टीनएज में जरूरी है सेक्स एजुकेशन

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sex education in teenageसोशल मीडिया ने सूचनाएँ आसानी से हासिल करने के लिए एक आसान माध्यम मुहैया करा दिया है, क्योंकि इनके जरिए हर तरह की जानकारियोँ का भंडार अब हमारी मुट्ठी में आ गया है। इससे औसत युवा भी अपने आपको सूचनाओँ के मामले में अपडेट रख सकते हैं और नए ट्रेंड के साथ चल सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है जो बहुत अच्छा नहीं है। सूचनाओँ की बाढ में कुछ ऐसी जानकारियाँ भी उपलब्ध हैं जो भ्रमित कर सकती हैं। ऐसे में माँ अपनी बेटियोँ के लिए फिल्टर का काम कर सकती है, जहाँ से सिर्फ वही सूचनाएँ उनतक पहुंचेँ जो सही और उपयुक्त हैं:

टीनएज में बेटी को ऐसे देँ प्युबर्टी की शिक्षा

बच्चोँ के साथ सबसे अधिक सक्रिय रहने की वजह से माँ पर ही यह जिम्मेदारी अधिक रहती है कि वे अपने बच्चोँ को उनके स्वस्थ यौनिक विकास सम्बंधी सही शिक्षा देँ। माध्यमिक स्कूल में जाने वाले बच्चोँ से माता-पिता को यह सवाल पूछ्ना चाहिए कि उनकी हेल्थ क्लास में क्या बताया गया, ऐसे में बच्चे उन सवालोँ के बारे में भी आपसे जानकारी लेने में सहज महसूस करेंगे जिन्हे वे अपनी क्लास में नहीं पूछ पाते हैं। अगर आप यह जानने का प्रयास करेंगे कि उन्हे क्या बताया गया अथवा क्या नहीं, तो आपको यह समझने में आसानी होगी कि कौन सी ऐसी बातेँ हैं जो छूट गई हैं और आप उनसे सम्बंधित सही जानकारी बच्चे को दे सकती हैं।

शारीरिक बदलाव: जब बच्चे उम्र के उस पडाव पर पहुंच जाते हैं जब उनके शरीर में महत्वपूर्ण बदलाव हो रहे होते हैं तब उन्हे इस बारे में विस्तृत और सही जानकारी की जरूरत होती है कि ये बदलाव क्यूँ हो रहे हैं और इनसे कैसे डील करना है। प्युबर्टी के दौरान जो भी शारीरिक बदलाव आते हैं उनके बारे में अपनी बेटी से बात करेँ। वह अपने जननांगोँ में बदलाव महसूस कर रही होगी और सेकंडरी बदलाव (जैसे कि, स्तन विकास) आदि अनुभव कर रही होगी। उसे बताएँ कि हर बच्चे के जीवन में प्युबर्टी की शुरुआत अलग-अलग समय पर हो सकती है। ऐसे में अगर किसी की प्युबर्टी जल्दी शुरू हो जाती है अथवा देर से शुरू होती है तो उसे घबराने की जरूरत नहीं है। किसी भी लडकी के जीवन में माहवारी की शुरुआत और इसके साथ आने वाले अन्य शारीरिक बदलाव उन्हे बेहद तनाव और भ्रम की स्थिति में डाल सकते हैं। चूंकि इन मुद्दोँ पर हर किसी का अपना अलग नजरिया होता है ऐसे में आपको यह सुनिश्चि करना है कि आपकी बेटी अपने जेहन में उठने वाले किसी भी सवाल का जवाब आपसे पूछ सके। हार्मोनल बदलाव और आइडेंटिटी फॉर्मेशन प्युबर्टी से सम्बंधित दो सबसे बडी चुनौती होते हैं (आपके लिए भी और आपके बच्चे के लिए भी)। हार्मोन्स का मूड पर गहरा प्रभाव पडता है, तो अपने बच्चे को पहले से बता कर रखेँ कि इन बदलाओँ के समय उसे कैसा महसूस हो सकता है। इसके अतिरिक्त शारीरिक और हार्मोन सम्बंधी बदलावोँ का असर बच्चोँ की भावनाओँ पर भी पडता है, वे अक्सर इस बात को लेकर मूड स्विंग महसूस करते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर कैसे दिखते हैं अथवा सामाजिक मसलोँ सम्बंधी बातोँ के संदर्भ में।

