खुशी की उंगली पकड़ आया था स्ट्रगल

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कहते हैं ऐसा वक्त हर किसी की जिंदगी में कभी न कभी किसी न किसी रूप में जरूर आता है जब उसे पता नहीं होता कि संकट कब खत्म होगा। लेकिन हार मान लेने से हार तय हो जाती है, हिम्मत करते रहने से जीत। जिंदगी स्ट्रगल का ही दूसरा नाम है। हारना जीतना अपने हाथ में नहीं, लेकिन हार ना मानना अपने हाथ में होता है। और उम्मीद की किरणें ऐसे ही लोगों तक पहुंचती हैं। जैसा मेरे साथ हुआ।

मार्च 2013 में जब पता चला था कि हमें ऊपर वाला दोगुना नेमत से नवाज रहा है, हम जुड़वां बच्चों के मां-बाप बनने जा रहे हैं, तभी से खुशी के साथ साथ एक अजीब सा डर जेहन में बैठ गया था। कभी खुशी की लहर मन में उठती थी, तो यह अनजान डर उस पर कुंडली मारकर बैठ जाता था। डॉक्टर कुसुम सभरवाल (विमल क्लीनिक) ने भी कह दिया था कि अब ज्यादा संभलकर चलने की जरूरत है। तय था कि आने वाले महीने कड़ी परीक्षा के होंगे। मेरा और वाइफ का ब्लड ग्रुप मैच नहीं करता। वह आरएच निगेटिव हैं और मैं पॉजिटिव। कंसीव करने के वक्त उनका वेट 38 किलो था। ऐसे में ट्विन प्रेग्नेंसी के दौरान आने वाली मुश्किलें नॉर्मल से दोगुना थीं। लेकिन जैसे तैसे हमने वह वक्त निकाल दिया था। सातवें महीने में केस को बड़े अस्पताल में ट्रांसफर कर दिया गया क्योंकि एक बच्चे का वेट कम होने के कारण उसे एडवांस नर्सरी की जरूरत पड़ने वाली थी। 37 हफ्ते पूरे होते होते सिजेरियन की तैयारी शुरू हो गई थी लेकिन फिर भी एक हफ्ता और निकल गया। 38वें हफ्ते यानी 26 अक्टूबर को सर्जरी की डेट तय हो गई।

खुशी का पीछा करते पहुँचीं मुश्किलें
ऑपरेशन के बाद जब मैंने पहली बार अपने जुड़वां बच्चों को देखा, तब भी खुशी की उंगली पकड़े वह डर खड़ा था। छोटे बेटे हार्दिक का वेट 1.8 किलो था, बड़े बेटे हृदय का 2.5 किलो। दोनों को नर्सरी ले जाया गया। हृदय को कुछ घंटे की ऑब्जर्वेशन के बाद उसकी मां के पास भेज दिया, लेकिन हार्दिक को नियोनोटल इंटेसिव केयर यूनिट यानी नीकू मेंशिफ्ट कर दिया गया। अगले दिन तक डॉक्टर ज्यादा घबराने की बात नहीं बता रहे थे लेकिन जब उसकी शुगर 26 पर डिपकर गई तो डॉक्टर नवीन गुप्ता (मैक्स हॉस्पिटल) ने मुझसे एक दवाई अरेंज करने को कहा, जो इंडिया में बमुश्किल मिलती है। स्वीडन में बनी यह दवाई अरेंज करने में दो दिन लगे। हार्दिक को हाइपर इंसुलीनीमिया था। हार्मोंस बैलेंस करना जरूरी था। इंसुलिन के इंजेक्शन इतने छोटे बच्चे के लिए अच्छे नहीं माने जाते। इसलिए यह दवा उम्मीद की किरण थी। और तीन दिन में दवा ने गजब का असर दिखाया। शुगर लेवल नॉर्मल होने लगा।

एक दिन की खुशी

हृदय और मेरी वाइफ घर जा चुके थे, लेकिन हार्दिक नीकू में था। वाइफ को फीड कराने के लिए कम से कम दो बार नीकू लाना होता था। तब उसके टांके नहीं खुले थे। इसलिए मेरा ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि जैसे ही शुगर लो होगी, हार्दिक को घर ले जाऊंगा। लेकिन जिस दिन छुट्टी मिलने की उम्मीद थी, उसी दिन उसका वेट गिरना शुरू हो गया। डॉक्टर ने कहा गिरते वेट में घर नहीं भेजेंगे। तीन चार दिन वेट को स्टेबल करने में लगे। 11वें दिन छुट्टी मिल गई।

