आपके पेट्स भी हो सकते है अस्थमा की वजह

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बढ़ते पलूशन की वजह से अस्थमा की प्रॉब्लम भी लगातार बढ़ रही है, दिल्ली जैसे शहरों में बड़े तो बड़े स्कूली बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। इतना ही नहीं हालिया क्लीनिकल रिसर्च से यह भी पता लगा है कि अस्थमा के गंभीर अटैक के शिकार होने वालों में भी बच्चों की संख्या ज्यादा होती है। ऐसे में बचाव के उपायों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

क्या है अस्थमा   
अस्थमा पीडि़त लोगों में आमतौर पर घबराहट और तेज खांसी, सांस लेने में तकलीफ और घुटन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसा फेफड़ों तक हवा पहुंचाने वाली ट्यूब में रुकावट, सूजन, रूखापन या कफ आदि जमा होने के कारण होता है। ऐसे में सांस लेने और छोडऩे के लिए काफी कम जगह बचती है। ऐसे लोगों का गला व चेस्ट काफी सेंसेटिव होता है।

ये कारण हैं जिम्मेदार
अस्थमा के कारण और प्रकार हैं जिनमें-
1. वंशानुगत – रिसर्च से पता चला है कि उन बच्चों में अस्थमा की शिकायत ज्यादा होती जिनकी फैमिली हिस्ट्री अस्थमा की होती है।

2. एलर्जी- एलर्जी के कई कारण हैं, जिसमें खाने- पीने की चीजों में रासायनिक खाद का ज्यादा इस्तेमाल, धूल, घास, कॉकरोच, कुत्ते, बिल्ली जैसे बालों वाले जानवर, कुछ दवाएं और घर के अंदर होने वाली सीलन आदि।

3. इन्फेक्शन- कुछ बैक्टीरिया या वायरस के सांस की नली में जाने से अंदर सूजन हो जाती है और सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं। इससे सांस लेने और छोडऩे में काफी परेशानी होती है।

4. वातावरण- न सिर्फ  सड़कों पर अंधाधुंध बढ़ रही गाडिय़ों की संख्या  बल्कि दिल्ली जैसे शहरों में विलायती बबूल जैसे पेड़ भी एलर्जी की समस्या बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा मौसमी बदलाव भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। खासतौर से अक्टूबर, नवंबर और फरवरी माह में समस्या काफी बढ़ जाती है।

5. कुछ मुश्किल एक्सरसाइज – गुब्बारे फुलाने जैसी कुछ मुश्किल एक्सरसाइज जिनसे हृदय गति 150 प्रति मिनट से बढ़ जाए, अस्थमा का कारण बन सकती हैं।

6. मनोवैज्ञानिक –अस्थमा के कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी देखे गए हैं जिनका प्रभाव बच्चों पर सबसे ज्यादा होता है। मसलन अगर मां या पिता किसी बात को लेकर बच्चे को बहुत ज्यादा डांटते हैं तो डर से बच्चे के अंदर घबराहट की एक टेंडेंसी डिवेलप हो जाती है, जो कि कई बार आगे चलकर सांस की दिक्कत में बदल जाती है।

ब्रोंकाइटिस और अस्थमा में फर्क
आमतौर पर लोग ब्रोंकाइटिस को भी अस्थमा समझ लेते हैं, लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि ये दोनों अलग-अलग हैं। ब्रोंकाइटिस ब्रोंकल ट्यूब्स में सूजन होने के कारण होता है। जबकि अस्थमा ब्रोंकल ट्यमब से आगे एल्व्योली नलियों के गुच्छे होते हैं, जो ऑक्सिजन को शरीर के अंदर ले जाने और कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर छोडऩे का काम करती हैं, जब इनमें किसी कारणवश सूजन आ जाती है तो ये नलियां बंद होने लगती हैं। इस स्थिति अस्थमा का कारण बन जाती है। ऐसे में अगर आपको अस्थमा के लक्षण दिखाई देते हैं तो कुछ भी डिसाइड करने से पहले डॉक्टर की सलाह पर स्क्रीनिंग कराएं और इस बात का पता लगाएं कि आपको ब्रोंकाइटिस हुआ है या अस्थमा।  रखें

