वायरल हेपेटाइटिस पर डब्ल्यूएचओ गंभीर

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वायरल हेपेटाइटिस के बढ़ते असर से निबटने के लिए डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने कमर कस ली है। इसी के तहत 67वें वर्ल्ड हेल्थ असेंबली ने एक रेजोल्यूशन लिया है, जिसमे बीमारी से बचाव, इसकी जांच और इलाज को लेकर अभियान चलाए जाएंगे।
संगठन की रीज़नल डाइरेक्टर डॉ. पूनम खेत्रपाल सिंह का कहना है कि, ‘वायरल हेपेटाइटिस साऊथ ईस्ट एशिया रीजन के 11 देशों मे हर साल तकरीबन 5 लाख लोगों की जान ले रहा है और लाखों नए लोग हर साल इसके इन्फेक्शन की चपेट मे आ रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी का क्रोनिक इन्फेक्शन लीवर सिरोसिस या लीवर कैंसर मे भी बादल सकता है।
हेपेटाइटिस वायरस के चलते होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। लेकिन इसके इन्फेक्शन के लक्षण शुरुआती कई सालों तक सामने नहीं आते हैं। ऐसे मे अधिकतर लोगों को तब तक पता नहीं लग पता है जब तक कि समस्या गंभीर न हो जाए। डॉ. पूनम कहती हैं, इस हालत मे संस्था के रेजोल्यूशन को जमीनी स्तर पर लागू कर पाना एक बड़ा चैलेंज है। क्योंकि वायरल हेपेटाइटिस का सर्विलान्स सिस्टम पर्याप्त नहीं है और न ही इसके लिए कोई मजबूत पॉलिसी ही है। हेपेटाइटिस के इलाज की सुविधा भी काफी कम है। न्यूनतम और माध्यम आय वाले देखों मे इसकी नई दवाएं हर व्यक्ति तक मुहैया करा पाना भी मुश्किल है।
जिन भी देखों मे हेपेटाइटिस बी का वैक्सीन बच्चों को दिया जा रहा है, उनमे से इंडोनेशिया और थाईलैंड मे टेट्रावेलेंट और बाकी देशों मे पेंटावेलेंट वैक्सीन इस्तेमाल हो रही है। इंडिया सहित भूटान, कोरिया, इंडोनेशिया, म्यांमार, मालदीव और थाईलैंड मे एक बच्चे के जन्म के समय एक अतिरिक्त डोज़ भी दी जा रही है। लेकिन इसके 100% प्रसार के लिए अभी और प्रयास करने की जरूरत है।

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