करें सेफ दिवाली की तैयारी

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दिवाली पर पटाखे जलाने से बहुत से लोगों के जल जाने की शिकायत आती है। साथ ही , पॉल्यूशन और तेज धमाकों की वजह से आंखों में जलन , दम घुटने , हार्ट अटैक और कान बंद होने जैसी समस्याएं भी आम हैं। डॉक्टरों का मानना है कि ऐसी हालत से बचने के लिए पूरी तरह तैयार रहना जरूरी है। साथ ही, समस्या से निबटने के सही उपायों की जानकारी भी बेहद जरूरी है।
दर्द नहीं तो हालत गंभीर
यह पूछने पर कि जलने की कौन सी स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है, ज्यादातर लोगों का जवाब होता है, दर्द होने या छाला पड़ने पर। जबकि होता इसके उलट है। अगर जलने के बाद दर्द हो रहा है, तो इसका मतलब है स्थिति गंभीर नहीं है। उन्होंने कहा कि मेडिकल बर्न चार्ट में एक हथेली के बराबर जलने को एक प्रतिशत मानते हैं। बच्चों के दस प्रतिशत और बड़ों के पंद्रह प्रतिशत तक जलने पर घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसा होने पर तुरंत डॉक्टर के पास भागने या बरनॉल, नीली दवा व स्याही आदि लगाने के बजाय जले हुए हिस्से को बहते पानी में तब तक रखें, जब तक जलन पूरी तरह से शांत न हो जाए। वह बताते हैं कि जलने की दो स्थितियां होती हैं। एक सुपरफिशियल बर्न और दूसरी डीप बर्न। सुपरफिशियल बर्न में दर्द और छाले हो जाते हैं, जबकि डीप बर्न में शरीर का जला हिस्सा सुन्न हो जाता है। जलने के बाद कोई दवा या क्रीम लगाने से वह हिस्सा रंगीन हो जाता है, जिससे डॉक्टर को पता नहीं चल पाता कि किस तरह का बर्न है। ऐसे में सही इलाज नहीं हो पाता।

आँखों व कानों का बचाव जरूरी
दिवाली के बाद वातावरण में प्रदूषण व राख से आंखों मेंजलन की समस्या भी काफी बढ़ जाती है। ऐसे में सादे पानी से आंखों को धोएं और जल्दी से डॉक्टर को दिखाएं।पटाखे जलाते समय आंख पर चश्मा लगाकर रखें और दूर खड़े हों। आंख में हल्की चोट लगने पर भी उसे हाथ सेमसलें नहीं। अक्सर दीपावली के दूसरे – तीसरे दिन तक बाहर निकलने पर आंखों में जलन महसूस होती है ,क्योंकि हवा में प्रदूषण होता है। ऐसी दिक्कत होने पर डॉक्टर की सलाह से कोई आई ड्रॉप इस्तेमाल कर सकते हैं।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक वे लोग जो लगातार 85 डेसिबल से ज्यादा शोर में रहते हैं, उनके सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। 90 डेसिबल के शोर में रहने की लिमिट सिर्फ 8 घंटे होती है, 95 डेसिबल में 4 घंटे और 100 डेसिबल में दो घंटे से ज्यादा देर नहीं रहना चाहिए। 120 से 155 डेसिबल से ज्यादा तेज शोर सुनने की शक्ति को खराब कर सकता है और इसके साथ ही कानों में बहुत तेज दर्द भी हो सकता है। ऐसे पटाखे जिनसे 125 डेसिबल से ज्यादा शोर हो, उन्हें 4 मीटर की दूरी बनाकर रखें। ज्यादा टार वाले बम पटाखे 125 डेसिबल से ज्यादा शोर पैदा करते हैं। ऐसे में ज्यादा शोर वाले पटाखे न जलाएं। आस-पास ज्यादा शोर हो रहा हो, तो कानों में कॉटन या प्लग का इस्तेमाल करें। छोटे बच्चों का खास ध्यान रखें। कानों में दर्द महसूस होने पर डॉक्टर को दिखाएं।

बढ़ न जाए अस्थमा और हार्ट की समस्या
पटाखों से निकलने वाली सल्फर डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी टॉक्सिक गैसों व लेड जैसे पार्टिकल्स की वजह से अस्थमा और हृदय के मरीजों की दिक्कतें कई गुना बढ़ जाती हैं और ऐसी स्थिति में थोड़ी सी भी लापरवाही हार्ट अटैक अथवा अस्थमेटिक अटैक की वजह बन सकती है। इन तत्वों के कारण एलर्जी अथवा अस्थमा से पीड़ित लोगों की सांस की नली सिकुड़ जाती है। इस स्थिति में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सिजन नहीं मिल पाता, जिससे अटैक आ सकता है। ऐसे में बचाव के लिए कई दिनों तक सावधानी बरतने और दवाएं आदि नियमित रूप से लेने की जरूरत है। परेशानी से बचने के लिए अस्थमा व दिल के मरीज पटाखे जलाने से बचें। धुएं और प्रदूषण से बचने के लिए घर के अंदर ही रहें। सांस के साथ प्रदूषण अंदर जाने से रोकने के लिए मुंह पर गीला रूमाल रखें और अस्थमा के मरीज इनहेलर और दवाएं आदि नियमित रूप से लें।

Dr.Sumit Mrig,
ENT Head,
Primus Super Speciality हॉस्पिटल

Dr. A.K. Grover,
Eye HOD,
Sir Gangaram Hospital

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