अब टाइप-2 डायबीटीज़ की चपेट मे बच्चे भी

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टाइप 2 डायबीटीज (type-2-diabetes) को परंपरागत तौर पर वयस्क उम्र में होने वाली डायबीटीज के तौर पर जाना जाता है, लेकिन अब बच्चों (Children) में डायबीटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आखिर क्या है वजह? आइए जानते हैं:

कुछ साल पहले तक रेयर होता था ऐसा मामला
दो दशक पहले तक बच्चों में टाइप 2 डायबीटीज का मामला काफी रेयर होता था। लेकिन वह ऐसा वक्त था जब बच्चे विडियो गेम के बजाय घर से बाहर निकलकर खेलते थे!

क्या हैं वजहें?
आर्थिक विकास अपने साथ बड़े स्तर पर शहरीकरण को लेकर आया है जिसने सामाजिक संरचना को भी प्रभावित किया है। अब डायबीटीज के खतरे बढ़ाने वाले कारक बढ़ गए हैं। पहले संक्रामक बीमारियां यहां महामारी के रूप में उभरती थीं लेकिन अब इसकी दिशा जीवनशैली संबंधी बीमारियों की तरफ मुड़ चुकी है। पारस अस्पताल, गुड़गांव के कंसल्टेंट एंडोक्रिनॉलजिस्ट डॉ. संदीप खर्ब कहते हैं, “भारत में जो कारक जीवनशैली संबंधी बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं उनमें मुख्यतः शारीरिक सक्रियता का अभाव, ज्यादा कैलोरी वाला भोजन लेना, जीने का सिडेंटरी तरीका और सामान्य से अधिक वजन वाली आबादी का तेजी से बढ़ना आदि शामिल है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहरों में रहने वाले बच्चे आजकल तेजी से मोटापे की चपेट में आ रहे हैं। जब ये कारक अनुवांशिक कारकों के साथ मिल जाते हैं तब समय से पहले टाइप 2 डायबीटीज होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

गाँव और छोटे शहरों के बच्चे हैं ज्यादा फिट
पारस अस्पताल के कंसल्टेंट एंडोक्रिनॉलजिस्ट डॉ. संदीप खर्ब कहते हैं, “ग्रामीण और छोटे शहरों के बच्चे आज भी साइकल से स्कूल जाते हैं और हर आज भी हर शाम खेलने के लिए मैदान में जाते हैं, मगर इनके विपरीत शहरों में रहने वाले बच्चे तेजी से घर के भीतर के जीव बन रहे हैं, जो कि चिंता की सबसे बड़ी वजह है। टीवी और विडियो गेम की लत, एलिवेटर की हर जगह उपलब्धता और यातायात के संसाधनों में बदलाव ने बच्चों में शारीरिक सक्रियता का स्तर बेहद कम कर दिया है। इसके अलावा आजकल अधिक एनर्जी और कम फाइबर वाली खाने की चीजें जैसे कि पिज्जा और बर्गर आदि स्कूल के कैफेटेरिया में भी मिलने लगे हैं, जिनका इस्तेमाल बच्चे नियमित रूप से कर रहे हैं। इन सब कारकों के साथ अवांछित वजन का बढ़ना तो एक वाजिब सा परिणाम है।“

सही लाइफस्टाइल से दूर होंगी दिक्कतें
हालांकि तमाम वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि अगर स्वस्थ आहार और नियमित व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जाए तो डायबीटीज के बहुत सारे मामलों को रोका जा सकता है। बच्चों और कम उम्र के वयस्कों में डायबीटीज होने से निश्चित तौर पर रोका जा सकता है अथवा इसे टाला जा सकता है। इसके लिए हमारे वर्तमान शहरी जीवनशैली में तुरंत बदलाव लाने की जरूरत है।

उठाएँ ये जरूरी कदम:
व्यायाम को बनाए नेशनल कल्चर: शारीरिक व्यायाम का महत्व हमारे जीवन में कई कारणों से है। हालांकि पश्चिमी देशों के विपरीत भारतीय शहरों में रहने लोग अब तक व्यायाम को अपनी संस्कृति का हिस्सा नहीं बना सके हैं। डायबीटीज को राष्टृीय महामारी बनने से रोकने के लिए हमें व्यायाम को नेशनल कल्चर का हिस्सा बनाना होगा। अपने बच्चों को हर शाम निश्चित रूप से खेलने के लिए घर से बाहर भेजें। उन्हें दौड़ने और घूमने दें ताकि वे अपने शरीर का फैट बर्न कर सकें। बेहतर है कि अपने बच्चों को विडियो गेम की आदत ही न लगने दें। अगर आदत लग चुकी है तो उन्हें सिर्फ हफ्ते में एक दिन इसे खेलने दें। स्कूल में कुछ समय शारीरिक क्रियाओं के लिए सुनिश्चित करके स्कूल भी इसमें अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभा सकते हैं।

संतुलित आहार की आदतः यह सच है कि फास्ट फूड बनाना या लेना काफी बेहद आसान है, बावजूद इसके अपने परिवार को इस पर निर्भर न होने दें। बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। यह सुनिश्चित करें कि आपके बच्चे संतुलित आहार लें जिसमें सब्जियां, फल, साबुत अनाज और फाइबर वाली चीजें शामिल हों और जंक फूड कम से कम हो। इस मामले में भी स्कूल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे इस बात पर नजर रख सकते हैं कि उनके कैफेटेरिया में बच्चों को क्या परोसा जा रहा है।

अधिक रिसर्च जरूरीः हम डायबीटीज के बढ़ते खतरे को देख सकते हैं बावजूद इसके हमारे पास ऐसी पर्याप्त रिसर्च का अभाव है जिससे हम यह सुनिश्चित कर सकें कि बच्चों में डायबीटीज क्यों बढ़ रही है। इसके कारणों को सही ढंग से समझने के लिए हमें और डाटा और रिसर्च की जरूरत है। इससे स्वास्थ्य कर्मियों को बेहतर निगरानी के लिए सिस्टम बनाने में आसानी होगी और उसके अनुसार वे बचाव के उपाय कर सकेंगे।

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