल्स तक होते हैं।
इस बीमारी मे धीरे-धीरे मरीज हाथ, पैर या चेहरे की मूवमेंट पर कंट्रोल खो देता है। अगर शुरुआत मे ही सही ढंग से इसे मैनेज नहीं किया तो यह सांस संबंधी जानलेवा समस्या की वजह भी बन सकता है।

किसको होता है खतरा?
नैशनल एएलएस रजिस्ट्री के मुताबिक प्रति एक लाख आबादी पर इसके 3.9 मामले देखे जाते हैं। एएलएस दुनिया भर मे सबसे कॉमन न्यूरोमस्क्युलर बीमारियों मे से एक है। इसका सबसे ज्यादा असर 60-69 साल की एजग्रुप वालों मे देखा जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे कम या इससे अधिक उम्र वालों को यह बीमारी नहीं हो सकती। महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों को यह बीमारी ज्यादा होती है।
एएलएस के 90 से 95% मामलों मे बीमारी अपने साथ कोई स्पष्ट लक्षण लेकर नहीं आती है। इसमे छिटपुट मामलों मे फैमिली हिस्ट्री का भी कोई रोल नहीं देखा गया है। लेकिन अगर इसके फेमिलियल फॉर्म की बात करें तो 5 से 10% मामले वंशागत (inherited) होते हैं और इसके लिए माता-पिता मे से सिर्फ किसी एक का जीन भी जिम्मेदार हो सकता है। एएलएस के फेमिलियल मामलों मे करीब दर्जन भर जीन मे बदलाव (Mutations) जिम्मेदार होता है।

बीमारी के लक्षण
शुरुआत मे बीमारी के लक्षण मामूली हो सकते हैं, जिन्हें अक्सर लोग नजरंदाज कर देते हैं। शुरुआती लक्षणों मे स्फुरण (fasciculations) मसल्स मे दर्द या अकड़न, कमजोरी, जिसका असर सिर्फ एक हाथ या एक पैर मे दिखाई देता है, बात करने पर नाक से आवाज निकालने जैसा लगता है, इसके अलावा चबाने या निगलने मे भी दिक्कत महसूस होती है।

कैसे होती है जांच?
कोई भी एक टेस्ट इसे कनफर्म नहीं कर सकता है। इसकी शुरुआती जांच का आधार इसके लक्षण होते हैं, जिन्हें देखकर डॉक्टर एएलएस होने का अनुमान लगाते हैं और फिर टेस्ट्स की सीरीज से इसे कनफर्म किया जाता जाता है। फिजीशियन मरीज की कंप्लीट मेडिकल हिस्ट्री लेबे के बाद एक निश्चित अंतराल मे कई बार उसकी न्यूरोलॉजिकल जांच करते हैं।

क्या है वजह?
एएलएस की एक्जैक्ट वजह का पता अब तक नहीं लग सका है। इसका जवाब तलाशने की दिशा मे 1993 मे वैज्ञानिक एक कदम आगे बढ़ सके थे, जब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसार्डर एंड स्ट्रोक (NINDS) के सहयोग से वैज्ञानिक यह पता लगाने मे कामयाब हुए थे कि SOD1 enzyme बनाने वाले जीन मे बदलाव (mutations) का संबंध फेमिलियल एएलएस से है। तब से लेकर अब तक, दर्जन भर से ज्यादा जेनेटिक म्युटेशन देखे गए हैं। फ्यूचर ने शायद यही खोज सही वजह का पता लगा पाने का आधार बने।

क्या है इलाज ?
एएलएस का अब तक कोई इलाज नहीं है। हालांकि यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने बीमारी के इलाज के लिए पहले ड्रग ट्रीटमेंट-रिलूज़ोल को 1995 मे अप्रूवल दिया था। ऐसा माना जाता है कि इस दवा से मोटर न्युरॉन का डीजनरेशन कम होता है, क्योंकि दावा ग्लूटामेट रिलीज करती है।

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