शरीर का कंप्यूटर मॉडल

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Virtual physiological human project
यूरोप के वैज्ञानिक मानव शरीर का  कंप्यूटर संस्करण तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने यूरोपियन यूनियन के वित्तीय समर्थन से वर्चुअल फिजियोलॉजिकल हयूमन प्रोजेक्ट (Virtual physiological human (vph) project) शुरू किया है।
इस प्रोजेक्ट के तहत मानव शरीर के प्रत्येक महत्वपूर्ण अंग की कार्यप्रणाली को कंप्यूटर पर उतारा जाएगा। इससे मरीजों की जरुरत के हिसाब से चिकित्सा विकसित करने में मदद मिलेगी और उनके स्वास्थ्य में भविष्य में आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा । इसके साथ ही दवाओं का कंप्यूटरी परीक्षण भी किया जा सकेगा।  ब्रिटेन की शेफील्ड यूनिवर्सिटी के इन्सिग्नियो इंस्टीट्यूट से जुड़े 123 वैज्ञानिक इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। प्रोजेक्ट के लिए उन्हें सामूहिक रूप से 2 करोड़ पौंड की फंडिंग प्राप्त हो चुकी है।

इन्सिग्नियो इंस्टीट्यूट के साइंटिफिक डायरेक्टर मार्को वाइसकोंटी का कहना है कि यदि हमें पहले से यह पता चल जाए कि  कौन से  मरीज पर कौन सी दवा असर करेगी तो हमारा काम बहुत आसान हो जाएगा। इससे हमारी कार्यकुशलता बहुत बढ़ जाएगी। इस तरह के कंप्यूटर संस्करण के चिकित्सा के क्षेत्र में असीमित उपयोग हो सकते हैं।

यह प्रोजेक्ट अभी प्रारंभिक अवस्था में है लेकिन कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में काफी प्रगति  हो चुकी है।

अनेक रोगों में कंप्यूटर मॉडल का प्रयोग उपयोगी हो सकता है। पार्किंसन रोग हर व्यक्ति में अलग-अलग ढंग से आगे बढ़ता है। यूरोपियन यूनिवन ने वैज्ञानिकों को इस रोग पर रिसर्च के लिए 25 लाख पौंड का अनुदान दिया है। इस रिसर्च में वैज्ञानिक यह जानने  की  कोशिश  करेंगे कि क्या कंप्यूटर के मॉडल से यह पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति के मस्तिष्क में यह रोग कैसे विकसित होगा।
अध्ययनों से पता चला है कि व्यक्ति के वास्तविक हृदय की तस्वीरों के आधार पर तैयार की गई वर्चुअल धमनियों को कंप्यूटर मॉडल में जोड़ा जा सकता है और इसके आधार पर किसी ऑपरेशन की  सफलता के बारे में सही-सही अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के वैज्ञानिक डॉ.पॉल मोरिस ने इस बारे में खुलासा करते हुए बताया कि कंप्यूटर मॉडल के जरिए हम यह पता  लगा सकते हैं कि किस हृदय रोगी को स्टेंट लगाना ठीक रहेगा। सामान्य शल्य चिकित्सा में यदि हमने एक बार स्टेंट लगा दिया तो हम उसे वापस नहीं हटा सकते लेकिन कंप्यूटर मॉडल में हम शरीर पर इसका  प्रभाव देख कर इस पर पुनर्विचार कर सकते हैं।

ब्रिटेन के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ रिसर्च के प्रोफ़ेसर जिम वाइल्ड का कहना है कि मरीज के फेफड़ों के कंप्यूटर मॉडल से फेफड़ों से जुडी बीमारियों के लक्षणों का पहले से पता लगाया जा सकता है। उन्हें उम्मीद है कि ब्रिटेन में अगले पांच वर्षों में इस तकनीक का व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगेगा। कंप्यूटर मॉडल महिलाओं के लिए भी मददगार हो सकता है।प्रसव के दौरान महिला की पेल्विक फ्लोर मसल्स को नुकसान  होने  का खतरा रहता है।

कंप्यूटर मॉडल के जरिए शिशु  के जन्म से पहले ही इस समस्या का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और डॉक्टर समय पर हस्तक्षेप कर सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ़ शेफील्ड की मेकेनिकल  इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की प्रोफेसर डॉ.शानोन ली गर्भावस्था पर पेल्विक फ्लोर मसल्स के  प्रभाव पर रिसर्च कर रही  हैं। डॉ. ली वह  भी जानने की कोशिश कर रही हैं कि क्या मॉडल से पेल्विक फ्लोर मसल्स के क्षतिग्रस्त होने का सटीक पूर्वानुमान संभव है। हड्डियों के मामले में भी कंप्यूटर मॉडल बहुत लाभकारी हो  सकता है। यदि हमें यह पहले से पता चल जाए कि मसल्स और लिगामेंट्स आदि  हड्डियों के साथ किस तरह काम करते हैं तो हम ऑस्टियोपोरोसिस ,आर्थराइटिस और कमर के दर्द जैसी सामान्य बीमारियों का समय रहते इलाज कर सकते हैं।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में कंप्यूटेशनल साइंस के प्रोफेसर पीटर कोवनी का कहना है कि मरीज के डेटा के साथ कंप्यूटर मॉडलों का इस्तेमाल चिकित्सा का भविष्य जरूर है लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के शरीर का  वर्चुअल मॉडल  तैयार करना अभी एक  सपना है जिसे पूरा करने में कई वर्ष लग सकते हैं। मरीजों के डेटा के इस्तेमाल पर उत्पन्न होने वाले  विवाद इस सारी प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं। इसके अलावा कई तरह की  नैतिक समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं। अंगों के कंप्यूटर मॉडलों पर किए गए परीक्षण अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं। एक ही सिस्टम में शरीर के अंगों को जोड़ कर उन्हें कार्य करते हुए दिखाना एक बहुत बड़ा लक्ष्य है जिसे पूरा करने में कई वर्ष लगेंगे।

 

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