कुछ यूं गुजरा बेबसी का दौर

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Hriday-Hardikबच्चों के एक साल का होने तक का अनुभव जब लिख रहा था तो एक ख्याल बार-बार मन में आ रहा था कि ये साल सबसे मुश्किल गया है, अब अगला साल इससे और आसान होगा, फिर उससे अगला साल और आसान। फिर धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर आने लग जाएगी। यह खुशफहमी इनके पहले जन्मदिन के इतने कम टाइम बाद ही चकनाचूर हो जाएगी, ऐसा तो ख्याल भी नहीं था।

बड़ा सा हो गया घर
पहले जन्मदिन के ठीक एक हफ्ते बाद बच्चे चले गए। उसके दो दिन बाद मम्मी पापा चले गए। मैं घर में अकेला था। अकेलेपन का घोर-घनघोर अनुभव शादी से पहले वाली जिंदगी में था, इसलिए अकेलेपन से कभी डर नहीं लगा, लेकिन बच्चों के जाते ही घर अचानक बहुत बड़ा हो गया था। एक कमरे से दूसरे कमरे में जाओ तो लगता था पता नहीं कितनी दूर आ गए। खिलौने मैंने संभाल कर एक कमरे में रख दिए थे, लेकिन जब कभी उन पर नजर जाती थी तो लगता था वे मुझसे नाराज हैं, बात नहीं करना चाहते।

फिर अस्पताल का बुलावा
महीना भर बीता। संडे का दिन घर पर बीतना होता था इसलिए पूरे हफ्ते मैं संडे को बिजी करने का सामान जुटाता था। 7 दिसंबर का संडे भी कुछ कुछ ऐसा ही था। शाम को नहाकर मैं टीवी के आगे बैठने का प्लान कर रहा था कि अचानक पत्नी का फोन आया। उठाते ही जैसी घबराई हुई आवाज सुनी, मैं सहम गया। उन्होंने बताया कि हृदय को फिर फिट यानी दौरा पड़ गया है। घबराहट में वह उसके नाक में मिडासिप का स्प्रे भी ठीक से नहीं कर पाई। एक दो मिनट लंबा फिट बहुत डरावना होता है, लेकिन उसी वक्त अगर धैर्य से काम न करें, तो समस्या बढ़ जाती है। कायदे से, बच्चे को करवट दिलाकर उसके नाक में दो-दो स्प्रे मिडासिप के डालने होते हैं। फिट अपने आप रुका तो मैंने फोन पर ही बुखार चेक करने को कहा। बुखार नहीं था। यह और ज्यादा चिंता की बात थी। इससे पहले दो फिट बुखार के साथ आए थे और ऐसे फिट को फैब्राइल सीजर कहते हैं। ये पांच साल में अपने आप ठीक हो जाते हैं, लेकिन इस बार फिट बिना बुखार आया। अफैब्राइल सीजर। ये खतरनाक संकेत होते हैं। मैंने डॉक्टर नवीन को फोन किया। उनका कहना था कि वह पटना में हैं, लेकिन बच्चे को अस्पताल में दाखिल करना पड़ेगा। अब ईईजी और एमआरआई तो करना ही पड़ेगा। मैंने डॉक्टर तपीशा को फोन किया। उन्होंने कहा अस्पताल पहुंचो, मैं फोन कर देती हूं। मैंने पत्नी से कहा कि तुम अस्पताल पहुंचो, मैं कुछ ही देर में पहुंच जाऊंगा। पालम से मैक्स पटपड़गंज पहुंचने में कम से कम डेढ़ घंटा लगता है। मैं सर्द रात में तुरंत निकला। अस्पताल पहुंचा तो हृदय शांत था। रात 12 बजे उसे एडमिट किया गया। अगले दिन न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर रेखा मित्तल ने एमआरआई करवाया और फिर पता चला कि हृदय के ब्रेन में कुछ पैच दिखे हैं। यही फिट्स की वजह हो सकते हैं।

वेल्प्रिन
डॉक्टर रेखा ने कहा, बहुत सोच विचार के बाद तय किया है कि हृदय को वेलप्रिन शुरू की जाएगी। वेलप्रिन ब्रेन की दवाई है। इसे शुरू में दो साल के लिए दिया जाता है। दिन में दो बार। टाइम में कोई आगा पीछा नहीं। जिस वक्त देनी है, तो देनी है। एक भी डोज मिस नहीं होनी चाहिए। ऐसा हुआ, तो उसी दिन फिट आने की आशंका बन जाती है। फिर वेट के हिसाब से डोज होती है। 1.8 एमएल मतलब 1.8 एमएल। पॉइंट भर भी आगे पीछे नहीं। यह सुनकर बड़ा धक्का लगा। दो साल के लिए बच्चा और हम बंध गए। 9 बजे सुबह और 9 बजे शाम का वक्त तय हो गया। मैं बच्चों से दूर था लेकिन 9 बजे का टाइम जिंदगी में नश्तर सा घुस गया था। मैंने और मेरी पत्नी ने तय किया कि सुबह और शाम 9 बजे चाहे कहीं भी हों, बात करेंगे। कन्फर्म करेंगे कि दवाई दी कि नहीं। एक साल होने को है, कोई 9 ऐसा नहीं बजा जब मैंने कन्फर्म ना किया हो या पत्नी का मैसेज न आया हो।