यह खुशी बस एक दिन की मेहमान थी। दो दो दिन के फॉलोअप पर अस्पताल जाना था। एक दिन बाद ही हार्दिक का यूरिन इतना पीला और गाढ़ा दिखने लगा कि कपड़े से निशान नहीं जाते थे। मैंने फॉलोअप के दौरान डॉक्टर को बताया तो उन्होंने कहा पीलिया बच्चों में होता है, घबराने की जरूरत नहीं। पर मैंने जोर देकर बताया कि यूरिन नॉर्मल से कहीं ज्यादा पीला है। डॉक्टर ने तुरंत यूरिन को टेस्ट के लिए भिजवा दिया। रिपोर्ट आई तो पता चला बिलीरूबिन डायरेक्ट 6.2 पहुंच चुका था। यह खतरनाक लेवल है। बिलीरूबिन इनडायरेक्ट बढ़ा हुआ हो तो फोटोथेरपी या धूप से ही ठीक हो जाता है। अगले दिन डॉक्टर ने शुगर रिड्यूसिंग सबस्टेंस का टेस्ट लिख दिया और वह पॉजिटिव आ गया। याद रहेगा वह पल जब डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर कहा था…. ओ हो.. ये तो पॉजिटिव आ गया। मैं और वाइफ दोनों परेशान थे। डॉक्टर ने आठ दस टेस्ट इकट्ठे जो लिख दिए। अल्ट्रासाउंड एबडोमिन, यूरिन कल्चर, रूटीन, लीवर फंक्शन टेस्ट, सीएमवी और फिर गाल्ट।

सोचे बगैर रह सकेगा कोई?

मैंने डॉक्टर से पूछा कि ये गाल्ट क्या है तो उन्होंने ब्रीफ में समझाया, ग्लैक्टोसीमिया। इसमें दूध नहीं पचता। जेनेटिक डिसऑर्डर है, लेकिन रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कन्फर्म होगा। इसलिए ज्यादा सोचना मत।

सोचता कैसे नहीं। ऐसी बीमारी का टेस्ट था जिसका इलाज ही नहीं। लेकिन कहते हैं ना कि बुरे ख्याल सबसे पहले आते हैं। जैसे घर का कोई मेंबर टाइम पर घर ना आए और फोन भी ना उठाए तो पहले लगने लगता है कि कहीं कोई अनहोनी ना हो गई हो। मेरा हाल इससे भी बुरा था। अस्पताल के बाहर ही एक खेल का मैदान था। अक्सर टाइम् मिलते ही उसमें आकर सोचता था। डॉक्टर के मना करने के बाद भी फोन पर जाकर गूगल किया गाल्ट। और ग्लैक्टोसीमिया को पूरी डिटेल में पढ़ डाला। और उसके बाद से होश फाख्ता। रिपोर्ट मुंबई से आनी थी, 15 दिन बाद। पूरी रात आंखों में कटी। मन कहता था प्रार्थना कर, लेकिन ध्यान था कि बस गाल्ट गाल्ट जप रहा था।

और हार्दिक फिर नीकू में

अगले एक दो दिन में बाकी के टेस्ट की रिपोर्ट आनी शुरू हुई। एलएफटी का तो हिसाब किताब ही बिगड़ा हुआ था। यूरिन में एक वायरस डिटेक्ट हुआ जो नॉर्मली बच्चों की नर्सरी में ही फैलता है। वायरस को कंट्रोल करने के लिए 10 दिन का एंटीबायटिक कोर्स जरूरी थी इसलिए डॉक्टर नवीन गुप्ता ने बोल दिया, बच्चे को नीकू ले आओ तुरंत। अल्ट्रासाउंड नॉर्मल था और गाल ब्लैडर सही दिख रहा था लेकिन डॉक्टर ने कहा, इस पर ज्यादा भरोसा नहीं करेंगे। बच्चे के अंग इतने छोटे हैं कि कई बार अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट सही नहीं आ पाती। हार्दिक उसी शाम नीकू की उसी टेबल पर था जहां के मॉनिटर की टिंग टिंग की आवाज मेरे कानों को बहुत खाती थी।

