दुर्घटनाएँ तोड़ रही हैं रीढ़

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spinal injury and accidents in india
पिछले दो दशक मे देश में न सिर्फ दुर्घटनाएं (Accidents) बढ़ी हैं बल्कि इसके साथ रीढ़ की हड्डी की समस्याएँ (Spinal injury) भी तेजी से बढ़ी हैं। एक्सपर्ट्स इस पर गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर रोकथाम के उपाय समय रहते नहीं किए गए तो समस्या काफी ज्यादा बढ़ सकती है। एक अनुमान के मुताबिक फिलहाल देश मे हर 10 लाख की आबादी पर 20 लोगों को रीढ़ की हड्डी से संबन्धित समस्या है।

कई कारण हैं जिम्मेदार
दुनिया भर में सड़क पर होने वाली दुर्घटनाएं आम तौर पर रीढ़ की हड्डी में चोट के सबसे आम कारणों में हैं। हालांकि, कुछ अध्ययनों के मुताबिक ऊंचाई से गिरना भारत के ज्यादातर हिस्सों में सबसे आम कारण हो सकता है जबकि कुछ हिस्सों में सड़क दुर्घटना मुख्य कारण हो सकती है। घर में गिरना, ऊंचाई से भार का गिरना, भार लेकर चलने के दौरान गिरना, बीमारियां (रीढ़ में टीबी / ट्यूमर आदि), हिंसा, खेल के दौरान लगने वाली चोट और पानी में डाइव करने के दौरान होने वाली दुर्घटना रीढ़ की हड्डी में दर्द के अन्य कारणों में है।

इलाज से बेहतर है रोकथाम
एसोसिएशन ऑफ स्पाइन सर्जन्स ऑफ इंडिया (एएसएसआई) के प्रेसिडेंट और अपोलो हॉस्पीटल्स, चेन्नई में कंसलटैंट स्पाइन सर्जन डॉ. सजन हेगड़े कहते हैं, “कहावत है कि इलाज से रोकथाम बेहतर है। रीढ़ की हड्डी के लिए यह खासतौर से प्रासंगिक है क्योंकि रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लग जाए तो ठीक होने की संभावना आमतौर पर बहुत कम होती है क्योंकि रीढ़ की हड्डी में स्वाभाविक तौर पर ठीक होने की आंतरिक क्षमता नहीं होती है। ऐसे में चोट ना लगे इसके लिए की जाने वाली साधारण सावधानियां प्रभावी हो सकती है वरना मानवजाति को हो सकने वाली यह संभवतः सबसे तकलीफदेह बीमारी है। इसलिए, एएसएसआई ने तय किया है कि वह एक पोजिशन स्टेटमेंट तैयार करे जिसमें एससीआई (स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी यानी रीढ़ की हड्डी में चोट) की रोकथाम के मोटे उपायों पर रोशनी डाली जाए।”

समझें 4 ई का फॉर्मूला
एएसएसआई के प्रेसिडेंट इलेक्ट और के जे सोमैया मेडिकल कॉलेज, सिऑन, मुंबई में अस्थिरोग विभाग में प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. राम चड्ढा ने कहा, “चोट लगने से बचने के कार्यक्रमों को अंग्रेजी के ई अक्षर से शुरू होने वाले चार शब्दों से व्यवहार में लाया जा सकता है। ये हैं – एजुकेशन (education), इंजीनियरिंग (engineering), एनफोर्समेंट (enforcement) और इमरजेंसी केयर (emergency care)। रोकथाम के उपायों में मोटा-मोटी ढांचागत विकास, पर्यावर्णीय संशोधन, कानून और सामुदायिक शिक्षा शामिल है।”

देश मे नहीं मिल रहा बचाव के उपायों को महत्व
एएसएसआई के सचिव और इंडियन स्पाइनल इंजुरीज सेंटर में मेडिकल डायरेक्टर डॉ. एच एस छाबड़ा ने कहा, “भारत और अन्य विकासशील देशों में रोकथाम के उपायों को आवश्यक महत्त्व नहीं दिया गया है। जबकि रोकथाम के उपायों को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है और यह अच्छी तरह प्रदर्शित किया जा चुका है कि इससे विकलांगता, रुग्णता और नश्वरता को किफायती ढंग से कम करना संभव है। इसका कारण संसाधनों की उपलब्धता में कमी भी हो सकता है और शायद इसी कारण रोखथाम के लिए अभियान नहीं चलाए जाते हैं खासकर तब भी जब इन्हीं संसाधनों के उपयोग से संक्रामक बीमारियों के मामले में परिणाम तेजी से हासिल किए जा सकते हैं। नीति निर्माताओं को यह समझना चाहिए कि रोकथाम के कार्यक्रम आखिरकार किफायती साबित होते हैं। यही नहीं, रोकथाम की रणनीतियों को भारत के लिए खासतौर से अपनाए जाने की जरूरत है क्योंकि आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा (72.2%) ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है तथा ज्यादातर दुर्घटनाएं घर पर या असंगठित क्षेत्र में होती हैं।”

एएसएसआई के संयुक्त सचिव और कोलकाता के पार्क क्लिनिक तथा कोठारी मेडिकल सेंटर में कंसलटैंट स्पाइन सर्जन डॉ. सौम्यजीत बसु कहते हैं, “सफलता के लिए सभी स्टेकहोल्डरों के संयुक्त सहयोग की जरूरत है और इससे भी महत्त्वपूर्ण है राजनीतिक प्रतिबद्धता।

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