वह काला दिन
दिसंबर का वह दिन मैं कभी नहीं भूलंगा। 9 दिसंबर को अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी हृदय की तबीयत ठीक नहीं हुई थी। उसे फिर बुखार ने पकड़ लिया जिससे यह डर गहराने लगा कि कहीं फिर फिट न पड़ जाए। दो दिन से बुखार उतरा नहीं इसलिए डॉक्टर तपीशा ने कहा कि मेरे पास ले आओ। दवाई दी मगर तबीयत और बिगड़ती चली गई। चेकअप के दौरान ही हृदय उल्टियां कर रहा था। पत्नी के कपड़े उसकी उल्टी से भरे हुए थे। डॉक्टर ने उसे तुरंत अपने सीनियर डॉक्टर एस कुकरेजा के पास ले जाने को कहा। वहां डॉक्टर का इंतजार कर रही भीड़ के बीच सब बोल रहे थे कि कहीं कोई चूहा मरा हुआ है शायद, बहुत बदबू आ रही है। हम सहमे हुए से खड़े थे। बदबू वाइफ के कपड़ों से आ रही थी। तमाम चेकअप के बाद डॉक्टर ने एक टेस्ट करवाने को कहा। इसमें पता चला कि कोई हेवी इन्फेक्शन है।

फिर से हृदय को अस्पताल में एडमिट करवाना पड़ा। यानी डिसचार्ज के चार दिन बाद फिर। 13 दिसंबर को। आईसीयू में इलाज चल रहा था। हाई ग्रेड फीवर की वजह से डॉक्टर यह देखना चाहते थे कि कहीं बुखार दिमाग में तो नहीं चढ़ा। इसके लिए रीढ़ की हड्डी से सुई के जरिए पानी का सैंपल लिया जाता है। यह बहुत सेंसटिव टेस्ट होता है इसलिए बच्चा हिले न, इसके लिए उसे लोकल एनस्थीसिया दिया जाता है। यहीं गड़बड़ हो गई। एनस्थीसिया रिएक्ट कर गया और हृदय का शरीर नीला पड़ गया। दो मिनट तक उसके शरीर में सांस नहीं था। डॉक्टरों की टीम भी घबरा गई थी। जैसे-तैसे उसे ऑक्सीजन देकर, दवाइयों के इंजेक्शन देकर कवर किया गया। परमात्मा का शुक्र था कि सांस फिर आ गई और करीब 15 मिनट में हृदय नॉर्मल दिखने लगा। इसके बाद डॉक्टर ने बाहर आकर बताया कि अभी यह सब हो गया था। मैं सुन रहा था ध्यान से। बस यही पूछ पाया कि अब वह कैसा है? जवाब मिला कि ठीक है। तो और कुछ पूछने के लिए दिमाग इजाजत नहीं दे रहा था। बाहर सब ठीक था पर अंदर कुछ दरक रहा था।

यह टेस्ट किसका था
इतना सब हो गया। बहुत डर लग रहा था। लेकिन वाइफ का हौसला बनाकर रखना जरूरी था। असल में तो वही संभाल रही थी दोनों बच्चों को। हार्दिक घर पर था। हृदय अस्पताल में। बीच-बीच में मैं हृदय के पास लेटता और वह घर जाकर हार्दिक को संभाल आतीं। उस दिन के अगले दिन जब वह घर गई हुई थीं तो डॉक्टर ने मुझसे कहा कि वह टेस्ट हो नहीं पाया लेकिन बहुत जरूरी है उसे करना। मैं शॉक्ड था। जिस टेस्ट के चक्कर में यह सब हुआ, वह दुबारा करने की सोची भी कैसी जा सकती है? मैंने डॉक्टर तपीशा से बात की तो उन्होंने कहा कि एनस्थीसिया तो बिलकुल नहीं दिया जा सकता। फिर टेस्ट कैसे होगा? डॉक्टरों की एक टीम इस पक्ष में नहीं थी कि बिना एनस्थीसिया पंक्चर किया जाए और दूसरी टीम एनस्थीसिया रिपीट नहीं करवाना चाहती थी। काफी बहस मुसाहिब के बाद तय हुआ कि डॉक्टर रामलिंगम यह टेस्ट बिना एनस्थीसिया के करेंगे। मैं तो इस पर भी हैरान कि सुई लगाते ही बच्चा तो हिलेगा ही, और रीढ़ की हड्डी में सुई लगाना तो वैसे भी खतरनाक था। डॉक्टर राम और डॉक्टर तपीशा ने मुझे हौसला दिया। जब टेस्ट का टाइम आया तो मैं हृदय के बेड के पास ही था। डॉक्टर रामलिंगम ने कहा, डॉक्टर राम हैज कम। डोंट वरी। और बड़ी सी स्माइल की। पांच ही मिनट बाद डॉक्टर राम बाहर आए और बोले हो गया। सब ठीक हो गया।