उसी शाम डॉक्टर नवीन ने डॉक्टर पंकज वोहरा (मैक्स हॉस्पिटल) से मिलने को कहा। डॉक्टर वोहरा पीडिएट्रिक गैस्ट्रोइंटोलॉजिस्ट हैं। बहुत एक्सपीरिएंस्ड। अगली शाम ही उनकी उस अस्पताल में ओपीडी थी, लेकिन उस शाम इससे पहले कि मैं उनसे मिलता, उनका फोन मेरे पास आ गया। तुरंत उनसे मिला तो जल्दबाजी में सीढ़ियां उतरते उतरते उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता इसे ग्लैक्टोसीमिया डिटेक्ट होगा। बाकी कोई सिम्प्टम मुझे नहीं लगता लेकिन रिपोर्ट का इंतजार करेंगे। उन्होंने बताया कि हार्दिक के स्टूल का कलर ऑलमोस्ट वाइट है जो बाइलरी अटरेसिया में हो सकता है। इसके लिए हिडा स्कैन करवाना होगा।

आसमान से गिरे….

यह नई बीमारी सुनी। जब तक नहीं पता था तब तक यह शुक्र मना रहा था कि चलो डॉक्टर ने यह तो कहा कि ग्लैक्टोसीमिया नहीं लगता। लेकिन जब बाइलरी अटरेसिया के बारे में समझा तो डर और बड़ा होकर सामने आ गया। जैसा कि डॉक्टर विवेक ने मुझसे कहा था, ‘तुम लोग इंटरनेट पर बीमारियों के बारे में पढ़कर परेशान ही होओगे। उसमें वर्स्ट केसेज के बारे में होता है। लेकिन मेडिकल साइंस की डिटेल में कई रास्ते होते हैं, कई उम्मीदें होती है।‘ पर ये तो वह भी जानते थे कि कौन होगा जो नहीं जानना चाहेगा कि जिसका टेस्ट उसके बच्चे पर हो रहा है, वह बीमारी आखिर है क्या।

खैर, नीकू में रहते ही हार्दिक को हिडा स्कैन के लिए ले जाया गया। न्यूक्लीयर मेडिसिन की डोज देकर तीन घंटे तक मशीन में चैक किया कि डाइ बाहर आ रही है कि नहीं। अगर डाइ लीवर में जाकर बाहर आती दिख जाए तो समझो सब नॉर्मल है। लेकिन हार्दिक के टेस्ट में ऐसा नहीं हुआ। डाइ बाहर नहीं आई। न्यूक्लियर मेडिसिन के डॉक्टर ने लिख दिया, लीवर बायोप्सी। मैं सुन्न सा हुआ हार्दिक को नीकू ले गया। रात को घर आया तो पता नहीं चल रहा था क्या कर रहा हूं, क्या बोल रहा हूं, आगे क्या करूं।

मशीनों की आंख से आंख मिलाते डॉक्टर वोहरा

उधर दस दिन का एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा होने पर हार्दिक को नीकू से डिस्चार्ज किया जा रहा था। ब्लड और यूरिन के सैंपल बेबी शील्ड के लिए मुंबई भेजे जा रहे थे। गाल्ड इम्यूनेशन की रिपोर्ट आने में देर लगने वाली थी इसलिए डॉक्टर वोहरा की सलाह पर गाल्ट क्लासिक की रिपोर्ट पहले मंगवा ली गई थी और रहात की बात थी कि गाल्ट निगेटिव था। यानी एक बड़ी बीमारी की आशंका तो दूर हुई। हालांकि बाइलरी अटरेसिया का मामला अब भी लटका हुआ था। हिडा स्कैन की रिपोर्ट निगेटिव थी और अल्ट्रासाउंड कह रहा था कि सब सही है।