इन बातों का ख्याल

– जिन चीजों से एलर्जी हो उनसे दूर रहें, उदाहरण के तौर पर कुछ लोगों को पुरानी किताबों की स्मेल, परफ्यूम, अगरबत्ती, धूपबत्ती, कॉकरोच, पालतू जानवर आदि से भी एलर्जी होती है।

-सभी तरह की सांस की समस्या अस्थमा नहीं होती, यह कार्डिएक अस्थमा भी हो सकता है।
-अस्थमा के कुछ मामलों में सांस की दिक्कत नहीं होती है, उनमें सिर्फ रात के समय खांसी आती है।
-ठंडी हवा, धूल या नमी से बचकर अस्थमा अटैक को रोका जा सकता है।
-सिगरेट पीने से भी अस्थमा हो सकता है।
-अस्थमेटिक लोगों को एक्सरसाइज करते वक्त बीच-बीच में आराम करना चाहिए।
– ज्यादा हैवी एक्सरसाइज न करें और एक्सरसाइज से पहले इनहेलर का इस्तेमाल करें।
– अस्थमा का असर जब ज्यादा हो तब सीढिय़ां वगैरह धीरे-धीरे चढ़ें।
– एक डायरी रखें, जिसमें अपनी सांस आदि की मॉनीटिरिंग करके नोट करें।
– अपना वजन भी जांचते रहें।
– पानी खूब पिएं, कोल्ड और फ्लू से बचें।
– समय-समय पर डॉक्टर से सलाह लेते रहें।
-20 प्रतिशत अस्थमेटिक लोगों को ऐस्प्रिन जैसी दवाओं से तकलीफ होती है, ऐसे लोग एसीटैमिनोफेन का इस्तेमाल कर सकते हैं।
– हमेशा खुश रहें, खिलखिलाकर हंसें और अपनी जीवनशैली संयमित रखें।
– वॉक करते समय गहरी सांस लें
अस्थमेटिक अटैक आने पर रखें इन बातों का ध्यान
– अटैक आने पर लेटें नहीं, बैठ जाएं
– मरीज की पीठ सहलाएं, इससे सांस लेने में आसानी होगी
– कंधों को रिलैक्स मोड में रखें और आराम करें
– क्विक रिलीफ के लिए तुरंत इनहेलर लें
– अगर इनहेलर से आराम न मिले तो नेब्युलाइजर लगाएं
– तुरंत डॉक्टर के पास जाएं

क्या है इलाज 
अस्थमा के इलाज के लिए कुछ दवाओं व इनहेलर का इस्तेमाल किया जाता है। इससे सांस की नली और फेफड़ों की जकडऩ खुल जाती है और मरीज आराम से सांस ले सकता है। वैसे तो अस्थमा का कोई पर्मानेंट इलाज नहीं है, मगर प्राणायाम, योग और पौष्टिक आहार लेकर इसे काफी कंट्रोल में रखा जा सकता है।

योग और प्राणायाम हो सकते हैं  वरदान 

योग और प्राणायाम सभी के लिए लाभकारी होता है। अगर योग एक्सपर्ट की देखरेख में अस्थमा के मरीज इनका नियमित अभ्यास करें और उसके साथ ही अपने खान-पान और दिनचर्या पर ध्यान दें तो पुराने से पुराना अस्थमा भी काफी हद तक नियंत्रित हो सकता है।

अस्थमा के लिए फायदेमंद योगासन
कपाल भाति
ताड़ासन
उत्तानपाद आसन
पवन मुक्तासन
भुजंग आसन
शलभ आसन
उष्टरासन
गोमुखासन
प्राणायाम-अनुलोम विलोम, उच्चयी प्राणायाम, धीमी गति से भस्त्रिका प्राणायाम उसके बाद  शवासन फिर ओम का जाप करें।
कुंजल क्रिया भी है जरूरी- इसमें सुबह फ्रेश होने के बाद खाली पेट गुनगुने पानी में नमक डालकर इतना पियें कि गले तक भर जाए इसके बाद खड़े होकर आगे की तरफ झुकें और दाएं हाथ की दो उंगलियों को मुंह में ले जाकर तालू के ऊपर वाले हिस्से को छुएं। इससे उल्टी आ जाएगी। चार-पांच बार ऐसा करने से पानी के साथ-साथ गले के अंदर चिपकी डस्ट और कफ भी निकल जाएगा। शुरू के सात दिनों तक यह क्रिया रोजाना दोहराएं। इसके बाद दो दिन छोड़कर, फिर चार दिन छोड़कर इस क्रिया को करते रहें। इससे अस्थमा जड़ से ठीक हो सकता है।