बाद में मुझे पता चला कि यह टेस्ट पहले बिना एनस्थीसिया के ही होता था। डॉक्टर राम सफदरजंग अस्पताल में ऐसे कई टेस्ट करते रहे हैं। नए डॉक्टर यह खतरा उठाने को तैयार नहीं थे। पर डॉक्टर राम और डॉक्टर तपीशा कॉन्फिडेंट थे। मैंने थैंक्स किया और हृदय के पास चला गया। बाद में कुछ टेस्ट से यह पता चल गया था कि हृदय को न्यूमोनिया है। सात दिन का एंटीबायोटिक का कोर्स हुआ और दो तीन दिन बाद उसके शरीर की तपिश कम होने लग गई। मैं हृदय को अस्पताल से उसकी नानी के घर ले गया। वहां हार्दिक इंतजार कर रहा था।

दुबारा अस्पताल जाते रहना था
दरअसल इसके बाद हृदय को कोई बड़ी दिक्कत तो नहीं हुई, लेकिन अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान एक टेस्ट बार-बार कोशिश के बाद भी नहीं हो सका था। ईईजी। इससे डॉक्टर को ब्रेन की हलचल नोट करनी थी। इसमें बच्चे को नींद की दवा देनी होती है और सोते हुए उसके सिर पर एक पेस्ट के जरिए कई सारे तार लगाए जाते हैं। इसके बाद कंप्यूटर पर उसे दर्ज किया जाता है। बच्चा जरा भी हिलना नहीं चाहिए। हृदय का यह टेस्ट करवाने के लिए पहले तो बेड पर ही मशीन लाई गई थी। लेकिन वह दवा की दो डोज देने के बाद भी सो नहीं रहा था। जैसे ही उसके सिर पर पेस्ट लगाया जाता, वह हिलाकर उसे हटा देता। जितनी डोज उसे दी थी, उससे ज्यादा दी नहीं जा सकती थी। इसलिए बिना टेस्ट किए वह चला गया। अस्पताल से जिस दिन छुट्टी दी गई। हम 9 जनवरी को घर से उसे ईईजी के लिए ले गए। उस दिन उसे पूरा दिन सोने नहीं दिया था ताकि दवा का असर जल्दी हो। खैर, जैसे-तैसे उस दिन यह टेस्ट हो गया।

न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर रेखा मित्तल ने एक चेकअप के दौरान हृदय की ऑक्यूपेशनल थैरपी करवाने की सलाह दी। वजह यह थी कि वह चल नहीं पा रहा था। खड़ा होने में भी उसे तय समय से ज्यादा का टाइम लगा। हमें हालांकि वह नॉर्मल लग रहा था। फिर भी हम उसे ऑक्यूपेशनल थैरपिस्ट के पास ले गए। वहां रिव्यू के बाद उन्होंने कहा कि हृदय को बिलकुल इस थैरपी की जरूरत है। यह बहुत महंगी थैरपी है और इसके लिए रोज बच्चे को अस्पताल ले जाना था। यह आसान हो सकता था उन मांओं के लिए जिनके पास एक ही बच्चा हो। जिसका एक साल का एक और बच्चा हो वह कैसे रोज इस नियम को फॉलो करेगी, यह सोचकर मैं परेशान हो गया। लेकिन पत्नी ने कहा कि मैं कर लूंगी आप चिंता न करो। खैर, अब ऑक्यूपेशनल थैरपी का सिलसिला शुरू हुआ। तपती दुपहरी में उसे रोज अस्पताल एक घंटे के लिए ले जाया गया। हृदय के 18 महीने के होते-होते रिस्पॉन्स नजर आने लगा और वह पांव उठाने लगा। लेकिन थैरपी फिर भी कम नहीं हुई। दो महीने बाद बस उसके दिन कम होते गए। पहले सप्ताह में 6 दिन। फिर 5 दिन। फिर 4। ऐसे करते करते 4 महीने के बाद थैरपी बंद हुई। हृदय तब तक ठीक से चलने भी लगा था और उसका मुंह से पानी गिराने का सिलसिला भी कम हो गया था। वह कुछ कुछ शब्द बोलने भी लगा था। हालांकि हार्दिक उससे दो तीन महीने आगे निकल गया था।