फॉलोअप के दौरान जब डॉक्टर वोहरा से मिलने जा रहा था तो तय लग रहा था कि अब अगला स्टैप लीवर बायोप्सी का होगा। लेकिन डॉक्टर वोहरा ने कहा, वजन अभी 2 किलो के आसपास है। लीवर बायोप्सी का मन नहीं मानता। ऐसा करते हैं एक वीक तक यह दवा ले लो, फिर एलएफटी करवाकर मेरे पास आना। जो दवाई इंडिया में डॉक्टर टेबलेट की फॉर्म में देते हैं, डॉक्टर वोहरा ने उसे सिरप फॉर्म में ढूंढने को कहा था और मैंने ढूंढ ली थी। एक हफ्ते बाद एलएफटी में बीलीरूबिन डायरेक्ट 4.6 था।

अब कन्फ्यूजन की हालत का अंदाजा इससे लगाइए कि बाइलरी अटरेसिया में जो भी सर्जरी करनी हो, 6 हफ्ते की उम्र तक कर लेनी होती है, नहीं तो सक्सेस रेट घट जाता है। और व छठा हफ्ता ही था। न तो यह कंफर्म हुआ था कि बाइलरी अटरेसिया है और न ही यह कि नहीं है। फिर भी डॉक्टर वोहरा ने बीलीरूबिन लेवल देखकर कहा, एक हफ्ते और होल्ड करेंगे लीवर बायोप्सी। अगले हफ्ते हिडा स्कैन रिपीट करेंगे। डॉक्टर का एक्स्पीरिएंस मशीनों की आंखों से आंख मिला रहा था। मैं तो बस जो कहा जा रहा था, किए जा रहा था। कर्म कर फल की इच्छा मत कर की तर्ज पर। अगले हफ्ते हिडा स्कैन हुआ और प्रार्थना का असर दिखा। डाइ का कुछ हिस्सा बाहर आता दिख गया। बस, इसी से डॉक्टर ने तय कर लिया कि बाइलरी अटरेसिया तो नहीं है।

नई मुसीबत

पर जब 15 दिन बाद एलएफटी में बीलीरूबिन लेवल 4.6 ही रहा तो माथा फिर ठनक गया। डॉक्टर वोहरा ने कहा, 15 दिन वेट कर लेते हैं, यह लेवल नहीं घटा तो बायोप्सी करनी पड़ेगी। यह क्या चल रहा था। हर हफ्ते हालात कभी ऊपर तो कभी नीचे। पर फैमिली की सपोर्ट के सहारे चलते चलते मैं तय कर चुका था कि जो डॉक्टर तय करेगा, मुझे वही करना है। और ऐसा सोचता भी तो क्यों ना। जिससे भी पता करवाया उसी ने कहा डॉक्टर नवीन और डॉक्टर वोहरा से बेस्ट डॉक्टर इस मामले में नहीं हैं पूरी दिल्ली में।

अगले हफ्ते से बीलीरूबिन लेवल हर बार घटा। राहत की उम्मीद लगानी शुरू की ही थी कि पता चला हार्दिक को हर्निया है। ऑपरेशन के सिवा कोई चारा नहीं। कहते हैं पूरी ताकत से खुद में हौसला भरने वाले भी कभी कभी निढाल हो जाते हैं। मैं भी होना चाहता था लेकिन मुझे पता था कि मेरे निढाल होते ही सब चरमरा जाएगा। इसलिए हिम्मत बटोरी और फिर चल पड़ा आगे की तरफ। डॉक्टर वोहरा ने जब कहा कि अब लीवर बायोप्सी नहीं करेंगे तो डॉक्टर धर्मेंद्र से सर्जरी की डेट ली। इस तकलीफदेह रस्ते से हार्दिक और हम फिर गुजरे। तीन दिन के दर्द के बाद संकट के बादल आखिरकार छंटना शुरू हुए। हार्दिक की उम्र जब साढे चार महीने हुई, तब कहीं जाकर डॉक्टर वोहरा ने कहा, अब सब ठीक है। दो महीने बाद एलएफटी करवाना अब। और मुझसे मिलना चार महीने बाद। बस रिव्यू कर लेंगे।

हम सबकी हिम्मत ने जिताई ज़िंदगी की जंग

इस पूरे एक साल में मेरी फैमिली और बहादुर बच्चे के साथ-साथ मैं डॉक्टर वोहरा और डॉक्टर नवीन को भी सैल्यूट करना चाहता हूं जिन्होंने पूरी ईमानदारी से बेहतर नतीजे लाने की कोशिश की। बाकी तो सब ऊपरवाले की मेहरबानी। उसके बिना कुछ पॉसिबल नहीं।

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