कैसा हो खान-पान  

अस्थमा के मरीजों को खाने-पीने की कई चीजों से एलर्जी हो सकती है, ऐसी चीजों को न लें। ऐसे में आयुर्वेद के जानकारों का मानना है कि अस्थमेटिक लोगों को फ्रिज वाली चीजें, दही, चावल, आइसक्रीम चॉकलेट, केला, ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक आदि नहीं लेना चाहिए। साथ ही दूध से भी परहेज करना चाहिए क्योंकि इससे कफ बनता है।

ये चीजें हैं फायदेमंद  

– साबुत चने का पानी के साथ उबालकर उसमें नमक डालें और फिर चने को अलग करके खाली पानी पिएं। इससे न सिर्फ गले को आराम मिलता है बल्कि शरीर को कई पौष्टिक तत्व मिल पाते हैं जो इम्यून सिस्टम को स्ट्रॉंग बनाते हैं।

-तुलसी के पत्तों को उबालकर पीना काफी फायदेमंद होता है, क्योंकि यह एक अच्छा एंटी ऑक्सिडेंट होता है।
– रात में सोने से पहले घर की पिसी हुई हल्दी आधा चम्मच फांकने से बहुत आराम मिलता है। हल्दी में घाव को भरने और सूजन को ठीक करने की काफी क्षमता होती है।
– अपने खाने में विटामिन, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम आदि का पूरा ख्याल रखें
– हो सके तो किसी एक्पर्ट की मदद से डाइट चार्ट बनवा लें

अस्थमा के इलाज का एक प्राचीनतम तरीका 

हैदराबाद में मछली के जरिए किया जाने वाला इलाज लोगों में काफी फेमस है। ऐसी मान्यता है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले वीरन्ना गॉड नाम के एक व्यक्ति थे, जो दूसरों की हमेशा मदद किया करते थे, उनसे अचानक एक दिन एक दैवीय व्यक्ति मिले और प्रसन्न होकर उन्होंने इलाज का यह सीक्रेट फॉर्मूला बताया और कहा कि इससे लोगों का मुफ्त इलाज करना। तबसे लेकर आजतक बेथानी गॉड परिवार इस फॉर्मूले से लोगों का मुफ्त इलाज करता आ रहा है। हर साल मॉनसून की शुरुआत होते ही जून महीने में हैदराबाद की बेथानी गॉड फैमिली के पास दुनिया भर से हजारों लोग इस तरीके से अस्थमा का इलाज कराने आते हैं।

कैसे होता है इलाज  

सबसे पहले बैथिनी मछली से बनी दवा को जिंदा मुरेल मछली के मुंह में रखा जाता है और उस मछली को मरीज के मुंह में डाल दिया जाता है। 2 से सवा दो इंच की यह मछली काफी चिकनी होती है, इसलिए मुंह में आसानी से स्लिप हो जाती है और मरीज को इसे आराम से निगल लेता है। शरीर के अंदर यह 15 मिनट तक जिंदा रहती है। यह मछली गले से लेकर पेट तक जाती है, उस दौरान उसकी पूंछ और पंख फडफ़ड़ाने से पूरा रेस्पिरेटरी सिस्टम साफ हो जाता है। बताते हैं कि अगर इस तरीके से तीन साल तक इलाज कराएं और 45 दिनों तक उनके अनुसार डाइट लेते रहें तो अस्थमा 100 प्रतिशत ठीक हो जाता है। यह दवा मृगशिरा कार्ती नक्षत्र आमतौर पर 7-8 जून दी जाती है।

 

 

 

Inputs: 

Dr. M. S. Kanwar, Sr. Consultant ,  Apollo Hospital

Dr. Neeraj Jain, Chest Specialist,  Sir Gangaram Hospital

Chetan Upadhyay- Yoga and Naturopathy Expert, Satya Foundation 

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