  • सम्बंधपरक बदलाव: उम्र के इस पडाव पर बच्चे सेक्सुअल इंटरकोर्स और एनकाउंटर से जुडी बातेँ ज्यादा सुनने लगते हैं। यहाँ तक कि अगर आप यह चाहेँ कि आप इस तरह की सूचनाओँ से बच्चोँ को दूर रखेँ तो भी कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि घर से बाहर भी तमाम ऐसे माध्यम मौजूद हैं जहाँ से उनतक जानकारी पहुंच ही सकती है। टेलीविजन, मूवी, इंटरनेट, मैगजीन, म्यूजिक और उनके स्कूल के साथियोँ की बातेँ, सब कुछ सेक्सुअल संकेतार्थोँ और अलंकारोँ से भरा पडा है। इनमेँ अहानिकारक सॉफ्ट ड्रिंक के विज्ञापन से लेकर दोहरी अर्थोँ वाली हास्यास्पद बातेँ तक शामिल हैं। इस तरह की बातोँ से डरने के बजाय आपको बच्चोँ को जागरुक करने की जरूरत होती है। अगर आप उनसे सेक्सुअल इंटरकोर्स के बारे में बात करेंगी, उन्हेँ सुरक्षित सेक्स का महत्व बताएंगी, एड्स व अन्य यौन सम्बंधी बीमारियोँ के खतरोँ से अवगत कराएंगी, सेक्सुअल अब्यूज के बारे में जागरूक करेंगी तो कोई समस्या नहीं आएगी।
  • सामाजिक बदलाव: किशोरावस्था की शुरुआत से पहले ही बच्चे अपनी दोस्ती का दायरा बढाने को तैयार होते हैं और ऐसी क्रियाओँ में हिस्सा लेते हैं जिनमेँ लडके-लडकियाँ दोनो शामिल होँ। ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि वे दूसरे व्यक्तियोँ में शारीरिक दिलचस्पी महसूस करते हैं। यही वह भावना होती है जिसके चलते अक्सर इस उम्र में किसी सिलेब्रिटी अथवा अपने किसी साथी के लिए क्रश महसूस होता है। बच्चोँ के जीवन के इस पडाव में उनसे इन फीलिंग्स के बारे में बात करना, डेटिंग, डांसिंग और अन्य सम्बंधित बातोँ के बारे में सही दिशानिर्देश देना आपकी जिम्मेदारी बनती है। बचपन और किशोरावस्था के सन्योजन के इस दौर में ऐसे नियम तय करना बेहद जरूरी होता है जिनसे आपके बच्चे सुरक्षित रहेँ और अपने फैसलोँ में आपके भरोसे का खयाल रखेँ।
  • आध्यात्मिक बदलाव: किशोरावस्था की शुरुआत से पहले के दिनोँ में बच्चोँ में अंतरवैयक्तिक सम्बंधोँ के बारे में समझ विकसित होने लगती है, सहानुभूति व प्यार के लिए उनकी क्षमता बढने लगती है। उनके आध्यात्मिक स्रोत अधिक वैयक्तिक और तार्किक हो जाते हैं। ऐसे दौर में अपने आध्यात्मिक परम्पराओँ के जरिए उन्हे ऐसे नैतिक मूल्योँ का ज्ञान दिया जा सकता है जो जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिए आवश्यक हैं। जैसे कि- ईमानदारी, सम्मान और जिम्मेदारी आदि। ये बातेँ सेक्सुअलिटी पर भी लागू होती हैं। बच्चे उन अनुरूपता व सिद्धांतोँ को अंगीकार करते हैं जो अच्छे जीवन, विश्वास और अखंडता को बढावा दे। उनके आध्यात्मिक विकास को प्रोत्साहन देँ।
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