बच्चों के मां बाप का हालचाल
बच्चों के साथ ही दिक्कत चल रही हो, ऐसा नहीं था। वाइफ को बेहोशी आ जाती थी। डॉक्टर से बात करता था तो कहती थीं कि ब्लड प्रेशर बहुत कम रहता है। यह सब देख देखकर मैं स्ट्रेस में आने लगा। लेकिन मेरी जिद हमेशा हार न मानने की रही। इस जिद का असर शरीर पर तो आ ही रहा था। हाइपरटेंशन की दवा 33 की उम्र में शुरू होना डॉक्टर और मेरे लिए बड़ी बात थी। बैड कॉलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ था। नमक और तली हुई चीजों पर रोक लग गई, वहीं दूसरी तरफ घर में कोई खाना बनाकर देने वाला नहीं था। बाहर का खाता था तो तबीयत सुधर नहीं पाती थी। कमर और हाथ में ऐसा दर्द रहने लगा था कि कोई पेन किलर काम नहीं करती थी। फिर एक दिन तय किया कि मुझे कुछ हो गया तो फिर इस लड़ाई में हार तय है इसलिए पहले खुद को सही करना पड़ेगा।

ये आखिरी दो महीने
सितंबर में बुआ ने हां भर ली कि दो महीने मैं तेरे पास लगा लूंगी। मैं बच्चों और वाइफ को ले आया। बच्चे महीनों बाद घर आए। उन्हें बड़े होते ठीक से देख नहीं पा रहा था इसलिए अब उनकी हर हरकत को मैं नोट कर रहा था। वाइफ से जब भी बात होती, वह एक ही शिकायत करती, पूरा दिन पापा पापा की रट लगाकर रखते हैं। मेरे लिए यह मजे की बात होती। घर पहुंचते ही वे मुझसे लिपट जाते। उनमें होड़ होती कि कौन मुझे पानी लाकर देगा और कौन मुझे चेंज करने के लिए कपड़े पकड़ाएगा। मैं घोड़ा बनता और वह दोनों मुझ पर सवारी करते। हार्दिक हृदय को धक्का देकर गिराता तो हृदय मेरे गाल पर हाथ लगाकर उसकी शिकायत इशारे से करता। वह कुछ शांत स्वभाव का है। हार्दिक इन दो महीनों में पक्का बदमाश बन गया। उसे कुछ करने से रोकने का मतलब था कि वह काम तो अब वह करेगा ही। चलते कूलर में हाथ देने की कोशिश की तो मैंने सूतली लाकर पूरी विंडो पर मानो एंब्रॉयडरी कर दी। ताकि उनका हाथ कूलर तक न पहुंचे। फिर तार को खींच कर काट दिया तो दिन में कूलर चलाना ही बंद कर दिया। वह खिड़की की जाली पकड़कर 6-7 फुट ऊंचा चढ़ने लगा था। डर लगता था कि गिर न जाए पर मना करने पर और ज्यादा करता था। एक दिन हार्दिक ने खुद को कमरे में बंद कर लिया। अंदर अंधेरा था। जब फटकर रोया तो मेरे माथे से पसीना टपकने लगा। मैंने कुछ कोशिश की लेकिन दरवाजा नहीं खुला तो वाइफ ने समझाकर उससे सटकनी खोलने के लिए बोला। उसने आखिर सटकनी खोल दी। इसके बाद मैंने नीचे की सारी कुंडियां सील कर दीं। उनकी शरारतों की लिस्ट इतनी लंबी बन गई कि यहां पूरी तरह लिखना आसान नहीं इसलिए सब फोटो खींच कर रख लिए। 26 अक्टूबर आ गया। मैंने घर में गुब्बारे लगाए। इस बार बच्चों ने मदद की। बुआ के दो महीने पूरे हो गए थे। मम्मी एक हफ्ते के लिए आई थीं। जन्म दिन के तीन दिन बाद फिर से बच्चे नानी के पास चले गए। मम्मी घर चली गईं। और मैं अपनी दिनचर्या में। इस उधेड़बुन में कि बच्चों को फिर घर लाना है इसलिए कैसे सारा इंतजाम करना होगा।

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