सप्लिमेंट से नही मिलेंगी मजबूत हड्डियाँ

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suppliment dependency

आधुनिक जीवनशैली में बीमारियोँ से बचाव और इलाज, दोनोँ ही मामलोँ में पॉपिंग पिल्स का इस्तेमाल आम हो गया है। अस्वस्थ जीवनशैली और आदतोँ के चलते पोषक तत्वोँ की कमी से बचने के लिए लोग धडल्ले से सप्लिमेंट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि, एक हालिया रिसर्च यह बताती है कि हड्डियोँ को कमजोर होने से बचाने में विटामिन डी और कैल्शियम सप्लिमेंट एक सीमित स्तर तक ही कारगर होते हैं।

खासतौर से मीनोपॉज के बाद की स्टेज वाली महिलाओँ में हड्डियोँ की कमजोरी का मूल कारण ही विटामिन डी और कैल्शियम की कमी होती है। ऐसे में उम्र बढने के साथ हडियाँ नाजुक होती जाती हैं। समाज के उस तबके के लोगोँ में जहाँ भरपूर पोषण नहीं मिलता है, लोगोँ को काफी कम उम्र में ही ऑस्टियोपोरोसिस होने लगता है। वयस्क लोगोँ में जो एक आम बात देखने को मिल रही है, वह है नियमित रूप से विटामिन डी सप्लिमेंट का इस्तेमाल। उन्हेँ लगता है कि यह हड्डियोँ को कमजोर होने से बचाएगा, जबकि इसका असर एक सीमा तक ही प्रभावी होता है।

वेंकटेश्वरा हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट-ऑर्थोपेडिक एंड जॉइंट रिप्लेसमेंट, डॉ. आर.के. पांडे कहते हैं, “आमतौर पर मरीज डॉक्टर की सलाह के बिना ही अपनी नियमित डाइट में सप्लिमेंट को भी शामिल कर लेते हैं। कभी-कभी वे डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन की समय सीमा समाप्त होने के बाद भी सप्लिमेंट लेते रहते हैं, क्योंकि उन्हेँ लगता है कि ज्यादा लेना बेहतर है। सप्लिमेन्ट लेने की सलाह तभी दी जाती है जब विटामिन का स्तर बहुत ज्यादा गिर गया हो। इसे सामान्य स्तर पर लाने में सप्लिमेंट अच्छी भूमिका निभाते हैं। लेकिन पूरी तरह से सप्लिमेंट पर निर्भर हो जाने की आदत सही नहीं है।

दवाएँ किसी बीमारी से बचाव में अतिरिक्त सहयोग दे सकती हैं, लेकिन इन्हेँ लेने का मतलब यह नहीं है कि आपको बीमारी से 100% बचाव की गारंटी मिल गई है। अगर विटामिन का डोज 1000 आईयू से अधिक है, तो इससे गम्भीर साइड इफेक्ट होने का खतरा भरपूर है, खासतौर से तब जब यह कैल्शियम के सन्योजन के साथ लिया जाता है। विटामिन सप्लिमेंट त्वचा के नवीनीकरण के लिए भी लिए जाते हैं, लेकिन ये सप्लिमेंट लम्बी अवधि का समाधान नहीं देते हैं।“

विटामिन डी एक ऐसा पोषक तत्व है जो हड्डियोँ का घनत्व बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यह आंतोँ में कैल्शियम संचयन में सहयोग देता है। हालांकि, मीनोपॉज (माहवारीचक्र खत्म होने के बाद) के बाद जिन महिलाओँ में ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या होने लगती है, उन मामलोँ में अक्सर मीनोपॉज के बाद शरीर में होने वाले एस्ट्रोजन कंसंट्रेशन में कमी जिम्मेदार होती है। बीएमडी में गिरावट का स्तर 4% से लेकर 5.7% तक हो सकता है। भारत में, औसतन 61 मिलियन लोग जिनमेँ 61% महिलाएँ शामिल हैं, बीमारी की चपेट में हैं। इस समस्या के समाधान हेतु हमेँ अपनी जडोँ की ओर लौटने की जरूरत है, यानि की सप्लिमेंट के बजाय पोषण और सूरज की किरणोँ का सहारा लेना होगा, खासतौर से तब जब हमारी शहरी जीवनशैली ने हमेँ घर, ऑफिस, मॉल और हॉल की चारदीवारी के बीच समेट कर रख दिया है। इसके चलते हम अच्छे प्राकृतिक पोषण के स्रोतोँ से भी दूर होते जा रहे हैं।

डॉ. आर. के. पांडे कहते हैं, “दोहरा अप्रोच अपनाकर हम विटामिन व कैल्शियम की कमे से बच सकते हैं और सप्लिमेंट पर निरर्भरता को भी खत्म कर सकते हैं। इसके तहत पहली ऐप्रोच है सुबह-सुबह धूप की किरणोँ का सामना करना जब धूप की किरणे मधुर होती हैं और इनका कोई साइड इफेक्ट नहीँ होता है, और आउटडोर शारीरिक व्यायाम करना। इसका दूसरा पहलू है खान-पान प्रबंधन। पोषण से भरपूर भोजन लेना जिसमेँ कैल्शियम, प्रोटीन, मैग्नीशियम, और विटामिन डी शामिल हो। दालेँ, बींस, बिना फैट वाला दूध, दही, ब्रोकली, गोभी, मछली, ड्राई फ्रूट्स और हरी पत्तेदार सब्जियोँ को अपने नियमित आहार का हिस्सा बनाएँ और हाई कैलोरिफिक शुगर व कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा कम करेँ।“

 

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