आप भी करते हैं नींद में बात!

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sleep talking how to manage itआइटी प्रोफेशनल सुगंधा न जाने कितनी राते जागकर गुजारती थी। फैमिली के साथ किसी रिश्तेदार के घर ठहरने जाना हो तो सौ बार सोचती थी। इस सब की वजह थी उनके पति संजीव की नींद में बात करने की आदत। गहरी नींद में जाते ही संजीव कुच्छ बुद्बुदाने लगते और कई बार तो आवाज इतनी तेज और स्पश्ट हो जाती कि घर का हर सदस्य नींद से जाग जाता। सुगंधा कहती, हालांकि संजीव की इसमे कोई गलती नही थी, लेकिन इसका असर मेरी सेहत और हमारे सम्बंधो पर भी पड्ने लगा था। ऐसे में हमने इस सम्बंध में एक्सपर्ट की मदद लेने का फैसला किया और अब यह समस्या काफी हद तक कंट्रोल में आ गई है:

क्या है नींद में बात करने की समस्या

मेडिकल शब्दावली में इसे स्लीप टॉकिंग (sleep talking), सॉम्निल्क्यु (somniloquy) या पैरासोम्निया (parasomnia) कहते हैं, जो कि नींद के दौरान दिखने वाले असामान्य व्यवहार के तहत आता है। कुच्छ मामलो में इससे कोई खास असर नहीं पड्ता पर कुच्छ मामलो में इसके खतरनाक परिणाम भी आ सकते हैं। व्यक्ति नींद में खुद से भी बात कर सकता है अथवा वह किसी और को भी निर्देश देता है। क्लीनिकल साइकलॉजिस्ट डॉ. रिशिका शर्मा कहती हैं, नींद हमारे शरीर, दिमाग और मन को आराम देने के लिये होती है। इस दौरान जहाँ कॉन्शियस माइंड और शरीर के सामन्य अंग जैसे की हाथ-पैर आदि काम करना बंद कर देते हैं वही सब्कॉन्शियस माइंड अपना काम करता रहता है और कुच्छ गतिविधिया सामान्य तौर से काम करती रहती हैं। जैसे कि, दिल का धड्कना।

जिम्मेदार कारण

सीनियर सायकायट्रिस्ट डॉ. समीर पारिख कहते हैं, इसके लिये कई कारण जिम्मेदार हो सकते है:

नींद पूरी न होना: जब आपने लम्बे समय से भरपूर नींद न ली हो तब जब सोते हैं तो काफी गहरी नींद में चले जाते है और उस दौरान ऐसा हो सकता है।

स्वास्थ्य समस्या: कोई स्वास्थ्य समस्या जैसे कि तेज बुखार में अक्सर लोग नींद में बुदबुदाते हैं।

भावनात्मक समस्या: जो लोग इंट्रोवर्ट होते हैं और अपनी भावनाए खुल्कर व्यक्त नहीं करते हैं उनके भीतर समय के साथ केलेपन की भावना बढ्ती जाती है। परिणामस्वरूप उनमें एंग्जाइटी का स्तर बढ जाता है और नींद में अपनी भावना व्यक्त करने जैसी आदत आ सकती है।

तनाव: यह काम से सम्बंधित या व्यक्तिगत भी हो सकता है, लेकिन गम्भीर तनाव भी समस्या की वजह हो सकता है।

वजन: कई बार समस्या की वजह मोटापा सम्बंधित स्लीप एप्निया भी हो सकता है।

ऐसे कर सकते हैं प्रबंधन

 अपनी भावनाओ को अपने पार्ट्नर के साथ बेझिझक शेअर करे। इससे आपके मन के नकारात्मक विचार सब्कॉन्शियस माइंड में स्टोर नही होंगे। अगर यह सम्भव नहीं है तो स्लीप डायरी बनाइये। इसके जरिए आप एक्स्पर्ट को अपनी समस्या के बारे में समझा सकेंगे और वे समाधान ढूंढने में आपकी सहायता कर सकेंगे। इस डायरी में आप अपने डिनर, सोने जाने के समय, नींद आने के समय, रात में नींद टूट्ने क समय और कारण आदि के बारे में लिखे। साथ ही परिवार के किसी सदस्य की सहायता से नींद में बुद्बुदाने के समय आदि के बारे में भी लिखे। दो-तीन हफ्ते तक ऐसा करने से आपको स्लीप टॉकिंग का पैटर्न पता चलेगा और आप यह अनुमान भी लगा सकेंगे कि किस दिन आपके साथ यह समस्या ज्यादा होती है अथवा नही होती है। इस डायरी की मदद से एक्सपर्ट आपको सुधारत्मक उपाय बता सकते हैं।

जब बच्चे करते हैं नींद में बात

बहुत से पैरेंट्स की शिकायत होती है कि उनके बच्चे नींद में बात करते हैं और वे इसकी वजह जानने के लिए परेशान रहते हैं। पैरेन्ट्स के लिये सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह कोई बीमारी या असामान्य बात नही है। एक्स्पर्ट बताते हैं, दरअसल हमारे दिमाग में एक गेटवे होता है, जो नींद के दौरान बंद हो जाता है। इसके बाद हम चलना, बोलना, खाना आदि बंद कर देते हैं। आमतौर पर 3-4 साल की उम्र के बाद यह गेटवे एक्टिव होता है। लेकिन अगर किसी बच्चे का यह गेटवे आंशिक रूप से खुला रह जाता है तो वह नींद में बाते करता है। अक्सर बच्चे नींद में वही बाते करते हैं जिनके बारे में दिन के समय सबसे ज्यादा सोचते हैं।

अगर कोई पैरेंट्स ज्यादा परेशान हैं तो ये टिप्स अपना सकते हैं

       बच्चे को रात में 7 बजे के बाद मीठा कम खिलाइए, क्योंकि ग्लूकोज बच्चो को ज्यादा एनर्जेटिक बनाता है और वे ज्यादा देर तक एक्टिव रहते हैं।

       बच्चे को दिन भर अपना पूरा वक्त दे, उनसे पढाई के अलावा भी बात करे, ताकि वे आपसे खुलकर अपनी भावनाए व्यक्त कर सके।

       उन्हे किसी एक्स्प्रेस मीडियम जैसे कि पेंटिंग, डांस, म्यूजिक आदि में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करे। साथ ही स्कूल की पूरी दिनचर्या के बारे में भी उनसे डिस्कस करे।

       बच्चे को सिखाइए कि सोने जाने से पहले अपनी सारी नकारात्मक भावनाओ को एक काल्पनिक बास्केट में डालकर अपने दिमाग को साफ कर ले।

       किसी एक्स्पर्ट की मदद से उन्हे मेडिटेशन की ट्रेनिंग भी दिला सकती हैं। इससे काफी फायदा होगा।

       अगर बच्चा नींद में बात करने के साथ डरता भी है तो किसी एक्स्पर्ट की मदद ले सकते हैं।

 

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